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बैलगाड़ी PDF Print E-mail
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Friday, 13 June 2014 11:28

प्रयाग शुक्ल

जनसत्ता 13 जून, 2014 : मैं  बैलगाड़ी में बहुत दिनों से नहीं बैठा। गांव से वैसा रिश्ता भी अब नहीं है, जैसा आज से पचपन-साठ वर्ष पहले अपने बचपन और किशोर दिनों में था। पर आज भी कभी अखबार में बैलगाड़ियों की दौड़ की कोई तस्वीर देखता हूं, तो मन में उसे देख कर उसमें बैठने की इच्छा होती है। और आपको बताऊं कि बचपन के बैलगाड़ी-हिचकोले मैं मानो फिर से महसूस करने लगता हूं। इसमें निश्चय ही नॉस्टेल्जिया और एक रूमानी खयाल भी शामिल है, यह मैं जानता हूं। पर रोमांटिक होने को मैं बुरा नहीं मानता। उसके बिना जीवन-बोध के बहुतेरे मर्म और स्पर्श हम तक पहुंच ही नहीं सकते।

बहरहाल, बैलगाड़ी-छवियां मुझमें कई तरंगें उपजाती हैं, कई स्मृतियां वापस लाती हैं, कई चेहरे भी और मन में आज भी वे जो हुलास भरती हैं, उसके लिए मैं बैलगाड़ी का कृतज्ञ हो उठता हूं। ऐसा नहीं कि बैलगाड़ी अब केवल तस्वीरों में देखता हूं। देखता उसे यथार्थ में भी हूं। मसलन कर्नाटक जाऊं या गुजरात, महाराष्ट्र या बंगाल, वहां किसी कार-टैक्सी, बस, ट्रेन की खिड़की से या पैदल चलते हुए जो बैलगाड़ी देखता हूं, उसकी बनावट-सजावट एक-सी नहीं होती है। कहीं वह छोटे पहियों वाली है, कहीं लंबे गोल पहियों वाली, कहीं भारी पहियों वाली, कहीं बांस की, कहीं लकड़ी की और कहीं टायरी पहियों वाली। रथनुमा, कहीं-कहीं खुली हुई। सचमुच हमारे देश में, भिन्न प्रदेशों में, बैलगाड़ी और बैलों के भी के अपने-अपने रंग-रूप रहे हैं। उनकी किसानी-सज्जा के भी। सो, कहीं सींगों को रंगने की परंपरा भी है। बैल-वस्त्रों में कई रंग-रूप देखने को मिलते ही रहे हैं।

धीरे-धीरे गांवों-कस्बों में ट्रैक्टरों, मोटर साइकिलों, बसों, ट्रकों और कारों की ही बहुतायत हुई है। इस बहुतायत ने बैलगाड़ी, तांगों-रिक्शों, ऊंटगाड़ी आदि को कहीं-कहीं अपदस्थ कर दिया है। गनीमत है कि बैलगाड़ी अभी दृश्य से चली नहीं गई है। इस विशाल देश के कई भू-भागों में अब भी उसकी उपस्थिति है। लेकिन धीरे-धीरे इस उपस्थिति में कमी आएगी, यह तो कहा ही जा सकता है। हमारी फिल्मों में भी अब वैसे बैलगाड़ी दृश्य देखने को नहीं मिलते जो ‘मदर इंडिया’ और ‘तीसरी कसम’ जैसी फिल्मों में देखने को मिलते थे। ‘तीसरी कसम’ का गाड़ीवान, राजकपूर जैसा अभिनेता भी इस तरह की भूमिका के लिए लालायित रहता था। साहित्य की बात करें तो वहां प्रेमचंद, रेणु, मार्कण्डेय, शिवप्रसाद सिंह आदि में गांव जब आता था तो आमतौर पर बैलगाड़ी के बिना तो आता नहीं था। श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ तक आते-आते ट्रक भारी हो उठा। वह एक अलग ही शोध का विषय है।

पहले बैलगाड़ी नगरों-महानगरों में भी दिख जाती थी, पर अब दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में तो कारों का ही हुजूम है। टैÑफिक जाम के समय वे


कुछ बैलों की तरह कभी-कभी बिदक भले उठती हों, अन्यथा कहां गाड़ी और कहां बैलगाड़ी! मर्सीडीज, बीएमडब्ल्यू आदि बैलगाड़ी को पास भी न फटकने दें। उनके लिए किसी पार्किंग जोन में अब जगह का सवाल ही नहीं उठता। पहले बैलगाड़ियां शहर के किसी आखिरी छोर पर दिख भी जाती थीं, पर अब तो चंद दिनों बाद ही हर नगर-महानगर का कोई आखिरी हिस्सा बहुमंजिला फ्लैटों की बलि चढ़ जाता है और बैलगाड़ी भी और दूर चली जाती है। इस बहुमंजिला विकास के चलते खेत बचेंगे भी तो कब तक बचेंगे, कहना कठिन है। कभी-कभी लगता है, मकान होंगे, पर किसान न होंगे, खेत न होंगे, फसलें न होंगी... और बैलगाड़ी भी न होगी। ऐसी कल्पना से ही मन कांप उठता है।

बैलगाड़ी थी तो लोकगीत और लोकरंग भी बहुतेरे थे। रेणु की कहानी ‘लालपान की बेगम’ की याद हो आती है। जो भी हो, दौड़ बैलगाड़ियों की हो या केरल जैसे प्रदेशों में नौकाओं की, जब भी होती है, मन को कुछ हरा और तरल तो कर ही जाती है। उनके आयोजकों को बधाई प्रेषित करने का मन करता है। हिंदी कविता की ओर देखता हूं तो वहां ‘बैल’ हैं, शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ सिंह के यहां- और बड़े सशक्त ढंग से हैं। हां, बैलगाड़ी जरा कम है। पर केदारजी के नए संग्रह ‘सृष्टि पर पहरा’ में एक कविता ‘बैलों का संगीत-प्रेम’ दिखाई पड़ी जो आज के बैलगाड़ी-प्रसंग में भी कितनी सटीक मालूम पड़ती है। कविता है : ‘शहर की ओर जाते हुए/ अपनी बीहड़ आजादी में/ सड़क के किनारे/ ठिठक गए थे बैल/ बगल के खेत में ट्रैक्टर के चलने का/ संगीत सुनते हुए/ कितना त्रासद था/ कितना मुग्धकारी/ बैलों का वह संगीत-प्रेम/ यह मेरे समय का संगीत है- मैंने स्वयं से कहा/ और ठिठक गया मैं भी।’

इस वक्त मैं पुरानी स्मृतियों के सहारे मानो उन बैलगाड़ियों के चलने की ध्वनि सुन रहा हूं और उनके साथ उड़ने वाली धूल भी ‘देख’ रहा हूं। उन बैलों और गाड़ियों का आभार व्यक्त कर रहा हूं, जिन पर बैठ कर कभी अपनी नानी, कभी अपनी मौसी के घरों-गांवों की यात्राएं पूरी की थीं।


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