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Wednesday, 11 June 2014 02:06

उर्मिलेश

 जनसत्ता 11 जून, 2014 : संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में राष्ट्रपति के अभिभाषण

में कही बातों या महज पंद्रह दिनों के सरकारी कामकाज से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की भावी राजनीतिक-प्रशासनिक दिशा-दशा पर निर्णायक ढंग की टिप्पणी करना फिलहाल न्यायसंगत नहीं होगा। सरकार अभी तो अपना नक्शा पेश कर रही है, नया कुछ करके दिखाना बाकी है। जो संकेत मिल रहे हैं, वे मिले-जुले किस्म के हैं। एक तरफ यह सरकार आशा जगाती है तो दूसरी तरफ कुछ आशंकाएं भी। लोकसभा चुनाव के बाद राष्ट्रपति का पहला अभिभाषण नई सरकार का नीतिगत दस्तावेज माना जाता है। इस अभिभाषण में भाजपा के चुनाव घोषणापत्र के मुख्य बिंदु और प्रचार अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी के भाषण में उठाए अनेक मुद््दे प्रमुखता से शामिल हैं। यहां तक कि ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ या ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ जैसे उनके कुछ अहम चुनावी नारों को भी अभिभाषण में जगह मिली है। ‘फाइव-टी’ और ‘थ्री-डी’ जैसी जुमलेबाजी को भी राष्ट्रपति के अभिभाषण में शामिल कर लिया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने चुनावी भाषणों में आलंकारिकता लाने के लिए इनका अक्सर प्रयोग किया करते थे। अभिभाषण में नए-पुराने ढंग के अनेक वायदे और दावे हैं, पर इन्हेंअमली जामा पहनाने की दिशा की व्याख्या नहीं है। 

सबसे दिलचस्प और स्वागतयोग्य बात है कि इसमें भाजपा के घोषणापत्र या संघ-वैचारिकी के कुछ खास विवादास्पद मुद््दों को शामिल नहीं किया गया। ये तीन खास मुद््दे हैं- मंदिर-मस्जिद विवाद में मंदिर-निर्माण का एकतरफा संकल्प, पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करना और जम्मू कश्मीर के संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 370 का खात्मा। सबसे बड़ा सवाल है, मोदी सरकार ने राष्ट्रपति के अभिभाषण में इन तीनों मुद््दों को किसी ‘टैक्टिस’ के तहत नहीं शामिल किया या वह इन मुद््दों को वाकई अपने गवर्नेंस के एजेंडे से बाहर रखने का फैसला कर चुकी है?

अभिभाषण में इन तीन खास विवादास्पद मुद्दों की गैरमौजूदगी इसलिए भी गौरतलब है कि सरकार-गठन के कुछ ही घंटे बाद प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से संबद्ध केंद्रीय राज्यमंत्री के हवाले से संविधान के अनुच्छेद 370 के खात्मे की जरूरत पर बहस चलाने की कोशिश हुई थी। कश्मीर में इसका भारी विरोध हुआ और विवाद खड़ा हो गया। लेकिन भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेताओं ने विवादास्पद बयान देने वाले केंद्रीय राज्यमंत्री की पीठ ठोंकते हुए कहा कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा, जो भी कहा, वह उनकी पार्टी के घोषणापत्र का हिस्सा है। लेकिन आश्चर्य कि नई सरकार ने राष्ट्रपति के अभिभाषण में इस मुद््दे को भी नहीं शामिल किया। ऐसे में उसे जरूर साफ करना चाहिए कि वह इस मुद््दे को गवर्नेंस के अपने एजेंडे से बाहर रखेगी! अयोध्या में ‘भव्य राममंदिर’ बनाने की एकतरफा पहल और पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू कराने जैसे मुद््दे भी इसी श्रेणी में आते हैं। इसलिए इन पर भी सरकार को सफाई देनी चाहिए। अगर सरकार ने वाकई ध्रुवीकरण की सियासत से प्रेरित ऐसे विवादास्पद मुद््दों को नजरअंदाज करने का फैसला किया है तो इस बात का खुलेआम एलान होना चाहिए। इससे सरकार की प्रतिष्ठा और स्वीकार्यता में और इजाफा होगा।

राष्ट्रपति के अभिभाषण के जरिए मोदी सरकार ने विस्थापित कश्मीरी पंडितों के घाटी में पुनर्वास के अपने चुनावी वायदे को दुहराया है। यह अच्छी बात है और इसमें कहीं कोई सांप्रदायिक या विभाजनकारी संकेत नहीं हैं। लेकिन यह काम केंद्र को राज्य सरकार के साथ मिलजुल कर करना चाहिए। राज्य सरकार पहले से ही इस तरह के प्रस्ताव पर काम करती आ रही है। लेकिन इसमें एक सतर्कता जरूर बरती जानी चाहिए। कश्मीरी पंडितों का एक हिस्सा लंबे अरसे से संविधान के अनुच्छेद-370 के खिलाफ जहर उगलता रहा है और यह बात संघ-भाजपा के नेतृत्व को सुहाती रही है। इस राजनीतिक प्रवृत्ति की जड़ें बहुत पुरानी हैं। संघ, जनसंघ और अब भाजपा का नेतृत्व इसे सन 52-53 के प्रजा परिषद अभियान से जोड़ता आ रहा है। ऐसे में नई सरकार को कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के सवाल को अनुच्छेद-370 से जोड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। 

भाजपा या नई सरकार के सूत्रधारों और रणनीतिकारों पर सिर्फ अपनी पार्टी के किसी खास एजेंडे को आगे बढ़ाने की ही नहीं, इतने बड़े देश को चलाने और इसकी जनता को खुशहाल रखने की भी जिम्मेदारी है। और आज की तारीख में यह उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। संविधान का अनुच्छेद किसी हड़बड़ी या भुलावे में नहीं पारित किया गया था। स्वतंत्रता आंदोलन से उभरे नेतृत्व ने लंबी बहस और समझदारी के तहत इसे पारित किया था! उस वक्त श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने भी उस पर सहमति जताई थी। नेहरू-मंत्रिमंडल से उन्होंने अनुच्छेद-370 को लेकर इस्तीफा नहीं दिया था। उन्होंने नेहरू-लियाकत समझौते पर रोष प्रकट करते हुए सरकार से इस्तीफा दिया और फिर जनसंघ के गठन में जुटे। उसके कुछ समय बाद इस प्रावधान की मुखालफत शुरू की। अनुच्छेद-370 के संवैधानिक प्रावधानों के विस्तार में गए बगैर यहां इतना भर उल्लेख जरूरी है कि कांग्रेसी हुकूमतों ने 1953 से 1965 के बीच इस अनुच्छेद की रोशनी में बने और लागू विभिन्न कानूनी प्रावधानों को इस कदर कमजोर किया और कइयों को खत्म किया कि अब उसमें ज्यादा कुछ नहीं बचा है। संविधान का बस मूल अनुच्छेद ही बचा है, जिस पर जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा ने अपनी मंजूरी की मुहर लगाई थी। 

मगर अपनी चुनावी जीत से उत्साहित भाजपा के कुछ शीर्ष नेता और संघ-समर्थक इसके बचे-खुचे प्रावधानों और अनुच्छेद 370 के हर निशान को मिटा देना चाहते हैं। कैसी विडंबना है, क्षेत्रीय दलों और स्वयं अपने सहयोगियों के सुझाव पर प्रधानमंत्री मोदी जब श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे से बात करते हैं तो जाफना इलाके के तमिलों की प्रांतीय और प्रशासकीय स्वायत्तता का सवाल उठाते हैं, पर भारत के संविधान के अनुच्छेद के तहत प्रदत्त कश्मीरियों की बची-खुची


स्वायत्तता भी उनके राज्यमंत्री या पार्टीजनों को नागवार गुजरती है। भाजपा और उसकी अगुआई वाली केंद्र सरकार कहीं न कहीं उस खतरे का आभास दे रही है, जिसका उसके आलोचकों द्वारा बार-बार जिक्र किया जाता रहा है और वह है- ‘भारत की धारणा या विचार’ (आइडिया आॅफ इंडिया) के प्रति उसका नकारात्मक रवैया! 

इस सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है कि वह इस तरह की आशंकाओं का हमेशा के लिए अंत कर दे। वह खुलकर इस बात का एलान करे कि आजादी की लड़ाई से उभरी भारतीय संवैधानिकता और सेकुलर-लोकतांत्रिकता की रक्षा के लिए वचनबद्ध है। सरकार चलाने वालों को याद दिलाना अप्रासंगिक नहीं होगा कि उन्होंने शपथ-ग्रहण के दौरान संविधान की रक्षा की कसम भी खाई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ऐसी कोई कसम नहीं खाई है, इसलिए वह अपने किसी मनपसंद एजेंडे को उठाने के लिए स्वतंत्र है, पर भाजपा की अगुआई वाली सरकार ऐसा नहीं कर सकती। 

सरकार ने अब तक जो प्राथमिकताएं गिनाई हैं, उनमें कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। महंगाई पर अंकुश लगाना, गरीबी मिटाना, सभी घरों को पक्का कराना-उन्हें बिजली-पानी और शौचालय की सुविधा दिलाना, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना, भ्रष्टाचार पर निर्णायक अंकुश, कालेधन की समांतर अर्थव्यवस्था पर कार्रवाई (इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय की पहल पर सरकार ने पिछले दिनों एक एसआइटी का गठन किया, जो स्वागतयोग्य है), विकास दर में छलांग लगाना और हर वर्ष बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन करना। इन वरीयताओं से भला किसको आपत्ति होगी! पर सरकार यह सब कैसे करेगी, इसका अब तक कोई नक्शा नहीं सुझाया गया है। सिवाय इसके कि सरकार बहुत सारे काम निजी क्षेत्र और पीपीपी मॉडल के तहत करना या कराना चाहती है। 

प्रधानमंत्री मोदी का एक बहुचर्चित मंत्र है- न्यूनतम सरकार, सर्वोत्तम शासन (मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सीमम गवर्नेंस)। दरअसल, यह मोदी साहब का अपना कोई नया मंत्र नहीं है। इस विचार के प्रतिपादक पश्चिम के पूंजीवादी दार्शनिक और अर्थशास्त्री रहे हैं। इस दर्शन के तहत नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि ज्यादातर कामकाज निजी क्षेत्र में या पीपीपी मॉडल के तहत हो। क्या भारत जैसे देश में सबके लिए बेहतर शिक्षा या स्वास्थ्य-सुविधा इस तरह के मॉडल के जरिए मुहैया कराई जा सकती है? अभिभाषण में दावा किया गया है कि सरकार देश के सभी राज्यों में आइआइएम, आइआइटी और एम्स खोलेगी। लेकिन दोहरी शिक्षा प्रणाली पर पूरी खामोशी बरती गई है। नई सरकार का प्राथमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा में क्या नया एजेंडा है, इसका कोई जिक्र नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी देश को चीन-जापान की तरह ताकतवर बनाना चाहते हैं। क्या यह शिक्षा व्यवस्था की खामियों को दूर किए बगैर संभव होगा? 

आश्चर्य कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में शैक्षिक बदलाव पर कुछ भी खास नहीं है। साफ नहीं है कि सरकार किस तरह की शिक्षा-व्यवस्था चाहती है। शिक्षा और स्वास्थ्य में पब्लिक-फंडिंग के लिए सरकार क्या करेगी, इसका कोई ठोस आश्वासन नहीं है। क्या स्वयं पश्चिम के अनेक पूंजीवादी देशों ने शिक्षा और जन-स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सरकारी निवेश नहीं किया है? जिन देशों में ऐसा नहीं किया गया, वहां आज गरीब ही नहीं, मध्यवर्ग भी थैलीशाहों-इंश्योरेंस कंपनियों के मकड़जाल से परेशान होकर आए दिन सरकारों के खिलाफ खड़ा हो रहा है। मोदी सरकार के सामने यह बड़ी चुनौती है। क्या वह कल्याणकारी राज्य की धारणा को मजबूत करेगी या शिक्षा और स्वास्थ्य-क्षेत्र को भी ज्यादा से ज्यादा निजी क्षेत्रों के हवाले करेगी? 

औद्योगीकरण और उत्पाद-निर्माण के अन्य क्षेत्रों में बड़े निवेश, कृषि क्षेत्र में व्याप्त गतिरोध को तोड़े बगैर बड़े पैमाने पर रोजगार-सृजन संभव नहीं होगा। इस बारे में नई सरकार को अपना दृष्टिकोण सामने लाना होगा कि वह इस दिशा में क्या और किस तरह सोचती है? निर्माण और आधारभूत संरचना-विकास के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की चिंता की गई है, पर देश के बड़े औद्योगिक घरानों-कारपोरेट्स ने बीते दस सालों के दौरान खरबों की रकम जमा कर रखी है, घरेलू निवेश से वे कतराते आ रहे हैं। इससे रोजगार-सृजन की दर भी बहुत धीमी रही। विदेश में वे निवेश का मौका तलाशते रहे हैं। अब तक साफ नहीं हो सका है कि नई सरकार इस चुनौती से कैसे निपटेगी? मुझे लगता है, ऐसे तमाम मुद््दों पर ठोस एजेंडा और दृष्टिकोण सामने लाने के लिए सरकार को अभी और वक्त मिलना चाहिए। 

अभी तो इस सरकार का पहला बजट आना बाकी है। बहुत सारे फैसले लंबित हैं। कुछ समय बाद ही सरकार की विकास संबंधी रणनीति और सोच की दिशा और दशा का आकलन किया जा सकेगा। लेकिन प्रारंभिक संकेत बहुत आश्वस्त नहीं करते। सरकार सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए निजी क्षेत्र और कॉरपोरेट पर कुछ ज्यादा ही निर्भरता दिखा रही है, जबकि आज के बड़े कॉरपोरेट घराने समाज और देश से ज्यादा अपना और सिर्फ अपना फायदा देख रहे हैं। ऐसे में जनता के जरूरी सवालों पर अगर कॉरपोरेट-हित हावी होंगे और विकास और प्रगति के एजेंडे पर अगर सामुदायिक-सांप्रदायिक टकराव के मसले भारी पड़ेंगे तो सरकार उस जनादेश के साथ न्याय नहीं कर पाएगी, जिसके आधार पर उसका गठन हुआ है।


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