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सामाजिक न्याय की बलि PDF Print E-mail
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Monday, 09 June 2014 11:33

अनिल चमड़िया

 जनसत्ता 9 जून, 2014 : यह एक तथ्य के रूप में ही नहीं दोहराया जा रहा है कि 1984 के बाद 2014 में ही दिल्ली की गद्दी के लिए

किसी एक पार्टी को बहुमत मिला है, बल्कि इसके राजनीतिक आयाम भी अलग नहीं हैं। 1984 में हिंदुत्ववाद के उभार की एक चरम स्थिति थी, जब राजीव गांधी को दो तिहाई बहुमत मिला था। वह राजनीतिक हिंदुत्ववाद सिख-विरोधी हमलों की उपज था, जो लगातार कई वर्षों तक जारी रहने के बाद इंदिरा गांधी की हत्या के रूप में एक पड़ाव पर पहुंचा था और फिर आम सिख समुदाय पर हमले को सत्ता द्वारा जायज ठहराने की कोशिश की गई। यह महज संयोग नहीं कि तब राजीव गांधी ने न्यूटन की गति के सिद्धांत का जो वाक्य सिख-विरोधी हमले से पहले दोहराया था वही वाक्य गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में आगजनी की घटना के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने भी दोहराया। 2002 में गुजरात में हुए मुसलिम विरोधी हमलों के बाद राजनीतिक हिंदुत्ववाद का उभार अपने वास्तविक नेतृत्व की तलाश में रहा है। 

इस बार के लोकसभा चुनाव परिणाम ऐसे पहले चुनाव परिणाम हैं जिनकी समीक्षा और विश्लेषण तत्काल संभव नहीं दिखते हैं। बौद्धिक समाज का बड़ा हिस्सा इस तरह के चुनाव नतीजों के ठीक-ठीक विश्लेषण करने की क्षमता से जिस तरह चुकता गया है, उसके कारण स्पष्ट हैं। उनके विश्लेषण के तौर-तरीके पुराने पड़ गए हैं। जान-बूझ कर विश्लेषण के पुराने तौर-तरीके इस्तेमाल में लाए जा रहे हों या यह बौद्धिक क्षमता के चुक जाने का मामला हो, इस पर चर्चा यहां अप्रासंगिक हो सकती है। तौर-तरीके जिस तरह के रहे हैं उन्हें समझने के लिए एक उदाहरण के रूप में इस प्रसंग की यहां चर्चा की जा रही है।

1984 में जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आए तो यह माना गया कि देश में राजनीतिक हिंदुत्ववाद का नेतृत्व करने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके संसदीय मंच भारतीय जनता पार्टी का प्रभाव कम हो गया है, क्योंकि वह तब आज की कांग्रेस से भी बदतर हालत में पहुंच चुकी थी। इससे पहले 1971 में ‘दुर्गावतार’ के रूप में इंदिरा गांधी को चुनाव में बहुमत से ज्यादा सीटें मिली थीं, लेकिन 1974 में भ्रष्टाचार और तानाशाही विरोधी आंदोलन के भीतर घुस कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी ताकत कई गुना ज्यादा बढ़ा ली और सत्ता की नीतियों को प्रभावित करने की स्थिति में पहुंच गया। राजीव गांधी की सरकार के खिलाफ चले भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन में भी अपनी पैठ जमा कर भाजपा सत्ता पर सीधे दबाव बनाने की स्थिति में पहुंच गई। तब विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को, वामदलों की तरह, उसका बाहर से समर्थन था। 

कोई भी व्यवस्था समाज में विश्लेषण करने की एक पद्धति विकसित कर देती है। लेकिन वह हमेशा उस व्यवस्था और सत्ता के लिए ही उपयोगी हो सकती है। समाज के वास्तविक भविष्य की थाह के लिए अलग मानकों और विश्लेषण की अलग पद्धति की जरूरत होती है। संसदीय व्यवस्था में सीटों की संख्या से सरकार के बनने-बिगड़ने के खेल का तो विश्लेषण किया जा सकता है, लेकिन उससे समाज में राजनीतिक विचारधारा और उसके विस्तार का सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता। भाजपा को दो सीटें जरूर मिलीं, लेकिन राजनीतिक हिंदुत्ववाद की विचारधारा का विस्तार 1984 में सिख-विरोधी हमलों के रूप में इस तरह से हो गया था कि यह बड़े से बड़े जनसंहार को अंजाम देने में सक्षम साबित हो सकती है। विचारधारा के हितैषी विश्लेषक बुनियादी तौर पर इस बात को लेकर आश्वस्त रहते हैं कि विचारधारा के विस्तार का उत्तराधिकारी आखिरकार उनका मूल संगठन ही हो सकता है। 

सीटों की संख्या चाहे जिस पार्टी की बढ़े-घटे, संघ के प्रमुख यह कहने में हिचकते नहीं हैं कि उनकी विचारधारा और उसके प्रतिनिधियों की पैठ हर पार्टी और संगठन में है। संघ की गतिविधियों का इतिहास देख लें। उसने अपने विचारधारात्मक संगठन का लगातार विस्तार किया है। उसके विस्तार का सही रूप केवल संसद में उसकी एक संसदीय पार्टी की सीटों की संख्या का बढ़ने या शाखाओं की संख्या के बढ़ने-घटने से नहीं आंका जा सकता। उसका उद््देश्य यह रहा है कि वह संसदीय व्यवस्था की तमाम पार्टियों के भीतर हिंदुत्ववाद की एक प्रतिस्पर्धा पैदा करे। पिछड़ों के लिए सरकारी सेवा में आरक्षण के फैसले के बाद 1991 से उसने अपनी सोशल इंजीनियरिंग के तहत यह सतत कोशिश की और बड़ी हद तक कामयाबी भी हासिल की, जैसी कि पहले आरक्षण-विरोधी आंदोलन के बाद उसने गुजरात में हासिल की थी। 

किसी भी संसदीय पार्टी को आप देख सकते हैं, जहां हिंदुत्ववाद के प्रति झुकाव नहीं पैदा हुआ हो। आजतक चैनल पर नरेंद्र मोदी के खास सहयोगी अमित शाह और कांग्रेस के जयराम रमेश के साथ एक ही समय में हुई बातचीत को यहां उद््धृत किया जा रहा है।

गुजरात में सांप्रदायिक हमलों के बाद नरेंद्र मोदी दो बार विधानसभा का चुनाव जीत चुके थे। अमित शाह से पूछा जा रहा था कि उन्हें मुसलिम उम्मीदवार क्यों नहीं मिल रहे हैं? शाह को यह सवाल परेशान नहीं कर रहा था। लेकिन जयराम रमेश से जब पूछा गया कि पिछले चुनाव के मुकाबले वे कम मुसलिम उम्मीदवार क्यों चुनाव मैदान में उतार रहे हैं तो उनके जवाब से उनकी परेशानी स्पष्ट हो रही थी। उन्होंने कहा कि गुजरात में सांप्रदायिक दंगों के बाद वोटो का जो ध्रुवीकरण हुआ है उससे किसी मुसलिम उम्मीदवार


का जीतना काफी कठिन हो गया है। हम उम्मीदवार जीतने के लिए खड़े करते हैं। 

संसदीय पार्टियों के बीच राजनीतिक हिंदुत्ववाद की प्रतिस्पर्धा पैदा करने में संघ की गतिविधियां महत्त्वपूर्ण साबित हुई हैं। संघ की नीतियों ने दो काम किए हैं। एक तो सभी राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को भाजपा और भाजपा नेताओं के साथ सत्ता में हिस्सेदार बना कर संसदीय पार्टियों की धर्मनिरपेक्षता के खोखलेपन को उजागर किया है। उसकी विचारधारा के लिए यह सबसे महत्त्वपूर्ण बात है। धर्मनिरपेक्षता से सबसे ज्यादा खतरा किसी भी धर्म आधारित राजनीतिक विचारधारा को ही हो सकता है। इसीलिए बार-बार इस धर्मनिरपेक्षता को वे छद्म कहते रहे हैं। दूसरा महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि जो सीधे प्रतिस्पर्धा में नहीं उतरे वे प्रकारांतर से हिंदुत्ववाद की राजनीति के शिकार हो गए। भारत में किसी भी धर्म की तरफ राजनीति को जोड़ने का अर्थ हिंदुत्ववाद की राजनीति का शिकार होने के अर्थ में ही अभिव्यक्त होता है। पश्चिम बंगाल में वामदलों की सरकार के दौरान तसलीमा नसरीन को निकाले जाने की घटना इसी तरह की प्रतिस्पर्धा में शामिल होने के एक स्पष्ट उदाहरण के रूप में सामने आया। 

कांग्रेस के बारे में यह स्पष्ट आकलन रहा है कि वह हिंदुत्ववाद के गहरे असर में रही है। अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक स्थितियां और भारतीय समाज की स्थिति और विभिन्न आंदोलनों से उपजी चेतना की स्थिति से हिंदुत्ववाद की एकमात्र पार्टी के रूप में उसके खड़े होने का लाभ उसे नहीं हो सकता था। वह केवल हिंदुत्ववाद की तरफ झुकाव का प्रदर्शन कर सकती थी। संघ के एक प्रवक्ता राकेश सिन्हा एनडीटीवी इंडिया पर ठीक ही कह रहे थे कि भाजपा और संघ कभी नहीं चाहेंगे कि कांग्रेस खत्म हो। संसदीय पार्टियों में हिंदुत्ववाद की प्रतिस्पर्धा पैदा करने का एक माध्यम कांग्रेस ही रही है। कांग्रेस राजनीतिक हिंदुत्ववाद को अपनी संसदीय सत्ता को बनाए रखने के एक औजार के रूप में इस्तेमाल करती रही है जिसे नरम हिंदुत्ववाद भी कहा गया है।

राजनीतिक हिंदुत्ववाद के विस्तार पर भी गौर करें। एक राजीव गांधी का दौर था जब समय से पहले उन्हें देश को इक्कसवीं सदी में ले जाना था- धर्मनिरपेक्ष, समतामूलक और लोकतांत्रिक विचारधाराओं की कीमत पर। वैसा ही दूसरा समय दस वर्षों के उस दौर में आया, जब मनमोहन सिंह ने दुनिया की सबसे बड़ी ताकत के रूप में देश को स्थापित करने का एलान किया। विचारधारा के तौर पर केवल राजनीतिक हिंदुत्ववाद उन कालों में सक्रिय रहा, जब कांग्रेस की सत्ता होने के बावजूद उसकी कार्यशैली और व्यवहार राजनीतिक हिंदुत्ववाद से भिन्न कुछ नहीं था। विचारधाराओं और लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमलों में घोषित तौर पर हिंदुत्ववादी और कांग्रेसी एक साथ दिखने लगे। 

वर्ष 1984 में जो चुनाव नतीजे सामने आए वे 2002 के बाद तत्काल नहीं आ सकते थे। दरअसल, 2014 के चुनाव नतीजों की समीक्षा पिछले किसी एक चुनाव की समीक्षा जैसी नहीं हो सकती। इस परिणाम को तीस वर्षों की राजनीतिक गतिविधियों के साथ ही विश्लेषित किया जा सकता है।

सन 2002 के बाद चुनाव नतीजे गुजरात में पहले की ही तरह आए, लेकिन पूरे देश में हिंदुत्ववाद की शुरू की गई सोशल इंजीनियरिंग की प्रक्रिया चल रही थी। सामाजिक न्याय की विचारधारा को जातिवाद में परिवर्तित करने और सामूहिक चेतना को जातियों में खंडित करने और उसके एक बड़े हिस्से को राजनीतिक हिंदुत्ववाद की चेतना में ढालने की प्रक्रिया आसान नहीं हो सकती थी। मुसलिम-विरोध हिंदुत्ववाद की चेतना का प्रमुख आधार रहा है। वर्ष 1991 में धार्मिक और उसके बाद आतंकवाद की आड़ में हिंदुत्ववाद को विस्तारित करने के रास्ते तैयार होते रहे हैं। 

सामाजिक न्याय की विचारधारा के विस्तार के बजाय दमित-पीड़ित जातियों की संख्या गिनने में संसदीय पार्टियां लगी रहीं और विचारधारा के स्तर पर सुबह-शाम उनका राजनीतिक हिंदुत्वीकरण किया जाता रहा। जनसंचार के माध्यमों ने अपनी पूर्व की भूमिका को और सक्रिय किया और विचारधाराओं के स्थगन की स्थिति में उन्होंने एक तरह से लोगों का मन-मिजाज बनाने वाली एकमात्र मशीन के रूप में खुद को स्थापित कर लिया। इस पूरी प्रक्रिया में 2002 को चुनाव नतीजों में तब्दील होने में इतने वर्ष लग गए। 

वास्तव में 2014 के चुनाव नतीजे 1984 जैसी पृष्ठभूमि के ही देर से आए नतीजे हैं। यह दोहराव ही नतीजों का वास्तविक विश्लेषण है। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यात्रा लंबी है। रांची के एक दोस्त उपेंद्र के रूपक का इस्तेमाल किया जाए तो उनके अनुसार पहले के चुनाव से इस रूप में अंतर आया है कि सात में से तीन उन लोगों ने भाजपा के पक्ष में वोट दिया जो पिछड़े और दलित हैं। राजनीतिक हिंदुत्वीकरण के तौर-तरीकों और उसकी प्रक्रिया की पहचान की अपनी क्षमता लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक राजनीतिक विचारधाराओं के नेतृत्वकारी लोग गंवा रहे हैं। जबकि यह विचारधारात्मक संघर्ष का दौर है।


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