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टूटते सपने PDF Print E-mail
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Tuesday, 10 June 2014 10:06

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

जनसत्ता 10 जून, 2014 : यह तो ठीक है कि सबको अपना समय अच्छा लगे, पर ऐसा क्यों होता है कि जिस क्षेत्र में किसी विशेष विधा के जरिए किसी व्यक्ति को ख्याति मिली और राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होने का लाभ मिला, उसी विधा के प्रति वह व्यक्ति उम्र के एक पड़ाव पर आकर उदासीन हो जाता है! आज अगर आप किसी वरिष्ठ डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, कवि, कलाकार, खिलाड़ी, पत्रकार, संगीतकार, गायक, राजनेता, प्रशासक या समीक्षक से बात करें तो वह यही कहता हुआ मिलेगा कि अब पहले जैसा जमाना नहीं रहा। क्या इसकी वजह वह रूमानी सोच है, जिसके तहत सबको अपना जमाना ही श्रेष्ठ लगता है? क्या यही कारण है कि लोग ‘अब न रहे वे पीने वाले, अब न रही वह मधुशाला’ की मानसिकता से सोचते हैं?

एक मशहूर और लोकप्रिय डॉक्टर थे। अस्सी साल के हो जाने के बाद जब वे खुद बीमार पड़े तो एक बड़े डॉक्टर को बुलाया गया। उसने उनसे फीस ली, जबकि सामान्य तौर पर एक डॉक्टर दूसरे डॉक्टर से फीस नहीं लेता। फिर दवाइयां लिखीं। लेकिन बीमार डॉक्टर ने उन्हें लेने से इनकार कर दिया और कहा कि जो डॉक्टर बुनियादी बातों की उपेक्षा कर सिर्फ दवाई लिखता है, ऐसे डॉक्टर से इलाज करवाने के बजाय वे बिना इलाज के मर जाना पसंद करेंगे। इसी तरह साठ के दशक में अंगरेजी के एक विख्यात प्रोफेसर थे। अपने जीवन के अंतिम प्रहर में वे कहने लगे थे कि हमारे देश में अंगरेजी का कोई भविष्य नहीं है, क्योंकि उन्होंने देखा और पाया कि जिन नवयुवकों के कंधों पर कॉलेजों में अंगरेजी सुधारने और सिखाने की जिम्मेदारी है, उनकी खुद की अंगरेजी दोषपूर्ण है। कुछ कवियों का उदाहरण भी मेरे सामने है। साठ और सत्तर के दशक में वे महफिलों की जान थे। लेकिन नब्बे के दशक के बाद उन्होंने जब हास्य और अन्य घटिया किस्म के कथित कलाकारों को समारोहों पर कब्जा करते देखा तो खुद समारोहों से किनारा कर लिया। उनके पलायन से यह स्थिति बनी कि लोग उनका नाम भी भूल गए।

एक पहलवान ने पचास और साठ के दशक में राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाया। पर जब वे सत्तर साल के हो गए तो उन्होंने अखाड़े और दंगल से मुंंह मोड़ लिया। एक पुराने जमाने के नेता हैं जो मेयर, मंत्री और विधानसभा के उपाध्यक्ष भी रहे। लेकिन आज अस्सी साल की उम्र में वर्तमान राजनीतिक स्थिति को देख कर खुद को अप्रासंगिक मानते हैं और राजनीति से नफरत करने लगे हैं। वरिष्ठ पत्रकारों की भी पत्रकारिता के प्रति अरुचि देखी जा सकती है। यहां भी पढ़ने-लिखने वालों की जगह मार्केटिंग और जनसंपर्क में कुशल लोगों की पूछ-परख बढ़ गई है। केएन प्रभु, सुंदर राजन, राजनवाला,


आरसी मोहन, मेनन और प्रभाष जोशी जैसे खेल पर प्रामाणिक और अधिकारपूर्वक लिखने वाले अब कहां हैं!

यह सच है कि लोग अपने बच्चों को अपने ही व्यवसाय में लगाना चाहते हैं। पर बहुत से लोग नहीं चाहते कि उनके बच्चे भी वही काम करें जो वे कर रहे हैं। इसमें भी बहुत हद तक उनका अपने पेशे से मोहभंग होना ही प्रमुख कारण है। मैंने बहुत-से बुजुर्गों को यह शिकायत करते पाया है कि उनके बाद उनके घर में जमा बहुत-सी उन पुस्तकों और संदर्भों का क्या होगा जो उनके पेशे के लिए महत्त्वपूर्ण रहे हैं। विडंबना यह है कि हमारे यहां ही नहीं, किसी भी देश में मनचाहा काम करने की न तो आजादी है और न अवसर। जो मिल जाए वही काम करना पड़ता है। कुछ गिने-चुने बिरले लोगों को ही मनचाहा काम मिल पाता है। यह असंतोष, विडंबना, त्रासदी और नियति ही जिंदगी को घेरे रहती है। पचास और साठ के दशक से क्रिकेट को बड़ी संजीदगी से देखते और हर लेखे-जोखे पर पैनी नजर रखते आ रहे बहुत-से लोगों ने आइपीएल की विश्वसनीयता, बदनामी और तमाशे के बाद क्रिकेट देखना तो दूर, उसकी बात तक करने से तौबा कर लिया है। जाहिर है, उनका क्रिकेट से मोहभंग हो गया है। जबकि दोष क्रिकेट का नहीं, इसमें प्रवेश कर चुकी उस बीमारी का है, जिसने खेल की प्रामाणिकता ही समाप्त कर दी है।

आप देखेंगे कि लगभग सभी क्षेत्रों में ऐसा हो रहा है कि लोग अपनी पसंद बदल रहे हैं। लोग अक्सर यह कहते हुए पाए जाते हैं कि आजकल के गानों में पहले के गानों जैसा माधुर्य नहीं है और नतीजतन वे वैसा असर नहीं छोड़ते। हालांकि कुछ अपवाद भी हैं। खासकर युवा वर्ग कम समय में जब लोगों को अकूत संपत्ति जुटाते हुए देखता है तो उन्हें ही अपना आदर्श मान लेता है। इनमें चमक-दमक, धन-लोलुपता और तेजी से तरक्की करने की लालसा साफ नजर आती है। ये इंतजार करने में नहीं, तेजी से शीर्ष पर पहुंचने में यकीन करते हैं।


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