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Saturday, 07 June 2014 09:14

गिरिराज किशोर

जनसत्ता 7 जून, 2014 : पिछले इतवार, यानी एक जून को हिंदी के समर्थक और समर्पित लेखक-पत्रकार एचवाइ नारायण दत्तजी का बंगलुरु के अस्पताल में निधन हो गया। उन्होंने अपना सारा जीवन हिंदी के विकास में लगा दिया। मेरा उनसे संपर्क तीन दशक पुराना था। उनके छोटे भाई एचवाइ शारदा प्रसाद दिवंगत इंदिरा गांधी के प्रेस सलाहकार रहे थे। उनका भी हिंदी से लगाव था। हालांकि मेरी नारायण दत्तजी से एक-दो बार ही भेंट हुई थी, पर पत्र-व्यवहार बना रहता था। इसका कारण था उनका गांधीवादी होना। वे कई बार अखबारों में गांधी के बारे में कुछ पढ़ते थे तो मुझे अग्रसारित कर देते थे। दूसरों की मदद करने में वे कभी कोताही नहीं करते थे। एक बार उनके पास गांधीजी पर अंगरेजी में लिखी एक बड़े लेखक की किताब आई। उन्होंने वह किताब कानपुर के ही गांधी-भक्त टंडनजी के माध्यम से मेरे पास भेजी। मुझे लिखा कि मैं उनकी कुछ स्थापनाओं से सहमत नहीं, आप पढ़ें। जिन बातों की ओर संकेत किया था, उनसे मैं भी सहमत नहीं था। मैंने उन्हें लिख दिया। उनका पत्र आया कि जितनी मजबूती से आप असहमत हैं, मैं उतना असहमत नहीं। पर यह जरूर समझता हूं कि अगर लेखक उन बातों को न भी लिखते तो कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं मानता हूं कि किसी भी लेखक के लिए यह आवश्यक नहीं कि वह हर पाठक से सहमत हो। यह बात मुझे बहुत अच्छी लगी। ‘पहला गिरमिटिया’ के बारे में जब लोगों की असहमति मिलती थी, मुझे दत्तजी की बात याद आ जाती थी। यह लेखक के संयम और संतुलन से जुड़ी बात है।

वे पीटीआइ (हिंदी) में ऊंचे पद पर रहे थे। उनके ‘नवनीत डाइजेस्ट’ के संपादक रहते हुए मैंने उन्हें एक लेख भेजा। मेरा खयाल था कि वे उसे छापेंगे, पर वह वापस आ गया। हर लेखक समझता है कि उसकी रचना छपने लायक है। बाद में समझ में आता है कि रचना जहां जा रही है, वहां बैठा संपादक रचना का मूल्यांकन लेखक के व्यक्तिगत नजरिए से अधिक व्यापक दृष्टि से करता है। यह बात उन्होंने बाद में लिखी कि संपादक को ‘ओवर ऑल व्यू’ तो रखना ही पड़ता है; हर पत्रिका की नीति होती है; खुद मुझे लेख पसंद है, पर राजनीति को हमारी पत्रिका प्रोत्साहित नहीं करती। जब बाद में मिले तो काफी देर तक बात करते रहे। मुझे प्रसन्नता हुई कि उन्हें मेरा लेख अभी तक याद था। वह छपने से अधिक संतोष देने वाली घटना थी। अज्ञेयजी बतौर संपादक रचनाओं की स्वीकृति और अस्वीकृति के साथ सुझाव भी भेजते थे। प्रभाषजी भी इस बात का ध्यान रखते थे। मेरा खयाल है, जनसत्ता जैसी कुछ ही जगहों पर यह परंपरा सुरक्षित है।

इस बीच कई ऐसे विद्वान हमें छोड़ कर


चले गए जो दक्षिण भारत से थे, लेकिन उन्होंने हिंदी का केवल प्रचार-प्रसार ही नहीं किया, बल्कि वे उसे अपनी मातृभाषा की तरह प्यार भी करते थे। पिछले दिनों केरल के प्रोफेसर एनइ विश्वनाथ अय्यर का देहांत हुआ था। उन्होंने हिंदी को केरल में बढ़ाने में बहुत योगदान दिया। मैंने ‘अकार’ के संपादकीय में शोकांजलि भी लिखी थी। नारायण दत्तजी भी उसी कोटि के हिंदी समर्थक थे। वे अपनी मातृभाषा में तो लिखते थे। मगर उनका मुख्य कार्य क्षेत्र हिंदी ही था। वे अंगरेजी में भी पारंगत थे। इस युग में वे चाहते तो अंगरेजी में लिख कर कुछ अन्य लेखकों की तरह आगे जा सकते थे। पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। यहां तक कि वे हिंदी में ही हस्ताक्षर करना पसंद करते थे।

हम लोग अन्य भाषाओं से शिकायत करते हैं कि वे हिंदी को महत्त्व नहीं देतीं। यह ठीक है कि हिंदी ने अपने को दूसरी भाषाओं पर थोपने की कोशिश नहीं की, पर हमने अन्य भारतीयों भाषाओं से जुड़ने की भी कोशिश नहीं की। मुझे दुख होता है कि हिंदी के साथ खड़े वे योद्धा एक-एक करके हमें छोड़ते जा रहे हैं, जिन्होंने हिंदी को अपनी मातृभाषा का दर्जा दिया। पर हमारे समाचार पत्र इतने निस्पृह हो गए हैं कि उनके काम को याद करना जरूरी नहीं समझते। भाषा का क्षेत्र धागे की तरह है। यह हम देख चुके हैं जो भाषा आजादी से पहले हर दिल में बसी थी, सरकार की एक गलती से वह सबकी पराई हो गई। जोड़ने में वर्षों लग जाते हैं। यह काम साहित्यकार और पत्रकार ही कर सकते हैं। इसी अखबार में पढ़ा कि इजराइल में हिंदी सीखने के लिए भारतीय उद्यमी रंजीत बारमेजी ने तैंतीस हजार डॉलर के अनुदान की घोषणा की। मुझे मालूम नहीं वे किस प्रदेश से हैं, पर यह हिंदी के लिए उत्साह की बात है। लेकिन असली दायित्व हिंदी पर ही है। कई तरह के स्वार्थों ने हिंदी को रसातल तक पहुंचाया है। ऐसा लगता है कि हिंदी दूसरे देशों से भारत में आएगी!


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