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मां की अंगुली PDF Print E-mail
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Saturday, 14 June 2014 11:58

क्षमा शर्मा

जनसत्ता 14 जून, 2014 : कुछ समय पहले ‘मदर्स डे’ गुजरा। जब से मां के नाम पर मनाया जाने वाला यह सालाना दिवस प्रचलन में आया है, हर बार बच्चों को बताया जाता है कि वे इस दिन अपनी मां के लिए क्या-क्या करें। उसे ‘हैप्पी मदर्स डे’ जरूर कहें, कोई उपहार दें, उसे प्यार करें। कई साल पहले एक बच्ची से जब मैंने पूछा था कि ‘मदर्स डे’ पर क्या करोगी तो उसने कहा था- ‘सिर्फ मदर्स डे को ही क्यों? मैं तो अपनी मां के लिए हर रोज कुछ करना चाहती हूं।’ उस बच्ची की बात, उसकी आंखों की चमक और अपनी मां की परवाह... कितनी सारी बातें हैं जो उसके एक वाक्य में छिपी थीं। अगर मां के नजरिए से देखें तो मां हर रोज, हर पल और जीवन भर बच्चे के लिए कुछ न कुछ करती ही रहती है। बच्चा बड़ा हो जाता है तो भी उसके लिए वह नन्हा शिशु ही रहता है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनकी मां का हलवा खिलाना और फिर रूमाल से उनका मुंह पोंछने वाली तस्वीरें हम सभी ने देखी थीं। तिरसठ साल का पुत्र और नब्बे साल की मां। मगर उसके लिए पुत्र उतना ही नन्हा था।

‘बच्चे हमेशा ठीक रहें’, मां की इस चिंता में कभी कोई कमी नहीं आती है। कई बार मां की इस अतिरिक्त चिंता से बच्चे परेशान भी होते हैं। उनके परिवार में आफत आने लगती है। कुछ मामलों में पत्नियों को मां का बेटे के प्रति लाड़-दुलार अपने अधिकार क्षेत्र में दखल लगता है। इस कारण मां और बच्चों में असहमति और लड़ाई-झगड़ा शुरू हो जाता है। आजकल लोग कहते हैं कि पहले मांएं घर में रहती थीं। उनके सोच का केंद्र सिर्फ परिवार होता था। अब बहुत-सी माताएं बाहर काम करती हैं। घर और बाहर दोनों की चिंता उन्हें करनी पड़ती है। तो क्या वे इतना समय बच्चों को दे पाती होंगी?

लेकिन सच यह है कि मां चाहे जितनी व्यस्त हो, मगर आज भी वह अपने बच्चे के लिए समय निकालती है। छुट्टी के वक्त किसी स्कूल पर नजर डाली जाए, बाजार में देखा जाए। चूरन, चाट-पकौड़ी, छोले-भटूरे, मोमोज, आइसक्रीम, चॉकलेट, बिस्कुट आदि की दुकान पर नजर पड़े, तो अनोखे नजारे दिखते हैं। बच्चे ने मां की एक अंगुली थामी हुई है, मां के कंधे पर बच्चे का बस्ता और पानी की बोतल लटकी है कि अचानक बच्चे को आइसक्रीम वाला दिख जाता है। वह आइसक्रीम खाने की जिद करने लगता है। मां मना करती है तो वह


वहीं धूल-मिट्टी में लेट जाता है। मां उसे मनुहार करके उठाती है। इसी तरह, बच्चे ने जैसे ही चॉकलेट की दुकान देखी, जिद की और मां ने गोद में लिए बच्चे को चॉकलेट दिलवा दी। बच्चे ने कुछ खा लिया, कुछ गिरा दिया और और कुछ फैला दिया। उसके मुंह पर चॉकलेट ऐसे ही लगी होती है जैसे कृष्ण के मुंह पर मक्खन और दही लगा रहता था। कितने बच्चे मां की अंगुली पकड़े सड़क पर दिखाई देते हैं! फिर न जाने क्यों, वे एक जगह रुक जाते हैं। मां उन्हें ले जाने की कोशिश करती है तो वे रूठ जाते हैं, जाने से मना करते हैं। कई बार मां के साथ लगभग घिसटते भी दिखाई देते हैं। बच्चे के जीवन में मां की अंगुली पकड़ने का अर्थ सुरक्षा ही तो है!

लेकिन यह केवल इंसानी समाज में मां का सच नहीं है। पशु-पक्षियों के बीच भी मां की भूमिका अनोखी ही होती है। जो हिंसक बाघिन अपने नुकीले दांतों और पंजों से एक झपट्टे में हिरन का काम तमाम कर देती है, वही जब अपने बच्चे को मुंह से उठाती है तो उसका एक दांत तक बच्चे को नहीं चुभता है। बिल्ली भी ऐसा ही करती है। बच्चे पालने का यह प्रशिक्षण इन सबने किसी स्कूल में नहीं लिया। यह उन्हें प्रकृति ने दिया है। इसीलिए कहा जाता है कि मां और बच्चे का नाभि-नाल का संबंध होता है। मातृत्व प्रकृति प्रदत्त है। स्त्रीवाद इससे असहमत हो सकता है। बच्चे के साथ मां का नाभि-नाल का ही संबंध है कि आज जन्म के वक्त नाल के खून को इकट्ठा करने के लिए दुनिया भर में कोर्ड ब्लड स्टेम सेल बैंक खोले जा रहे हैं। इन बैंकों में बच्चे की नाल से प्राप्त खून को सुरक्षित रखा जाता है। इससे बच्चे को छिहत्तर किस्म की गंभीर बीमारियों से बचाया जा सकता है।


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