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कहां गया आलम PDF Print E-mail
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Monday, 09 June 2014 11:29

संजीव चंदन

जनसत्ता 9 जून, 2014 : उन दिनों ऐसा लगता था कि दिल्ली को हम बस फतह ही करने आए हैं। इक्कीस साल की उम्र में पहली बार दिल्ली आया था। जहां रहने की जगह मिली, वहां ओड़िशा के तब के मुख्यमंत्री गिरधर गोमांग का परिवार पड़ोसी था। हालांकि जिन सांसद महोदय के फ्लैट में हम दो मित्र थे, उनकी पत्नी ने मुझे कहा था कि दिल्ली जाने पर हम वहां नहीं टिकें। उनका तर्क था कि पढ़ने-लिखने वालों को वैसे माहौल से दूर रहना चहिए। लेकिन जल्दी ही मुझे वहां जाना पड़ा, क्योंकि दिल्ली जाने के बाद पटना के एक ‘आचार्य’ प्रोफेसर के यहां रहते हुए मुझे एक सप्ताह में ही ऊब हो गई थी। वे गीता की पंक्तियां लिखवाते थे और उसमें मेरी कोई रुचि नहीं थी। तो अपने एक दोस्त के साथ मैं सांसद महोदय के फ्लैट में आ गया। साथ में एक और लड़का था। हमें थोड़ी बाधा तब होती, जब सांसद के क्षेत्र के लोग आते थे, अन्यथा उस सुविधासंपन्न इलाके में होना ग्रामीण पृष्ठभूमि के इक्कीस साल के युवा के लिए दिल्ली फतह के अहसास से भर देने वाला था।

वहीं रहते हुए हम मिले थे आलम से। वह कृषि भवन के सामने टेलीफोन बूथ के आगे ठेले पर पान की दुकान लगाता था और किसी सांसद के ‘सर्वेंट क्वार्टर’ में रहता था। उसकी दुकान पर हमेशा भीड़ होती थी। कई नेता, पत्रकार आदि वहीं पान खाते थे। तब मेट्रो ट्रेन शुरू नहीं हुई थी। सीएनजी भी दिल्ली में अनिवार्य होने ही वाला था। बसों का अधिकतम किराया पांच रुपए था जो अगले कुछ दिनों में आठ रुपए हो गया था। मंत्रालयों के गेट पर और सुप्रीम कोर्ट तक में आज जैसा सुरक्षा के घेरे का तामझाम नहीं बढ़ा था। तब संसद पर हमला भी नहीं हुआ था और भाजपा की तेरह महीने वाली सरकार गठित ही हुई थी।

खैर, आलम और बिहार में रह रहे उसके परिवार का आर्थिक आधार उसकी पान की दुकान से होने वाला आय ही था। वह परिवार के प्रति जितना उत्तरदायित्व से भरा था, मित्रों के प्रति भी उतने ही स्वार्थहीन प्रेम से भरा। इसीलिए उसके मित्रों की संख्या काफी थी और कई ग्राहक भी उसे बहुत प्यार करते थे। आलम हम मित्रों की छोटी-छोटी खुशियों का खयाल रखता था, जिसमें हमारे भावनात्मक सुख-दुख से लेकर हमारी जेब की हालत का ध्यान रखना भी शामिल था। तब मैं एक कारोबारी पत्रिका में काम करता था। पैसे कम मिलते थे, लेकिन हाथ खुले थे, इसलिए तंग रहते थे। तब टेलीफोन बूथ पर रात आठ बजे के बाद लंबी कतार लगती थी, आधी दर पर बात करने


के लिए। मैं तब प्रेम में था। आठ बजे के बाद नियमित बात करने का इंतजाम आलम के कारण ही संभव हो पाता था। यानी पैसे कम पड़ने पर आलम का उसमें योगदान।

आलम की वजह से कई लोगों के बड़े-बड़े काम राजनीतिक गलियारों में संभव हो पाए। वह निस्वार्थ मदद करता था। उनमें से ही एक खुशनसीब संजीव पांडे भी हमारे साथ रहने आया था। उसने होटल प्रबंधन कर रखा था और हरियाणा में ‘कंट्री क्लब’ में अपने काम से संतुष्ट नहीं था और किसी पांच सितारा होटल में काम करना चाहता था। आलम ने उसकी समस्या का समाधान किया। तब एक मंत्री के करीबी सहयोगी के कहने से संजीव होटल रेडिसन में नियुक्त हो गया। सुना है, आजकल संजीव विदेश में किसी बड़े होटल में है और उसने मुंबई में दो फ्लैट खरीदे हैं।

और आलम! आलम का आशियाना जल्द ही बिखरने लगा था। दिल्ली तेजी से प्रगति करने लगी। प्रेस क्लब के आसपास का इलाका बदलने लगा। केंद्रीय सचिवालय का मेट्रो स्टेशन प्रस्तावित हो गया। मोबाइल आ जाने से टेलीफोन बूथ का व्यवसाय खत्म हो गया। बाद में वहां की सभी दुकानें हटा दी गर्इं। आलम को भी वहां से हटना पड़ा। वह बाराचट्टी अपने गांव लौट गया था, मैं वर्धा चला गया। बीच में 2008 या 2009 में कभी आलम प्रेस क्लब के पास मिल गया था। शायद दोबारा दिल्ली आया था भाग्य आजमाने। उस इलाके में कई दुकाने हैं, लेकिन कहीं आलम नहीं दिखता है। उसने मोबाइल नंबर दिया था, जो अब लगता ही नहीं है। मैं जब भी वहां जाता हूं तो मेरी निगाहें उसे ढूंढ़ती रहती हैं। वह दूसरों की मदद करता था, अपने लिए एक दुकान नहीं ले पाया। वह पांचों वक्त नमाज नहीं पढ़ता था। दोस्तों के साथ शराब भी पी लेता था। लेकिन वह नेक इरादों वाला यारों का यार एक सच्चा इंसान था। बदलती दिल्ली में आलम गुम हो जाने के लिए अभिशप्त है!


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