मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
हादसों की सड़क PDF Print E-mail
User Rating: / 1
PoorBest 
Friday, 06 June 2014 11:31

सुनील तिवारी

जनसत्ता 6 जून, 2014 : अधिकतर सड़क दुर्घटनाओं के शिकार लोग साधारण पृष्ठभूमि से होते हैं। शायद यही वजह है कि ऐसी घटनाएं अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पातीं। लेकिन दिल्ली में एक सड़क हादसे में केंद्रीय मंत्री गोपीनाथ मुंडे के निधन ने एक बार फिर इस गहराती समस्या की ओर देश का ध्यान खींचा है। हालांकि ऐसे हादसे हमारे देश में बेहद आम हैं। आंकड़ों के मुताबिक यहां हर एक मिनट में एक सड़क दुर्घटना होती है और हर तीन मिनट में इन हादसों में एक जान जाती है। दुनिया में सबसे ज्यादा सड़क हादसे भारत में ही होते हैं और इस मामले में चीन, रूस और अमेरिका जैसे कई देश भारत से काफी पीछे हैं। जबकि इन देशों में भारत की अपेक्षा कहीं अधिक संख्या में कारें हैं। राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2012 में एक लाख उनचालीस हजार इक्यानबे लोगों की जान सड़क हादसों में गई। विश्व भर में दस दुर्घटनाओं में से एक भारत में होती है। विचित्र यह है कि सड़कों पर बिना गाड़ी वाले भी महफूज नहीं हैं। बॉलीवुड के सितारे हों या कोई अन्य धनाढ्य व्यक्ति, तेज गति से महंगी-चमचमाती गाड़ी चलाते हुए वे सड़क पर पैदल चलने वालों को कीड़ा-मकोड़ा समझने लगते हैं। गौरतलब है कि सड़क दुर्घटनाओं में मरने वाले अड़तीस फीसद लोग पैदल चलने वाले होते हैं, जबकि तीस फीसद साइकिल या मोटरसाइकिल सवार।

पिछले दस सालों में वाहनों की संख्या दोगुनी हो चुकी है। लेकिन क्या हमारी सड़कें यातायात के इस बोझ को सह पाने के लिए तैयार हैं। इंटरनेशनल रोड फेडरेशन के मुताबिक नब्बे फीसद हादसे ड्राइवर की गलती की वजह से होते हैं। सवाल है कि क्या ड्राइविंग लाइसेंस देते वक्त कायदे से जांच-परख की जाती है? क्या सुरक्षा मानकों पर गाड़ियों की कड़ी जांच-पड़ताल होती है? सवाल यह भी है कि लोगों की जिंदगी से जुड़े कानून सरकारों के एजेंडे में ऊपर क्यों नहीं होते हैं? कानून की कमी या लापरवाही, कौन-सा कारक ज्यादा जिम्मेदार है इन दुर्घटनाओं का? दूसरी ओर, सड़क सुरक्षा अधिनियम अभी भी लोकसभा में लटका हुआ है।

भारत में रोज तेरह सौ से ज्यादा सड़क हादसे होते हैं, इसमें करीब चार सौ मौतें होती हैं और सालाना करीब बीस अरब डॉलर का नुकसान होता है। उच्च मार्ग मंत्रालय का दस फीसद खर्च अकेले सड़क सुरक्षा पर होता है। भारत में बारह करोड़ से ज्यादा वाहन हैं और इनके चलने के लिए सड़कों का पर्याप्त बुनियादी ढांचा होना जरूरी है। सड़क सुरक्षा के नियमों को जानना जरूरी है और इनका पालन करना भी। लेकिन दिनोंदिन हो रही अकाल मौतों के बावजूद समाज में यातायात नियमों के प्रति घोर उपेक्षा का भाव झलकता है। सड़क पर फर्राटे से वाहन दौड़ाते लोग यह मान कर चलते हैं कि लापरवाही उनका जन्मसिद्ध


अधिकार है और उनकी परवाह करना केवल सरकार का दायित्व है। इसी रवैए का नतीजा है कि सड़क हादसों पर कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है। जिस तेजी से सड़क पर वाहन बढ़ रहे हैं, उतनी ही तेजी से दुर्घटनाओं की संख्या में भी इजाफा हो रहा है। किसी चौराहे पर लाल बत्ती को अनदेखा करके सड़क पार करना हो, तय मानक से तेज गाड़ी चलाने का मामला हो या फिर गलत तरीके से आगे निकलने की कोशिश, यह कोई साहस नहीं, बल्कि खुद अपनी मौत को बुलाना है।

घर किसी भी बच्चे की पहली पाठशाला होती है। सड़क सुरक्षा शिक्षा के प्रति सचेत करने का दायित्व माता-पिता का भी है। देश की सड़कों पर वाहनों का दबाव बढ़ता जा रहा है। इस पर नियंत्रण के उचित कदम उठाए जाने चाहिए। साथ ही वाहनों की सुरक्षा के मानकों की समय-समय पर जांच होनी चाहिए। भारी वाहन और सार्वजनिक परिवहन को परमिट दिए जाने की प्रक्रिया में कड़ाई बरती जानी चाहिए। ड्राइविंग लाइसेंस के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता भी तय की जाए। साथ ही छोटे बच्चे और किशोरों के वाहन चलाने पर कड़ाई से रोक लगे। सुरक्षा बेल्ट का प्रयोग न करने वालों और शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और स्कूलों में भी सड़क सुरक्षा से जुड़े जागरूकता अभियान चलाए जाएं।

यों सड़क दुर्घटनाएं आज वैश्विक समस्या बन चुकी है। लेकिन भारत में इसके कारण शायद कुछ अलग ही हैं। लापरवाही और नियमों की अनदेखी अपनी जगह है। खराब सड़कें और कम सड़क पर ज्यादा वाहनों का बढ़ता बोझ भी दुर्घटनाओं के अहम कारण हैं। इसी तरह शराब पीकर गाड़ी चलाने वाले खुद के साथ-साथ दूसरों के लिए भी खतरा बने रहते हैं। लोगों में यातायात के प्रति जागरूकता का अभाव है। जल्दबाजी और शॉर्टकट के चक्कर में यातायात नियमों का उल्लंघन करने में उनको गुरेज नहीं है। शायद यही कारण है कि भारतीय सड़कों पर मरने वालों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी हो रही है और विकास का प्रतीक मानी जाने वाली सड़कें आज जोखिम का पर्याय बनती जा रही हैं।


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?