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Friday, 06 June 2014 11:37

कुमार प्रशांत

 जनसत्ता 6 जून, 2014 : कांग्रेस घुटनों के बल बैठ गई है! यह सबसे बुरी स्थिति है। घुटने सलामत हों तो गिरने पर भी आप उठ सकते हैं;

लड़खड़ा गए हैं तो संभल सकते हैं, रास्ता भटक गए तो रास्ता खोज सकते हैं, लेकिन घुटने टेक देने का मतलब होता है, सारी संभावनाओं का अंत! कांग्रेस ने घुटने टेक दिए हैं। 


घुटने टेकने की एक नहीं, कई पहचानें सामने आ रही हैं। आप हार की जिम्मेदारी लेने सीना तान कर आगे नहीं आते हैं; हार का ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ते हैं; हार की आड़ में आपस में लड़ते हैं; आप नया अध्याय शुरू करने और सब कुछ बदल देने की बात नहीं करते हैं। इस बुरी तरह हारने के बाद भी कांग्रेस में यह रस्साकशी कैसे जारी है कि विपक्ष का नेता-पद किसे मिले? वोट नहीं मिले, न सही, कुर्सी भी न मिले, यह कांग्रेस को पच नहीं रहा है, जबकि हालात ऐसे हैं कि उसे नींद भी नहीं आनी चाहिए! यह हार नहीं विशुद्ध अस्वीकार है। 

कांग्रेस को लोगों ने क्यों खारिज किया? जवाब कहीं से नहीं आ रहा है- नेहरू परिवार भी चुप है; और कांग्रेस में पुतले कब बोले हैं कि अब बोलेंगे! मुंबई से पराजित सांसद मिलिंद देवड़ा ने इतना ही तो कहा कि राहुल गांधी के अपरिपक्व सलाहकारों के कारण यह हार हुई है, तो आपने देखा कि कितने लोग उन पर टूट पड़े! कोई कुछ नहीं बोला तो राहुल नहीं बोले। यह दरबार का कायदा है कि राजा या साहबजादे लोगों के मुंह नहीं लगते हैं। यह काम दरबारियों का होता है। राजा का काम इतना ही होता है कि वह दरबारियों को अपना मौन समर्थन दे। कांग्रेस का बंटाधार इन्हीं दरबारियों ने किया है। यह दरबार-रोग कांग्रेस को बहुत पहले लग गया था। नेहरू परिवार उसका कवच बन गया। 

यह कहना बहुत सच नहीं है कि यह एक परिवार की पार्टी है। कांग्रेस पार्टी के भीतर इस परिवार ने वह जगह बड़ी मेहनत से कमाई है। इस परिवार के सदस्यों की फितरत कितनी भी अलग रही है, लेकिन इनके हाथ में तुरुप का एक पत्ता रहा है- वोट निकाल लाना! दूसरे राजनीतिक दलों को यह परिवार इसीलिए सालता है कि उनके पास इस मुकाबले का कोई परिवार नहीं है, अन्यथा स्वामिभक्ति की भारतीय मानसिकता ऐसी है कि आज भारतीय जनता पार्टी में कोई नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक शब्द सुनने को तैयार नहीं है। अगर नरेंद्र मोदी जीत का यह परचम पांच साल बाद भी लहरा सके तो यह आंकना बहुत कठिन नहीं है कि भाजपा में उनका दरबार कैसा होगा!

आज कांग्रेस की परेशानी यह है कि दरबारी रह गए हैं, दरबार नहीं बचा है। नेहरू परिवार के हाथ में अब वोट खींचने वाला वह चुंबक नहीं है। सोनिया गांधी ने अपनी भूमिका बहुत अच्छी तरह पूरी की कि उन्होंने कांग्रेस को बिखरने नहीं दिया। भारतीय धरती और भारतीय राजनीतिक संस्कृति से एकदम अनजान और किसी हद तक उससे अलग-थलग रहने वाली एक विदेशी लड़की के लिए इस जिम्मेदारी को समझना और स्वीकार करना ही मार्के की बात थी। 

सोनिया ने इतना ही नहीं किया, बल्कि वे कांग्रेस की सबसे संयत और विवेकशील आवाज बन कर भी उभरीं। इसमें कांग्रेस की दरबारी मनोवृत्ति ने उनकी खासी मदद की। राहुल और प्रियंका में वह जादू होता तो कांग्रेस यहां से भी गाड़ी खींच ले जाती, याकि फिर राहुल-प्रियंका में वह राजनीतिक प्रौढ़ता होती तो वे पार्टी को दरबारी संस्कृति से बाहर निकाल लाते! दोनों के पास ये दोनों नहीं हैं, और कांग्रेस है; तो वह आज जैसी है इससे अलग और बेहतर कैसे हो सकती है?

आज की कांग्रेस की कुंडली दस साल पहले ही लिखी गई थी। किसी भी तराजू पर तौलें, तो मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के वजन के व्यक्ति नहीं थे। दरबारियों ने जब उनका गलत इस्तेमाल किया और उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया, तब कांग्रेस के भीतर भी किसी ने नहीं सोचा और हमारे राजनीतिक पंडितों और मीडिया ने भी नहीं लिखा-कहा, शोर मचाया कि आप अपना दरबार बचाने के लिए देश के शासन-तंत्र का संतुलन बिगाड़ रहे हैं! तब सब सोनिया के त्याग के गुणगान में लगे थे और भारतीय दरबारी मानसिकता का प्रमाण दे रहे थे। पिछले दस सालों से देश में न कोई सरकार थी, न दिशा थी और न कोई कार्यक्रम था। जब ऐसी दिशाहीनता होती है तब सबसे पहले मानवीय कमजोरियां उभरती हैं। कांग्रेस में वे खूब उभरीं। दस सालों में कांग्रेस का शायद ही कोई मंत्री ऐसा रहा है कि जिसने प्रधानमंत्री की अवमानना न की हो और खुद को सीधे दस जनपथ से जुड़ा न बताया हो। यह सब जनपथ को कबूल था। 

मिली-जुली सरकारों की विशेषता यह होती है कि उनमें आपके पास योग्यता का खजाना बड़ा होता है; उसकी मर्यादा यह होती है कि नेतृत्व अगर कुशल, सक्षम, गतिशील नहीं हुआ तो हर मंत्रालय अपनी सरकार चलाने लगता है। मनमोहन सिंह के पास व्यक्तिगत ईमानदारी थी और नौकरशाह वाली कुशलता थी, लेकिन उनके पास राजनीतिक नेतृत्व की न तो क्षमता थी और न इच्छाशक्ति! उनमें यह हिम्मत भी नहीं थी कि जब लगा कि रथ की बागडोर हाथ में आ ही नहीं रही है, तब रथ ही छोड़ दें! इसलिए वे बने ही रहे और काम कुछ नहीं बना। 

यह समझना कठिन है कि पिछले दस सालों में कांग्रेस ने हमेशा गृहमंत्री की कुर्सी पर अपने सबसे नाकारा सदस्य को क्यों बिठाया? यह समझना और भी कठिन है कि भ्रष्टाचार के हर मामले पर पर्दा डालने में मनमोहन सिंह इतनी तत्परता क्यों दिखाते रहे? भ्रष्टाचार के कुछेक मामलों में जो कानूनी कार्रवाई हुई और कलमाडी, राजा, कनिमोझी जैसे कुछ लोग जेल गए, वह तभी हुआ जब सरकार उन्हें बचाने में एकदम अवश हो गई! फिर ये सब जैसे ही तिहाड़ से बाहर आए, सरकार ने


इन सबको पुनर्स्थापित करने में कुछ भी उठा नहीं रखा। 

ये लोग चीख-चीख कर कह रहे हैं कि हमने काम बहुत किया, लेकिन जनता के पास उसे ले नहीं जा सके! ऐसा कहने में जो झूठ छिपा है वह कोई बताता नहीं है कि आपने काम किसके लिए किया? जनता के लिए किया तो उसे अपने आप जनता के पास पहुंचना चाहिए था। जो ठोस है, धरती पर उतरता है उसे प्रचार की जरूरत नहीं पड़ती है। जो है नहीं, फिर भी उसके होने का भ्रम फैलाना हो, तो उसे बेहद प्रचार की जरूरत पड़ती है जैसे गुजरात मॉडल को बेइंतहा प्रचार की जरूरत पड़ी! 

मनरेगा को कौन नहीं जानता है! कोई भी, कहीं भी आपको बता देगा कि इस योजना की मलाई तो दूसरे खा रहे हैं, हमें तो बचा-खुचा भर कुछ मिल जाता है। मनरेगा ग्रामीण बेरोजगारी को दूर करने की नहीं, राजनेता, ठेकेदार, नौकरशाह की पुरानी तिकड़ी के कमाने-खाने की नई परियोजना के नाम से जानी जाती है। 

दूसरी सारी परियोजनाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ है। सूचना का अधिकार एक ऐसी तजबीज थी कि जिससे राजनेता, ठेकेदार, नौकरशाही के विषैले गठबंधन पर कुछ काबू पाया जा सकता था, लेकिन उसे लेकर सरकारी रवैया ऐसा रहा जैसे कैसे इसे खत्म किया या अप्रभावी बनाया जाए! शिक्षा अभियान, साक्षरता अभियान, अन्न सुरक्षा, आधार कार्ड योजना, गैस सिलिंडर घपला, सीधे बैंक भुगतान घपला, सेना के शीर्ष अधिकारियों से सरकार का विवाद जैसी बातों से लोगों में यह भाव गहराता जा रहा था कि हमारी न कोई सरकार है और न उसका इकबाल है। रुपए की कीमत और सरकार की हैसियत में से कौन ज्यादा तेजी से गिर रहा है, लोग यही हिसाब लगाते रहे।

कोई मंत्रालय ऐसा नहीं था, जहां मनमानी करने वाला मंत्री नहीं बैठा था। इन मंत्रियों में अधिकतर अयोग्य, अहंकारी, भ्रष्ट और चापलूस थे। सत्ता में येनकेनप्रकारेण बने रहने के कारण कांग्रेसियों में एक यह भाव भी जड़ जमा चुका है कि वे सत्ता में रहने के लिए ही बने हैं! इससे जन सामान्य के प्रति हिकारत और आईना दिखाने वालों के प्रति गुस्सा कांग्रेस का स्थायी भाव बन गया है। 

अण्णा हजारे देश का मन उद्वेलित कर रहे थे। देश भर से उमड़-उमड़ कर अनगिनत लोग दिल्ली पहुंच रहे थे। लेकिन उसकी कोई लहर मनमोहन-सोनिया-राहुल तक पहुंची ही नहीं। वहां तो अपने को तीसमार खां समझने वालों की टोली थी, जो उस पूरे आंदोलन को विफल करने में लगी हुई थी। उसने अपने सबसे शातिर मंत्रियों को, जिनमें से कोई इस बार अपना चुनाव भी नहीं जीत सका है, उनके पीछे छोड़ दिया! रामलीला मैदान वाले अपने प्रदर्शन में रामदेव जितनी बेईमानी कर रहे थे, सरकारी बेईमानी उससे बीस ही थी। अण्णा के उपवास को लेकर संसद के विशेष सत्र में भी सरकारी बेईमानी ऐसी हुई कि जिसे सारे देश ने देखा, समझा और गांठ बांध ली। 

राहुल गांधी ने उसी वक्त लोकसभा में पहली दफा अपना मुंह खोला और तभी सारे देश ने देखा कि कांग्रेस उनके पांव में, उनके नाप से बड़ा जूता पहनाने की कोशिश कर रही है। राहुल न केवल राजनीति के गंभीर विद्यार्थी नहीं, बल्कि गहरी अहमन्यता के शिकार भी हैं। वे अपनी पार्टी में और उस रास्ते सारे देश में जैसी राजनीतिक व्यवस्था लाना चाहते हैं (?) अपनी कार्यशैली और तेवर में उससे एकदम उल्टी भूमिका लेते हैं। वे और उनके दरबारी ऐसा माहौल बनाते रहे कि यह प्रधानमंत्री तो नाकारा है, असली प्रधानमंत्री तो हमने छिपा रखा है, जो जादूगर की तरह हैट में से खरगोश निकाल कर दिखाएगा। जब मौका आया तो न जादूगर था, न हैट और न खरगोश निकालने की कला! उसमें से निकले नरेंद्र मोदी! 

कांग्रेस लोकसभा में अपने सांसदों की संख्या ही देखती रहेगी तो इस गड््ढे में से कभी बाहर नहीं आ सकेगी। राहुल खानदान से बाहर निकल कर, अपनी टीम के साथ कांग्रेस का संगठन बनाने में लगें, राज्यों में पार्टी को मजबूत बनाएं और वहां प्रभावी स्थानीय नेतृत्व खड़ा हो, इसकी रणनीति बने तो कायापलट हो सकता है। कांग्रेस को इस बात का अहसास होना ही चाहिए कि नरेंद्र मोदी चतुर राजनीतिक और योग्य प्रशासक हैं। वे संकल्पवान हैं और आत्मविश्वास से भरपूर भी! कांग्रेस ने देश को जैसी अवस्था में पहुंचा दिया है, उसमें नरेंद्र मोदी का थोड़ा काम भी बहुत बड़ा नजर आएगा और राजग उसका पूरा मनोवैज्ञानिक लाभ उठाएगा। 

नरेंद्र मोदी जैसी सत्ता चलाने के अभ्यस्त रहे हैं, उसमें संघ परिवार आदि के दबाव का जाल भी काटने की कोशिश वे कर सकते हैं और अगर ऐसा हुआ तो यह सरकार एक सक्षम कांग्रेसी सरकार की कमी पूरी करती दिखाई देगी। फिर देश नरेंद्र मोदी की तरफ ज्यादा झुकेगा और राहुल-कांग्रेस का काम कठिनतर होगा। इसलिए यह कांग्रेस और राहुल की क्षमता, प्रतिबद्धता, सपनों और उन्हें साकार करने की दीवानगी की परीक्षा का दौर है। 

नेहरू परिवार का वह जादू टूट चुका है, जिसके आभा-मंडल में जीने का राहुल को अभ्यास है। इसलिए बहुत संभव है कि कांग्रेस में आने वाले नए चेहरे उनकी जन्मना पहचान की कद्र न करें। यह राजनीतिक बराबरी स्वीकार कर चलने का कलेजा राहुल के पास होना चाहिए। 


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