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बिहार के नए समीकरण PDF Print E-mail
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Tuesday, 10 June 2014 10:11

संजीव चंदन

 जनसत्ता 10 जून, 2014 : लगभग दो दशक बाद बिहार में अस्मिता और सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाली हस्तियां एक साथ आती दिख रही हैं।

केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत भी अस्मिता की राजनीति को सहलाकर ही हासिल हुआ है। ऐसे में बिहार की इन राजनीतिक शक्तियों के पास एक विकल्प था कि वे अपने-अपने सुरक्षित राजनीतिक दायरे में जीवित रहें, या धीरे-धीरे पूर्ण अवसान की ओर बढें। और दूसरा विकल्प था कि पिछड़ों और दलितों की जिस राजनीति के वे नुमाइंदे हैं, उसके हित में वे आपसी एकता की ओर बढें और भारतीय जनता पार्टी के लिए एकतरफा दिख रहे खेल को मुश्किल बना दें। 

यह एक राजनीतिक यथार्थ है कि भारतीय जनता पार्टी ने बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में- जहां सामाजिक न्याय की राजनीति की मजबूत जमीन रही है और जहां पिछड़ों और दलितों की सत्ता ने द्विजों की राजनीतिक सत्ता को हाशिये पर ला छोड़ा है और जिसका पिछले चार दशकों में क्रमिक विकास हुआ है- पिछड़ा और दलित नेतृत्व के विकल्प से ही अपनी उपस्थिति मजबूत की है। पर भारतीय जनता पार्टी और संघ के इन पिछड़ा नेताओं के प्रति द्विज मानस में वैसा आक्रोश या नकार नहीं है, जैसा बिहार में लालू प्रसाद यादव या नीतीश कुमार के प्रति और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और मायावती के प्रति रहा है। नीतीश कुमार को द्विज मानस का समर्थन तब तक ही मिलता रहा है, जब तक लालू यादव के ‘प्रेत’ का वे एकमात्र विकल्प दिखते रहे, एक ऐसा विकल्प, जिसने सवर्णों को उनके स्पेस की वापसी का भरोसा पैदा किया था। लेकिन जैसे ही उन्हें भाजपा के रूप में उनका चिर-हितैषी दल मजबूत दिखा, लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार उन्हें बडे भाई और छोटे भाई की तरह दिखने लगे। 

लालू प्रसाद यादव के प्रति सवर्ण-घृणा के मुख्य कारण उन राजनीतिक परिस्थितियों में छिपे हैं, जो मंडल के बाद की राजनीति से पैदा हुर्इं। कर्पूरी ठाकुर के शासन और बीपी मंडल की सिफारिशों के लागू होने से जो आकांक्षाएं जगी थीं, उन्हें लालू यादव ने मजबूत आधार दिया। पिछड़ों और दलितों को मंडल के बाद से मिली ताकत का राजनीतिक इजहार था लालू यादव का शासन। समाज में उपेक्षित बहुसंख्य समुदाय उत्पादन के संसाधनों से लेकर सांस्कृतिक उत्पादों तक से वंचित था। उसने स्पेस पर दावेदारी की, जिसके कारण सामंती सुकून में जी रहे समाज में हलचल पैदा हुई, जिसे गुंडाराज, जंगलराज और जातिवाद की संज्ञा दी गई। 

जिस किसी ने भी नब्बे के पूर्व के बिहार को प्रगतिशील चेतना की आंखों से देखा होगा, उन्हें याद होगा कि रहने मात्र के लिए छोटे जमीन के टुकड़ों से भी पिछड़ा और दलित समुदायों को बेदखल किया जाता था। थानों, कचहरियों में उनके साथ कैसा अन्यायपूर्ण व्यवहार होता था, सामाजिक जीवन के दैनंदिन में उनके लिए किस स्तर पर अपमान और प्रताड़ना सहज-बोध का हिस्सा थे, यह हर कोई जानता है। स्कूलों-कॉलेजों के दरवाजे या तो बंद थे या शिक्षा उनके लिए अपमान और जहालत से गुजर कर प्राप्त होने वाली दुर्लभ व्यवस्था थी। 

वर्ष 1989 के बाद लालू युग में इन वंचित समुदायों, खासकर पिछड़ों ने अपना दावा ठोंका। थानों, कचहरियों से लेकर स्कूलों-कॉलेजों तक अपनी सशक्त उपस्थिति उन्होंने दर्ज कराई। वे देख रहे थे कि विश्वविद्यालयों में पढ़ाई और शोध का क्या स्तर होता गया है, उन्होंने भी उसी व्यवस्था में अपने लिए डिग्रियां हासिल कीं। सरपरस्ती के लिए राज्य में उनकी अपनी सरकार थी।

बिहार में जातिगत अस्मिता के निर्माण में आजादी के पूर्व से ही यादव, कुर्मी और कोयरी जाति का नेतृत्व रहा था। वर्ष 1933 में बिहार में पिछड़ों की पहली राजनीतिक गोलबंदी के रूप में इन्हीं तीन जातियों ने ‘त्रिवेणी संघ’ का गठन किया था। नीतीश कुमार अपनी जाति और लालू यादव के शासन में उपेक्षित महसूस कर रही अन्य पिछड़ी जातियों की आकांक्षाओं के अगुआ बने और लालू यादव से अलग राजनीतिक राह ली।

अस्मिता की राजनीति की इस अहम घटना को हाशिये पर धकेला जा रहा द्विज समुदाय बड़ी दिलचस्पी से देख रहा था, जिसने अवसर पाते ही वर्ष 2004 में नीतीश कुमार को आगे करते हुए लालू प्रसाद यादव को सत्ता से बाहर कर दिया। नीतीश यहीं से कुशासन, जंगलराज आदि के मिथ के जवाब में सुशासन की बात दोहराने लगे और द्विज आकांक्षाओं के साथ संतुलन बिठाने में लग गए। 

इधर द्विज समुदाय अपने दबदबे की पुनर्वापसी के इंतजार में था। उसका पुराना वर्चस्व बहाल होना इतिहास की धारा को मोड़ने पर ही संभव था, जो नीतीश कुमार या किसी और राजनेता के वश में नहीं था। नीतीश कुमार ने लालू यादव से नफरत करने वाले इस समुदाय को हालांकि संतुष्ट तो किया, लेकिन उनकी अपनी राजनीति की दिशा और गति इसके विपरीत थी, इसीलिए उन्होंने एक राजनीतिक फैसले के तौर पर महादलित, अतिपिछड़ा आदि श्रेणियां बनार्इं और उनकी अस्मिता और आकांक्षाओं को आधार दिया। पंचायतों और अन्य स्थानीय निकायों सहित सरकारी नौकरियों में इन वर्गों के अलावा महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित कराया। 

जमीनी सच्चाई हालांकि यह भी थी कि सवर्ण या द्विज-घृणा के पैमाने पर लालू यादव के बाद दूसरा नंबर नीतीश कुमार का स्वत: बनता चला गया, उनके राजनीतिक फैसलों के


कारण। वे द्विजों के स्वाभाविक चुनाव न होकर मजबूरी के समझौता मात्र थे, जिसका असर लोकसभा चुनाव में दिखा। उनसे बेहतर विकल्प दिखते ही यह समुदाय उनसे दूर जा खड़ा हुआ। इधर अस्मिता और सामाजिक न्याय की राजनीति के अगले चरण के तौर पर जिन जातियों की आकांक्षाओं ने आकार ले लिया था, उन्हें भाजपा के नेतृत्व ने बखूबी खाद-पानी दे दिया है। 

इसीलिए यह वक्त की जरूरत है कि नीतीश कुमार राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के साथ आएं और लालू अपनी बांहें नीतीश के लिए फैला दें। इस नजदीकी से 1933 में ‘त्रिवेणी संघ’ के माध्यम से देखा गया सपना साकार हो सकता है। आज इकहत्तर सालों बाद इन तीन जातियों का एक बड़ा मध्यम वर्ग है, जो अन्य पिछड़ी जातियों को भी राजनीतिक नेतृत्व देने की स्थिति में है। यह गठजोड़ फिर से ‘महादलित’ के रूप में चिह्नित की गर्इं अधिसंख्य दलित जातियों का विश्वास हासिल कर सकता है और सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ अल्पसंख्यकों का समर्थन भी इसे स्वत: हासिल हो जाएगा। 

इस दिशा में राजनीतिक परिपक्वता दिखाते हुए पहले तो नीतीश ने एक महादलित श्रेणी के व्यक्ति को मुख्यमंत्री को गद््दी दी और फिर लालू यादव ने उसे अपना समर्थन घोषित कर दिया। जीतन राम मांझी का मुख्यमंत्री बनना बिहार के राजनीतिक इतिहास में कोई सामान्य बात नहीं है। एक ऐसे राज्य में जहां सामंती ताकतों के खिलाफ आवाज उठाना कभी भी खतरे से खाली नहीं रहा, मांझी के हाथ में बिहार की कमान आना, न सिर्फ राज्य की राजनीति बल्कि सामाजिक परिवर्तन के लिहाज से भी 

बड़ी घटना है।

बिहार में इस ताजा राजनीतिक युगलबंदी के संकेत साफ हैं। इन दोनों छोटे-बडेÞ भाइयों (नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव) के द्वारा भारतीय जनता पार्टी और संघ को कड़ी चुनौती मिलना स्वाभाविक है। यह संभावित गठजोड़ अंतिम तौर पर अगर शक्ल अख्तियार कर पाता है, तो अस्मिता और सामाजिक न्याय की राजनीति को मजबूत और सकारात्मक बनाने की दिशा में जोरदार पहल होगी।

हालांकि इतना ही काफी नहीं होगा। नीतीश कुमार और लालू यादव को अब यह भी तय करना होगा कि राज्य में कैसे एक सांस्कृतिक विकल्प भी पैदा हो। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वंचित समुदायों की शिक्षा और रोजगार उनकी पहली प्राथमिकता होगी। इन दोनों के शासन-काल को सबसे ज्यादा शिक्षा की बदहाली के लिए कोसा जाता है, जबकि हकीकत यह है कि देश भर में शिक्षा की नीतियां गरीब-विरोधी होती गई हैं, जिनमें इन राजनेताओं का दोष यह है कि वे उससे अलग विकल्प पैदा नहीं कर पाए, जबकि इसकी सबसे ज्यादा जरूरत उस तबके को थी, जिसके राजनीतिक दावेदार दोनों ही हैं। 

लालू यादव के समय में शिक्षा देशव्यापी रोग का शिकार हुई, सरकारी ढांचे उपेक्षा के शिकार हुए। लालूजी का दोष यह था कि उन्होंने इन सरकारी ढांचों के बरक्स दूसरे राज्यों की तरह निजी शिक्षा का विकल्प नहीं पैदा किया और न ही सरकारी ढांचों को दुरुस्त किया। नीतीश कुमार के समय में अन्य राज्यों की तरह शिक्षा-व्यवस्था पारा-शिक्षकों (अर्ध या अप्रशिक्षित शिक्षकों) के हवाले होती गई और उच्च शिक्षा में जरूरी राजनीतिक पहल नहीं हुई। 

आज जब इन दोनों के साथ आने की संभावना बनती दिख रही है, तो प्रगतिशील द्विज बुद्धिजीवियों के लिए इससे बिदकने का कोई तर्क नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये दोनों कुल मिला कर वंचितों के सबलीकरण और सुशासन, दोनों ही कड़ियों को जोड़ देते हैं, जो किसी भी राज्य के विकास की पहली शर्त होनी चाहिए। हां, प्रतिगामी द्विज चेतना इस साथ से बेचैन जरूर होगी, क्योंकि दो दशक से वह जिन राजनीतिक खतरों को झेल रही थी, उससे ‘मुक्ति’ का मार्ग अब उसे दिखने लगा था। अब लालू प्रसाद की राजनीति के विरोध से निर्मित नीतीश कुमार से ज्यादा भरोसेमंद सारथी, केंद्र में नरेंद्र मोदी और राज्य में सुशील मोदी मिल गए थे, जो अपनी जातीय उपस्थिति से अस्मिता की राजनीति के दोहन के लिए भी उपयुक्त सिद्ध हुए हैं। 

बिहार के नए बन रहे राजनीतिक समीकरण में वामपंथी पार्टियों के लिए भी आसान होगा कि वे सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ इस मजबूत राजनीतिक विकल्प के साथ खड़े हों। पिछले महीने की सोलह तारीख को, लोकसभा चुनावों के परिणाम आने के बाद, मैंने एक महत्त्वपूर्ण वामपंथी नेता से कहा था कि अब कम्युनिस्ट पार्टियों को भी अस्मिता की राजनीति के प्रति उदार होना चाहिए, नहीं तो संघ ने इस स्पेस को घेरना शुरूकर दिया है, तो उन्होंने प्रतिप्रश्न किया कि ‘कौन-से अस्मिता के राजनीतिज्ञ’। कम-से-कम बिहार में नए बन रहे गठजोड़ की स्थिति में उन्हें असमंजस में नहीं रहना पड़ेगा।


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