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चुनावी विफलता का असर PDF Print E-mail
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Thursday, 05 June 2014 10:27

विष्णु नागर

 जनसत्ता 5 जून, 2014 : जैसे जीवन में वैसे ही राजनीति में भी सफलताएं हासिल करने के बाद अगर एक बार भी

किसी पार्टी के किसी नेता को भारी विफलता मिलती है तो उसे इसकी कई तरह से भारी कीमत चुकानी पड़ती है। विफल होते ही पार्टी के कई नेताओं समेत हर कोई उस नेता की चमड़ी उधेड़ने पर उतारू हो जाता है और कई तो मार-मार कर उसका कचूमर निकालने के चक्कर में रहते हैं। कई तो अचानक भेड़ से इतने खतरनाक शेर बन जाते हैं कि बब्बर शेर भी उन्हें देख कर डर जाता है और कहीं आसपास अगर जंगल बचे हों तो वहां वरना किसी चिडियाघर के पिंजरे में घुस कर अपने प्राण बचाता है। और अगर कोई नेता सफल हो गया और नरेंद्र मोदी की तरह उम्मीद से भी ज्यादा सफल हो गया तो फिर कल के निंदक भी ‘जनमत का सम्मान’ करने के बहाने अहर्निश स्तुतिगान शुरू कर देते हैं, आदमी से उसे भगवान बना देते हैं, हर-हर मोदी करने लगते हैं। 


इन दोनों बातों को ताजा संदर्भ में एक ओर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी और दूसरी तरफ भाजपा- नरेंद्र मोदी के मामले में विशेष रूप से देखा-समझा जा सकता है। आपके अपने ही लोग, जो कल तक सेवक के भी सेवक की तरह पेश आया करते थे, आपका उगालदान उठाना तक अपना सौभाग्य मानते थे, वे ही ऐसी-ऐसी गालियां देने लगते हैं और हमने पहले ही कहा था की शैली में इतना सारा ज्ञान आयातित करके बघारने लगते हैं कि शरमदार नेता हो तो चुल्लू भर पानी में डूब जाए, हालांकि राजनीति में इतने शरमदार आजकल नेता होते नहीं और शायद ऐसा होना आज की परिस्थति में ठीक भी हो, क्योंकि जो आज किसी को गालियां दे रहे हैं, वे भी अक्सर कम बेशरम नहीं होते, बल्कि हो सकता है जिसे गाली दे रहे हों, उससे कई-कई गुना ज्यादा बेशरम-बेहया हों।

कोई कांग्रेसी इन दिनों राहुल गांधी को कार्टून बता रहा है तो कोई उन्हें क्या उपदेश दे रहा है, कोई क्या। कल तक जिन्हें बिल्कुल इस बात का अंदाजा नहीं था कि राहुल बिल्कुल बेकार नेता हैं या अगर था भी तो बोलने की हिम्मत नहीं पड़ती थी, वे आज जो भी मुंह में आ रहा है वह बोलने लगे हैं। इसी तरह जहां देखो, वहां राहुल-केजरीवाल की जम कर मरम्मत हो रही है। केजरीवाल जो करें या जो न करें, वह सब कुछ निंदनीय है। राहुल-सोनिया को नीचा दिखाने के लिए आजकल मनमोहन सिंह में भी वे तमाम गुण देखे जा रहे हैं, जो शायद उनमें होंगे या नहीं होंगे। 

मुझे तो पहले भी लगता था और अब भी लगता है कि मनमोहन सिंह जीवन-भर एक अच्छे आज्ञाकारी नौकरशाह बने रहे, जिन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अपना यह मूल स्वरूप नहीं खोया। वे अपने हर राजनीतिक आका से पटरी बिठाकर अपना रास्ता आगे बनाते रहे और सफलता की ऊंची से ऊंची सीढ़ियां चढ़ते गए। अब जब सफलता की सारी सीढ़ियां लगभग वे चढ़ चुके हैं, इन दिनों भी वे प्रशंसा के ऊंचे पायदान पर अवस्थित हैं, और क्या पता मोदी-काल में भी वे कहीं खुशी-खुशी सामंजस्य बिठा कर कुछ पा जाएं। 

ऐसा नहीं है कि इस बार कांग्रेस की नैया डुबाने के लिए सोनिया-राहुल ही जिम्मेदार थे और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री होने के बावजूद बेचारे बिल्कुल पाक-साफ थे, मगर मां-बेटे के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए कांग्रेस के विरोधियों को मनमोहन सिंह से बेहतर कोई हथियार नहीं मिलता, क्योंकि वे राजनीतिक रूप से लगभग क्या पूरी तरह ही खत्म हुए लगते हैं। जबकि कौन निश्चित रूप से आज जानता है कि भविष्य में राहुल-सोनिया समस्या नहीं बनेंगे, इसलिए ये तो तब तक बुरे बने रहेंगे जब तक कि ये पुन: सत्ता न पा जाएं या राजनीतिक दृष्टि से बिल्कुल अप्रासंगिक न हो जाएं। मगर मनमोहनजी चंूकि इनके आज्ञाकारी सेवक बनने की छवि बनाए रहे, इसलिए अब भविष्य में किसी के लिए भी असुविधाजनक बनने की हद से बाहर जा चुके हैं।

 इसलिए 2009 में भाजपा को जो अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री लग रहे थे, अब भले आदमी के रूप में नजर आ रहे हैं और वैसे भी आज्ञाकारी अधिकारी से किसी को क्या परेशानी हो सकती है। और अगर तत्कालीन प्रधानमंत्री के सारे फैसले जब सोनिया-राहुल ही लिया करते थे तो ईमानदारी की ये प्रतिमूर्तिजी उस पद पर बैठे-बैठे क्या करती रहती थी- आज्ञापालन? क्या उनका कोई जमीर नहीं था और अगर नहीं था तो इस कारण वे निर्दोष कैसे हो गए? 

आपको याद हो तो 2009 में कांग्रेस की जीत का सेहरा जबर्दस्ती इन्हीं मनमोहन सिंह के सिर पर तमाम विश्लेषक बांध रहे थे, तो आज जब कांग्रेस बुरी तरह हार गई है तो हार के लिए केवल सोनिया-राहुल कैसे जिम्मेवार हो गए? ये कैसे साफ बच निकले? कोई तार्किक ईमानदारी भी तो होनी चाहिए? 

तो आजकल दनादन इन मां-बेटे को खूब पड़ रहे हैं, जैसे 2009 में वामपंथियों को पड़ रहे थे, जो अमेरिका के साथ परमाणु समझौता करने के अपने एक सैद्धांतिक मुद्दे पर यूपीए-एक से अलग हो चुके थे, जिसकी घोषणा वे पहले ही कर चुके थे। 

इस कारण या और कई वजहों से


उन्हें 2009 के लोकसभा चुनाव में काफी बड़ी चुनावी हार मिली थी। वैसे क्षमा कीजिए, कुछ तो पूर्व और वर्तमान वामपंथियों ने भी यह फैशन चला दिया है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से लेकर देश की आज की हर समस्या के लिए आखिरकार वामपंथी पार्टियां ही जिम्मेवार हैं। वैसे ऐसा आरोप लगाने वाले कई ऐसे हैं, जो वामपंथियों के दबदबे के युग में पूर्व सोवियत संघ और क्यूबा आदि की बारंबार यात्राएं भी कर चुके हैं और तब उन्हें वामपंथ बिल्कुल सही रास्ते पर चलता हुआ दीखता था। कुछ तो इस तरह के भी हैं, जो कहेंगे कि हर शहर में सड़क पर जो गंदगी पड़ी रहती है उसके लिए भी मूल रूप से वामपंथी ही जिम्मेदार हैं और अगर इस साल बरसात अच्छी नहीं होती है तो उसके लिए भी वामपंथी ही जिम्मेवार सिद्ध किए जाएंगे।

लगभग यही हालत आजकल अरविंद केजरीवाल की भी हो चुकी है। जब वे पांच महीने पहले दिल्ली के चुनाव में अट्ठाईस सीटें लेकर आए थे तो राहुल गांधी से लेकर मीडिया तक उनका जयकारा बोल रहे थे, भाजपा वाले भी उनसे घबरा कर खुद को सुधारने-बदलने में लगे हुए थे। वसुंधरा राजे सिंधिया राजसी तामझाम छोड़ कर आम आदमी बनने की असंभव साधना में लगी हुई थीं। मगर आज केजरीवाल से बुरा और गयागुजरा नेता कोई नजर नहीं आ रहा है। हर ताकतवर राजनीतिक पार्टी चाहती है कि यह पार्टी दिल्ली से जैसे भी हो जल्दी से फना हो जाए ताकि पुराना खेल चलता रहे। मीडिया भी ठीक यही चाहने लगा है, कांग्रेस-भाजपा भी। 

केजरीवाल आज कुछ भी करें, वह शुरू होने से पहले ही गलत होने लगता है, ड्रामेबाजी, नौटंकी होने लग जाता है और कल तक ये ही उनके ऐसे मुरीद बने हुए थे कि जैसे भारतीय राजनीति में कोई अवतारी पुरुष पैदा हो गया है, जो कांगे्रस-भाजपा समेत सबकी सारी राजनीतिक गंदगी को अपनी झाड़ू से एक ही झटके में बुहार ले जाएगा और सारे दुष्टों का एक ही बार में अपनी राजनीतिक झाड़ू से दलन कर देगा। तब उनके खिलाफ बोलना साहस की बात होती थी, आज उनकी प्रशंसा करना जघन्य अपराध बन चुका है। मैं अगर भाग्यवादी होता तो कहता प्रभु यह विधि की कैसी विडंबना है। 

हमारा यह कतई कहना नहीं है कि हारे हुओं को सभी को बख्शना चाहिए, उनकी पार्टी में इस पर बहस तक नहीं होनी चाहिए, कमियों-कमजोरियों पर मीडिया में और बाहर चर्चा नहीं होनी चाहिए और सारी चर्चा फालतू और बेमतलब होती है। सवाल सिर्फ  यह है कि ऐसा करने वाले खुद से भी तो यह सवाल पूछ लिया करें कभी-कभी कि कल वे खुद क्या कह और मान रहे थे और आज क्या कह और कर रहे हैं। कल तक मीडिया को इनकी प्रशंसा करना टीआरपी बढ़ाने वाला लग रहा था तो आज इनकी निंदा करने से टीआरपी बढ़ाई जा रही है। 

मीडिया को सारी सुविधा और पूरी स्वतंत्रता है, मगर यही सुविधा इन नेताओं को नहीं है कि हार गए तो तुरत पलटवार करने लग जाएं। ये तो पिटाई खाने, गालियां खाने के लिए ही आज बने हैं। ये तो अब कह नहीं सकते कि मेरी कोई गलती नहीं थी, गलती तो जनता की है या कल जो मेरी कमियां-कमजोरियां गिनाने का साहस नहीं कर रहे थे, गलती दरअसल उन्हीं की है। और मान लो नरेंद्र मोदीजी इस लोकसभा चुनाव में खुदा-न-खास्ता पिट जाते तो उनका भी यही हाल होना तय था। ये टीवी चैनल जो आज उनकी प्रशंसा की दौड़ में झीनाझपटी करने पर उतर आए हैं, वे ही करोड़ों के विज्ञापन डकार जाने के बाद उनके, उनकी पार्टी के भयंकर निंदक बन जाते और धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने लगते, 2002 जो आज बिल्कुल भी याद नहीं आ रहा है, वह बार-बार याद आने लगता। 

मजा यह है कि तमाम टीवी एंकर और विश्लेषक चुनाव से पहले भी ज्ञानी बने रहते हैं और बाद में और ज्यादा ज्ञानी बन जाते हैं। उन्हें पहले भी सब मालूम होता है और बाद में भी। वे हमेशा ‘जनता के साथ’ होते हैं, भले ही जनता ने उनके साथ रहने-जीने की कसम कभी न खाई हो। दरअसल, वे हमेशा जीतने वाले के साथ होते हैं। उनसे बड़ा शर्मनाक चरित्र तो राजनीति करने वालों का भी शायद नहीं होता होगा, मगर उनकी प्रतिष्ठा-रुतबा आदि जो भी उनके पास होता है कहीं या नहीं होता है, वह सब वैसा ही बना रहता है, उनकी इस बेशरमी को कोई बेशरमी भी नहीं मानता।


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