मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
सेक्युलर राजनीति की भूलें PDF Print E-mail
User Rating: / 8
PoorBest 
Friday, 13 June 2014 11:33

शिवदयाल

 जनसत्ता 13 जून, 2014 : कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि हिंदुत्व की राजनीति की प्रतिक्रिया में मुसलिम राजनीति खड़ी हुई

और द्विराष्ट्र के सिद्धांत के आधार पर मुसलमानों के लिए अलग देश मांगा। वास्तव में हिंदुत्व की राजनीति वह ताकत और विस्तार कभी हासिल नहीं कर पाई, जो चालीस के दशक में मुसलिम लीग को लभ्य हुई। इसका एक बड़ा कारण कांग्रेस और गांधीजी का नेतृत्व था। एक तो कांग्रेस में हिंदू रुझान के कई बड़े नेता थे, जो व्यापक हिंदू समाज और भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते थे। दूसरी बात यह कि स्वयं गांधीजी जिस ‘धर्मयुक्त’ राजनीतिह्ण की बात कर रहे थे और जिन प्रतीकों को इस्तेमाल कर रहे थे वे मूलत: खांटी देशी थे और कहीं न कहीं आम हिंदू उनसे गहरे जुड़ा था। दूसरे शब्दों में कहें तो हिंदू आकांक्षाओं को व्यापक भारतीयता में विन्यस्त कर गांधीजी और स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष चलाया। हिंदू देश (राष्ट्र) के आग्रही लोग स्वतंत्रता आंदोलन से दूरी बना कर हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों के माध्यम से एक समांतर धारा चलाते रहे। स्वतंत्रता आंदोलन में इनका योगदान बहुत सीमित था। 


धार्मिक आधार पर विभाजन के बाद भी भारत में ‘हिंदुओं का राज’ नहीं आया, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के पूर्व घोषित लक्ष्यों के अनुरूप एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की स्थापना हुई। इस प्रकार बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में ही जो हिंदू एजेंडा आकार ले रहा था, उसे पहला बड़ा धक्का भारत विभाजन से लगा। एक ओर तो इससे अखंड भारत के टुकड़े हो गए, तो दूसरी ओर इस विभाजन का कारण मुसलिम लीग के साथ हिंदू संगठनों को भी बताया गया, खासकर कांग्रेस द्वारा, क्योंकि हिंदू नेता भी धर्म के आधार पर हिंदुओं-मुसलमानों की राष्ट्रीयताओं में फर्क करते थे। 

अभी यह सदमा ताजा ही था कि स्वाधीनता प्राप्ति के छह माह बाद गांधीजी की हत्या कर दी गई- उग्र हिंदुत्ववादियों द्वारा! यह इतना भयानक दुष्कृत्य था कि इससे हिंदू एजेंडा एकदम से पीछे, पृष्ठभूमि में चला गया। जनभावना हिंदुत्ववादियों के खिलाफ हो गई, महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस घटना से सरदार पटेल जैसे नेता भी निस्तेज हो गए। यहां उल्लेख करना आवश्यक है कि पटेल आजादी की मंजिल तक पहुंचते-पहुंचते मुसलिम लीग के लिए सबसे बड़े दुश्मन बन गए थे, इसके पहले गांधीजी लीग के दुश्मन नंबर एक रहे थे। पटेल खुल कर अपनी बात रखते थे और एकदम सामने आकर लीग को जवाब देते थे, उस समय यह काम करने वाला और कोई था भी नहीं। लेकिन लीग के अलावा नेहरू, आजाद सहित समाजवादियों की आंख की भी किरकिरी पटेल बने हुए थे। 

गांधीजी की हत्या के बाद पटेल सहित कांग्रेस के वे सभी नेता, जिनको हिंदू-हितों की परवाह करने वाला माना जाता था, जिनकी पहचान ‘संकीर्ण’ और ‘परंपरावादी’ के रूप में थी, ‘दब’ गए या रक्षात्मक हो गए। पटेल की पहल पर आजादी के फौरन बाद सोमनाथ के जीर्णोद्वार का काम हाथ में लिया गया, जिसे केएम मुंशी ने पूरा कराया। 1951 में नए मंदिर की आधारशिला रखने खुद राजेंद्र प्रसाद गए थे। नेहरूजी ने तब हिंदू पुनरुत्थान का प्रयास कह कर इसकी आलोचना की थी, जबकि प्रसाद और मुंशी ने इसे ‘स्वतंत्रता का फल’ और अतीत में हुए अन्याय को दुरुस्त करना बताया था। 

स्वतंत्र भारत में नेहरूजी के नेतृत्व में उनके सपनों के अनुरूप एक सशक्त समाजवादी भारत का निर्माण अब प्रत्येक देशवासी की कामना थी। सभी भारतवासियों को एक नई भारतीय पहचान मिली। इस बीच हिंदू भावनाओं को सहलाने का पहला महत्त्वपूर्ण प्रयास हुआ सोमनाथ के जीर्णोद्वार से, जिसकी चर्चा की गई। इधर विभाजन के बाद भी जो मुसलमान भारत में रह गए, वे अपनी शर्तों पर यहां नहीं रुके थे, बल्कि मिट्टी से जुड़ाव और मातृभूमि से प्रेम के कारण ही खतरा मोल लेकर भी यहां रह गए। अजीब स्थिति तब बननी शुरू हुई, जबकि एक के बाद एक सरकारों ने उनकी तरफ से खुद ही शर्तें बांधनी शुरू कर दीं- धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक अधिकारों के नाम पर। जबकि हमारा संविधान किसी भी स्तर पर दो नागरिकों के बीच भेद नहीं करता था। 

चुनाव जीतने के समीकरणों के तहत ‘थोक वोट’ की अभिलाषा में मुसलमान राजनीति के केंद्र में लाए गए। आजादी के बाद समाज सुधार के काम को आगे बढ़ाने के लिए सरकार ने हिंदू विश्वासों और परंपराओं में हस्तक्षेप करने के लिए तो अपने को अधिकृत माना, लेकिन मुसलिम सहित अन्य पद्धतियों और परंपराओं की ओर से तटस्थ रही। कायदे से ‘एक समान नागरिक संहिता’ को जल्द से जल्द लागू करने की ओर सरकार को बढ़ना था, लेकिन यह ‘समाजवादी लक्ष्य’ लगातार दूर होता चला गया और आज तो यह असंभव की सीमा के अंदर दिखता है। सरकारों की ‘भारतीयता’ को बढ़ाने में रुचि कम रही, विभाजन पैदा करने से मतलब ज्यादा रहा। 

मुसलिम प्रथाओं में सुधार का एक अवसर सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो मुकदमे के फैसले में उपलब्ध कराया था, लेकिन मुसलिम संगठनों के विरोध के बाद इस निर्णय को संसद द्वारा पलट दिया गया। वास्तव में कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्ष सरकारों ने सुविधानुसार ‘धर्मनिरपेक्षता’ का इस्तेमाल किया, कभी इसका पलड़ा मुसलमानों की ओर झुकाया तो कभी हिंदुओं के पक्ष में। सलमान रुश्दी और तसलीमा नसरीन के मामलों में मुसलिम कट्टरपंथ को खुश किया गया तो हुसेन के मामले हिंदू कट्टरपंथियों को। शाहबानो मामले में जब सरकार की भद हुई तो संतुलन स्थापित करने के लिए अयोध्या में राम मंदिर का ताला खोल दिया गया। यही वह बिंदु है, जहां से हिंदुत्व की राजनीति उग्र हुई और इसने अखिल भारतीय विस्तार पाया। 

वर्ष 1951 में जनसंघ की स्थापना के साथ हिंदुत्ववादी संसदीय राजनीति में दाखिल हुए, लेकिन लगातार हाशिये पर रहे। 1967 की संविद सरकारों


में और इसके दस साल बाद आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी में एक घटक के रूप में जनसंघ शामिल हुआ। 1980 में जनसंघ जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी बन गया। चार साल बाद इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए आम चुनावों में पहली बार कांग्रेस ‘हिंदू लहर’ पर सवार होकर चार सौ चौदह सीटें लेकर संसद में आई। उसके बाद घटनाओं की पूरी शृंखला है। दिल्ली में सत्ता के भंगुर प्रयोगों ने भाजपा को जगह बनाने का मौका दिया। 

इस बीच सांप्रदायिकता-विरोध के नाम पर ब्राह्मणवाद, सवर्णवाद आदि को लगातार निशाने पर लिया जाता रहा और बहुसंख्यक समाज की चिंताओं और सरोकारों की अनदेखी की गई। सांप्रदायिकता-विरोध हिंदू-विरोध की सीमा में दाखिल हो गया। हिंदू दक्षिणपंथी उभार को बुद्धिजीवियों ने घृणा और तिरस्कार से देखा, कभी तार्किक ढंग से ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में उसे समझने की कोशिश नहीं की गई। देश में शायद ही कोई ऐसा लेखक हो, जिसने इन आंदोलनों के बारे में सहानुभूति की एक पंक्ति लिखी हो। बीएस नॉयपाल और सैमुएल हट्टिंगटन जैसे विचारकों ने इसे अनहोनी के रूप में न देख कर इसका औचित्य सिद्ध करने की कोशिश की तो हठात वे बौने बुद्धिजीवी सिद्ध किए जाने लगे। 

हद तो तब होने लगी जब हिंदू-पक्ष में पारित न्यायादेशों की भी आलोचना की जाने लगी। लेखक समाज की तो ऐसी स्थिति बनी कि जो धर्म (हिंदू) छोड़ कर ‘सेक्युलर’ हो जाए वही लेखक होने की अर्हता प्राप्त कर सकता है, लेकिन इतनी ही कड़ी परीक्षा दूसरे धर्मावलंबियों के लिए नहीं। और जब यह सब कुछ हो रहा था तो भाजपा और संघ का काडर जमीन पर जनसंपर्क कर रहा था। उसे मालूम था कि हिंदुत्व का अर्थ न तो मनुवाद है, न ब्राह्मणवाद। हिंदू राजनीति अगड़े-पिछड़े-दलित की फांकों में वैसी नहीं बंटी है जैसी विरोधी उसे देखना चाहते हैं। हिंदुत्व के लिए कटिबद्ध संघ तो मंदिरों में दलित पुजारियों को आसन दे रहा था, ब्राह्मण-वर्चस्व के रहते भी। उसके मुख्यालय में, उसकी शाखाओं में किसी की जाति नहीं पूछी जाती। 

हिंदू धर्म-पंथ प्रकृति और मनुष्य के साहचर्य से विकसित हुआ है, किसी एक को इसे बनाने, अवतरित करने का श्रेय नहीं है, सबके योग से यह विकासमान रहा है- चाहे वह अवतार हों, व्यक्ति हों, या गं्रथ। बहुता, बहुलता इसका आधार है, लेकिन सायुज्यता इसका मर्म है। इसे खंड-खंड करके देखा-समझा नहीं जा सकता। धर्म या पंथ मानने वालों के विश्वास पर टिकता है। हिंदू धर्म में विश्वास या आस्था की कोई एक अभिव्यक्ति नहीं है। कर्मकांड और सामाजिक संस्तरण हिंदुत्व का एकमात्र सत्य नहीं है, बल्कि एक पक्ष है जो स्थिर नहीं है, परिवर्तनशील है। आज का हिंदू समाज ‘मनु के युग’ का समाज नहीं है, लाख विरोधाभासों के रहते भी। तो चुनाव में जहां निशाना साधा जा रहा था, लक्ष्य वहां था ही नहीं! 

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की धारा अनेक उपधाराओं से मिल कर बनी थी- सभी का भारत की मुक्ति का अपना स्वप्न था, अपनी आकांक्षाएं और अपेक्षाएं थीं। इनमें मध्यमार्गियों के अलावा समाजवादी, वामपंथी, हिंदुत्व, दलित और मुसलिम धारा प्रमुख थी। भारत की स्वतंत्रता जरूर एक साझा लक्ष्य था, लेकिन इसे इनके नेता अपने ढंग से परिभाषित करते थे- इनका अलग-अलग एजेंडा था। गांधीजी, जवाहरलाल, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, राजेंद्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, आंबेडकर, जिन्ना, नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, नम्बूदरीपाद, रणदिवे, डांगे आदि 1946-47 तक देश के प्रमुख नेता थे, जो कमोबेश विभिन्न धाराओं का प्रतिनिधित्व करते थे। 

देश स्वतंत्र हुआ तो मध्यमार्गियों की अभिलाषा पूरी हुई- नेहरू, पटेल, प्रसाद नवस्वतंत्र देश के अभिभावक बने। नेहरूजी मध्यमार्गियों के नेता थे ही, समाजवादी रुझानों के कारण समाजवादियों और वामपंथियों में भी बहुत लोकप्रिय थे। समाजवादियों और वामपंथियों को नेहरूजी के प्रधानमंत्रित्व में अपना एजेंडा पूरा होता दिखा। पाकिस्तान बनने के साथ मुसलिम धारा (लीग) का एजेंडा पूरा हुआ। मुसलिमों के लिए अलग से पाकिस्तान तो बना ही, समान नागरिकता के आधार पर भारत भी उनका देश! दलित राजनीति की सबसे बड़ी उपलब्धि यह हुई कि संविधान सभा में आंबेडकर को प्रारूप समिति का जिम्मा सौंपा गया। बची हिंदू राजनीति, जिसके हाथ आया ‘जंबू द्वीपे भारत खंडे’ के स्थान पर कटा-फटा देश, रक्तपात, विस्थापन, देशांतरण और... गांधी-हत्या का कलंक और अपराध-बोध! 

एक धार्मिक समुदाय (वह भी अस्सी प्रतिशत की बहुसंख्या के साथ) के प्रतिनिधित्व का दावा करने वाली हिंदुत्व की राजनीति का एजेंडा तब से अनसुलझा पड़ा है। आश्चर्य की बात यह है कि महासभा, संघ या भाजपा के लोग इसे या तो ठीक से समझते नहीं रहे या देश को समझा नहीं पाए। मुसलिम-विरोध ने इस एजेंडे को पूरी तरह ढंक लिया। ऐसे में व्यापक जन-समुदाय की सहानुभूति इसके साथ नहीं जुड़ी और यह उचित भी था, क्योंकि पंद्रह अगस्त, उन्नीस सौ सैंतालीस को जो भारत बना, उसी के लिए जीना-मरना हम सबकी नियति है, कोई इसे बदल नहीं सकता। इसीलिए स्वतंत्र भारत में हिंदुओं ने अपनी पहचान को ‘भारतीय’ में समाहित हो जाने दिया, यह श्रेय तो पूरी तरह धर्मनिरपेक्षतावादियों को जाना चाहिए, जिनकी बदौलत इस चुनाव में हिंदू वापस हिंदू हो गए।


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta



आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?