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सेना की साख और सरकार PDF Print E-mail
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Saturday, 14 June 2014 12:02

अविनाश पांडेय

 जनसत्ता 14 जून, 2014 : ‘अगर यूनिट बेगुनाहों को मार दे, डकैती डाले और फिर संगठन का मुखिया उन्हें बचाए तो क्या उस पर

सवाल खड़े नहीं किए जाने चाहिए? अपराधियों को छोड़ देना चाहिए?’ इस सामान्य-से सवाल का जवाब है कि नहीं, अधीनस्थों द्वारा की गई कार्रवाइयों के लिए भी शीर्ष नेतृत्व का उत्तरदायित्व दुनिया भर में माना जाता है। 


अफसोस कि सामान्य-सा दिखता यह सवाल वास्तव में केंद्र सरकार में राज्यमंत्री और पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह के एक ट्वीट की वजह से निकला है जिसके जवाब भारतीय लोकतंत्र को ही नहीं बल्कि दुनिया भर में भारत की लोकतांत्रिक छवि को भी गहरा आघात पहुंचा सकते हैं। पहली वजह यह कि एक पूर्व सेनाध्यक्ष द्वारा पूछे गए इस सवाल में भारतीय सेना पर अपने ही नागरिकों के मानवाधिकारों का उल्लंघन करने के लगातार लगते रहने वाले आरोपों का प्रच्छन्न स्वीकार है। ऐसा स्वीकार, जिसमें गलत पहचान की वजह से या किसी उग्रवादी समूह से हो रही मुठभेड़ों में फंस कर निर्दोष नागरिकों के मारे जाने का बहाना बनाने की गुंजाइश तक नहीं है। यह स्वीकार सायास हत्याओं और लूटपाट की तरफ इशारा कर रहा है। 

गौरतलब है कि उग्रवाद प्रभावित जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक भारत के सभी ‘अशांत’ इलाकों में भारतीय सेना पर उग्रवाद से निपटने की आड़ में निर्दोष नागरिकों की हत्या सहित अन्य तमाम अत्याचारों के आरोप लगते रहे हैं। इन अत्याचारों के पीछे सबसे बड़ा कारण सैनिकों को सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम, 1958 (अफस्पा) के तहत बिना किसी जवाबदेही के मिली वह आजादी है जो उन्हें बिना किसी वारंट के ‘संदिग्धों’ के घर में घुसने से लेकर उन पर गोली चला सकने का निर्बाध अधिकार देती है। लंबे दौर से यह कानून सेना और जनता ही नहीं, बल्कि सेना और इन इलाकों के चुने हुए जनप्रतिनिधियों के बीच भी तनाव का सबब बनता रहा है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला इस अधिनियम को हटाने की लगातार मांग करते रहे हैं, भले ही उन्होंने बाद में दबाव में आकर इस मांग को कुछ चुनिंदा जिलों के लिए सीमित कर दिया हो। इसके अलावा, भारत के नागरिक अधिकारों से जुड़े संगठनों से लेकर मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन तक इस अधिनियम को क्रूर बताते हुए इसे हटाने की मांग करते रहे हैं।

कहना न होगा कि भारतीय सेना के शीर्ष नेतृत्व ने इन घोषित अशांत इलाकों में राष्ट्र की एकता, अखंडता और संप्रभुता को सुरक्षित रखने के लिए इस अधिनियम को अनिवार्य बताया है। उन्होंने हमेशा जोर दिया है कि सेना के ऊपर लगाए जाने वाले आरोप बेबुनियाद ही नहीं बल्कि देश की सुरक्षा को खतरे में डालने वाले आपराधिक षड्यंत्र का हिस्सा भी हैं। बेशक इसी सेना को थंगजाम मनोरमा की कथित मुठभेड़ में हुई मौत के बाद मणिपुर में लगभग जनविद्रोह की स्थिति में इंफल घाटी से यह कानून हटाने का फैसला मानना पड़ा था। पर उसके बाद वह कहीं भी पीछे हटने को तैयार नहीं हुई है। सिर्फ एक उदाहरण लें, तो 2010 में सेना के काफिलों पर पथराव करने वाले युवाओं पर गोली चलाने से हुई पंद्रह से ज्यादा मौतों के बाद उबल रहे कश्मीर से इस कानून को हटाने की मांग का वहां के शीर्ष कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बीएस जसवाल ने यह कह कर विरोध किया था कि यह कानून (अफस्पा) उनके लिए ही नहीं बल्कि पूरी भारतीय सेना के लिए पवित्र है। उसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अफ्स्पा को मानवीय चेहरे के साथ लागू करने का प्रस्ताव हो या फिर न्यायमूर्ति जीवन रेड््डी आयोग की इसे निरस्त कर दिए जाने की सिफारिश, सेना कभी झुकने को तैयार नहीं हुई। 

पिछले साल अप्रैल में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त जांच समिति ने मणिपुर में हुई छह मुठभेड़ों को फर्जी पाया, तो सेना के दावे की पोल खुल गई। पर उसने हमेशा इन घटनाओं को अतिविषम परिस्थितियों में काम करने के दौरान हुई गैरइरादतन गलतियां बताया था। पूर्व सेनाध्यक्ष की इस टिप्पणी ने भारतीय व्यवस्था की सबसे पवित्र गाय मानी जाने वाली संस्था से ऐसी घटनाओं को नियम नहीं बल्कि अपवाद बताने का वह बहाना छीन लिया है। 

पूर्व सेनाध्यक्ष की इस टिप्पणी ने दूसरा महत्त्वपूर्ण सवाल आजादी के बाद के भारत में सैनिक और नागरिक प्रशासन के बीच गरिमामयी दूरी से परिभाषित अंतर्संबंधों पर उठाया है। औपनिवेशिक काल के बाद बने तमाम राष्ट्र-राज्यों में इन दोनों के अंतर्संबंध ही उनमें लोकतंत्र की स्थापना के लिए निर्णायक अस्तित्ववादी संकट रहे हैं। कहना न होगा कि पड़ोसी पाकिस्तान से लेकर सुदूर अफ्रीका तक उनमें से ज्यादातर यह सवाल हल करने में विफल रह कर तानाशाहियों में बदल जाने को अभिशप्त हुए हैं।

भारत इसका अपवाद सिर्फ इसलिए बन सका कि यहां की सेना ने हमेशा लोकप्रिय और निर्वाचित नागरिक प्रशासन के मातहत काम किया। ठीक ऐसे ही यहां के नागरिक प्रशासन ने भी कभी अपनी सीमाएं नहीं लांघीं। याद करें कि 1971 में बांग्लादेश युद्ध में भारत द्वारा मुक्तिवाहिनी के समर्थन में तत्काल सशस्त्र हस्तक्षेप के प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्णय को सेनाध्यक्ष सैम मानेकशॉ उर्फ सैम बहादुर ने जमीनी परिस्थितियों को देख कर ठुकरा दिया था और युद्ध के लिए अनुकूल परिस्थितियां होने पर ही कार्रवाई करने की बात की थी। भारत की शायद सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री ने भी स्थिति को समझते हुए उन्हें पूरी आजादी दी थी।

उसके बाद


भी भारत की किसी निर्वाचित सरकार ने सेना के आंतरिक मामलों में लगभग नहीं के बराबर ही दखल दिया है। ऐसे में अब मंत्री बन चुके पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह द्वारा यह हस्तक्षेप एक नई और गलत परंपरा की शुरुआत है। सहअस्तित्व और सामंजस्य को टकराव में बदल देने का अंदेशा पैदा करने वाला यह दखल सेना के लिए ही नहीं बल्कि किसी दिन भारतीय लोकतंत्र के लिए भी बड़ा खतरा बन सकता है। 

जनरल वीके सिंह का अपना इतिहास इस मामले में चौथा और बेहद महत्त्वपूर्ण नुक्ता है। शायद ही कोई भूला हो कि वे जन्मतिथि के गलत दर्ज होने के दावे के साथ खुद को नियुक्त करने वाली नागरिक सरकार के खिलाफ अदालत जाने वाले पहले सेनाध्यक्ष हैं। यह भी कि सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें लगभग झिड़कते हुए याद दिलाया था कि इस पद तक पहुंचने के लिए वे सेना के भीतर ही नहीं बल्कि रक्षा मंत्रालय तक को अपनी जन्मतिथि 1950 ही मानने का लिखित आश्वासन देते रहे थे। अफसोस यह कि इस विवाद ने सेना के भीतर वरीयता और योग्यता को दरकिनार कर जातीय और सामुदायिक आधारों पर ‘उत्तराधिकार की पंक्ति’ निर्धारित करने वाले समूहों की मौजूदगी का तथ्य सार्वजनिक कर दिया था। उसके बाद सामने आर्इं षड्यंत्रों और प्रतिद्वंद्विता की कहानियां, देश की आंतरिक और बाह्य, दोनों तरह की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे की तरफ इशारा करती हैं। यों किसी भी देश की सेना के भीतर ऐसी गुटबाजी का होना अपने आप में ही खतरनाक है, पर सोचिए कि भारत जैसी भूराजनीतिक परिस्थितियों वाले किसी देश की सेना के भीतर ऐसी गुटबाजी क्या दुष्परिणाम पैदा कर सकती है। 

इस बार का विवाद उसी गुटबाजी की उपज है। ताजा विवाद उस समय शुरू हुआ जब रक्षा मंत्रालय ने लेफ्टिनेंट जनरल रवि दस्ताने के पदोन्नति मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में आगामी थल सेनाध्यक्ष जनरल दलबीर सिंह सुहाग (तत्कालीन लेफ्टिनेंट जनरल) के खिलाफ खुद वीके सिंह द्वारा की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए आधार बनाई गई खामियों को गैर-कानूनी, असंगत और पूर्व-नियोजित बता दिया।

उस समय वीके सिंह ने सुहाग के नेतृत्व वाली एक यूनिट को पूर्वोत्तर में बेगुनाहों की हत्याओं और लूटपाट के लिए जिम्मेदार बताते हुए उनकी पदोन्नति पर रोक लगा दी थी। बाद में, जनरल बिक्रम सिंह ने सेना प्रमुख बनते ही न केवल सुहाग की पदोन्नति पर लगी रोक हटा ली बल्कि उनको पहले पूर्वी सैन्य कमान का प्रमुख और फिर उप-सेनाध्यक्ष नियुक्त कर उनके अगले सेनाध्यक्ष बनने का रास्ता साफ कर दिया। जाहिर है कि अगर वीके सिंह को किसी से दिक्कत होनी चाहिए थी तो खुद अपनी सरकार के रक्षा मंत्रालय से, जिसने उनके निर्णय को न केवल गलत बल्कि पूर्वनियोजित भी बताया है। 

खैर, वीके सिंह की आपत्ति को दरकिनार कर जनरल सुहाग की नियुक्ति अंतिम रूप से तय होने का फैसला सैन्य-नागरिक संबंधों को और मुश्किल न बनाने की दिशा में उठाया गया बिलकुल सही कदम है। वीके सिंह को इस हलफनामे की आलोचना का पूरा हक है, पर यह उन्हें सरकार के भीतर करना चाहिए था।

इसके उलट, उन्होंने सोशल मीडिया पर वर्तमान सैन्य अधिकारियों के खिलाफ मोर्चा खोल कर न केवल अपनी ‘राष्ट्रवादी’ छवि को नुकसान पहुंचाया है बल्कि सेना में होकर सरकार से और सरकार में होकर सेना से लड़ने की हास्यास्पद छवि भी गढ़ ली है। न केवल वीके सिंह, बल्कि मोदी सरकार को भी सेना के राजनीतिकरण की किसी भी कोशिश को तुरंत रोकना चाहिए। इतिहास और समसामयिक विश्व दोनों गवाह हैं कि राजनीतिक सेना लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होती है। 

खैर, इस पूरे विवाद ने सेना को आत्मालोचना का एक मौका भी दिया है। यह कि वह अपनी दुहरी छवियों में से एक चुन ले और उसे और मजबूत करे। आखिर यही सेना एक तरफ आम भारतीयों के लिए ऐसे विश्वास का प्रतीक है कि दंगों के बीच अल्पसंख्यक भी पुलिस हटा कर सेना बुलाने की मांग करते हैं, तो दूसरी तरफ मणिपुर जैसे सीमांत क्षेत्रों के बहुसंख्यक हिंदू भी सेना को बैरकों में वापस भेजने की जिद पर अड़े रहते हैं। सेना की यह पहली छवि पुंछ जैसे क्षेत्रों में जनता का दिल जीतने के नाम पर चलाए जा रहे कार्यक्रमों से नहीं बल्कि अफस्पा जैसे काले कानूनों को वापस लेने को तैयार होकर विधि के शासन के भीतर अपनी कार्रवाइयां करने से, आम नागरिकों को खुद में विश्वास दिलाने से ही पुख्ता होगी।

अंत में सिर्फ यह कि अपनी क्षणिक स्वत: स्फूर्तता के लिए जाना जाने वाला सोशल मीडिया नीतिगत न नीतिगत फैसले लेने की जगह है, न उन पर बहस करने की।


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