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खामोशी का खमियाजा PDF Print E-mail
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Wednesday, 04 June 2014 08:44

अनंत विजय

जनसत्ता 4 जून, 2014 : आदरणीय सोनियाजी, लोकसभा चुनाव में आपकी पार्टी कांग्रेस की करारी हार

के बाद आप आत्ममंथन के मूड में होंगी। आपकी अगुआई में कांग्रेस की यह अब तक की सबसे बड़ी हार है। पार्टी के इतने कम सांसद चुनकर लोकसभा में पहुंचे हैं कि इस बात पर बहस हो रही है कि कांग्रेस संसदीय दल के नेता को विपक्ष के नेता का दर्जा मिलेगा या नहीं। संविधान और सदन की कार्यवाही के विशेषज्ञ इस बात पर अलग- अलग राय रखते हैं। खैर, यह अलहदा विषय है। हम कांग्रेस की ऐतिहासिक हार की बात कर रहे थे। जिस दिन लोकसभा चुनाव के नतीजे आए थे तो आप अपने सुपुत्र राहुल गांधी के साथ मीडिया के सामने आई थीं और आपने पार्टी अध्यक्ष होने के नाते हार की जिम्मेदारी स्वीकार की थी। हार की जिम्मेदारी आपके सुपुत्र राहुल गांधी ने भी अपने सिर पर ली थी। सोनिया जी, इस तरह जिम्मेदारी लेने से क्या पार्टी की हालत बेहतर हो पाएगी। सोचिएगा। 

कांग्रेस की इतनी बुरी गत तो इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव या फिर नरसिंह राव सरकार के कार्यकाल के बाद हुए चुनाव में भी नहीं हुई थी। इतना अवश्य है कि जब सीताराम केसरी पार्टी के अध्यक्ष बने थे तो लगने लगा था कि कांग्रेस के पतन की शुरुआत हो गई है। हर दिन पार्टी का कोई न कोई बड़ा नेता कांग्रेस छोड़ कर जा रहा था। उसके पहले नारायण दत्त तिवारी और अर्जुन सिंह ने कांग्रेस तोड़ कर नई पार्टी- कांग्रेस (तिवारी)- बना ली थी। आपने मई 1995 में तिवारी और अर्जुन सिंह के धड़े वाली कांग्रेस की कमान संभालने से मना कर दिया था। कोलकाता अधिवेशन के दौरान सत्तानवे में आपने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता ली थी। उन्नीस सौ अठानवे के लोकसभा चुनाव के दौरान आपने कांग्रेस के लिए प्रचार किया और पार्टी को कठिन दौर से निकालने का बीड़ा उठाया। आपने सक्रिय राजनीति में भागीदारी को लेकर अपने विचार बदले और राजनीति में सक्रिय हो गर्इं। 

जब आपने कांग्रेस की कमान संभाली तो सीताराम केसरी और संयुक्त मोर्चे की सरकार के वक्त कांग्रेस की इतनी किरकिरी हो चुकी थी कि उसे ठीक करने में आपको कई साल लगे थे। पार्टी की अगुआई स्वीकार करने के बाद एआइसीसी की बैठक में आपने पहला भाषण दिया तो लगा कि पार्टी को आप पटरी पर ला सकती हैं। आपको याद होगा कि अप्रैल उन्नीस सौ अठानवे में अखिल भारतीय कांग्रेस के अधिवेशन के अपने भाषण में आपने कहा था कि पार्टी में चापलूसों और चमचों की कोई जगह नहीं होगी और हम सिर्फ और सिर्फ वही कहें जो हम महसूस करते हैं। 

आपके नेतृत्व में कांग्रेस ने कई ऐसे कदम उठाए जिन्होंने पार्टी के प्रति लोगों के नजरिए को बदलने में मदद की। उन्नीस सौ अठानवे में पार्टी के एक दिन के अधिवेशन में आपने पार्टी-पदों के लिए तैंतीस फीसद पद महिलाओं के लिए आरक्षित करने का एलान किया। इसके अलावा कम से कम बीस फीसद पद पिछड़ी जाति, अनुसूचित जाति और जनजाति के नेताओं को देने का भी फैसला किया था। आपके नेतृत्व संभालने के नौ महीनों में ही कांग्रेस को मध्यप्रदेश, दिल्ली और राजस्थान के विधानसभा चुनावों में जीत हासिल हुई थी। एक वक्त तो ऐसा था कि देश के पंद्रह सूबों में कांग्रेस की सरकार थी। शरद पवार ने आपके विदेशी मूल के मुद््दे पर आपको घेरने की कोशिश की थी लेकिन आपकी राजनीति ऐसी रही कि वही पवार 2004 में आपके नेतृत्व को स्वीकार करते नजर आए। शिमला में जुलाई 2003 में आपने जो रणनीति बनाई वह सफल रही। 

पार्टी में आपके प्रति समर्पित वरिष्ठ नेताओं ने तब दूसरे दलों के सहयोगियों को साथ रखने में बेहद अहम भूमिका अदा की थी। आपके नेतृत्व में 2004 में कांग्रेस को भारतीय जनता पार्टी से ज्यादा सीटें मिली थीं और उसने अपने सहयोगियों के साथ सरकार बनाई थी। आपने प्रधानमंत्री का पद ठुकरा कर भारतीय राजनीति में बहुत ऊंची जगह हासिल कर ली थी। विरोधियों ने तब इस बात का जोरदार प्रचार किया था कि उस वक्त के राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने आपको सरकार बनाने से रोका था। बाद में जब कलाम की किताब बाजार में आई तो ये सारे आरोप भी निराधार साबित हो गए। 

आपने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद पर मनोनीत करके दूसरी बड़ी मिसाल पेश की थी। इन सबका नतीजा यह रहा कि 2009 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को पराजय का स्वाद चखना पड़ा था। यह आपके नेतृत्व का वह शिखर था जहां से कांग्रेस के पतन का रास्ता निकला।

सन 2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की जीत का सेहरा आपके पुत्र राहुल गांधी के सिर पर बांधा गया और आप खामोशी से उसको देखती रहीं। जनता और आपकी पार्टी के नेताओं के बीच यह संदेश गया कि राहुल गांधी को दिए जाने वाले श्रेय को आपकी मौन स्वीकृति है। 

जिस जीत का सेहरा आपको मनमोहन सिंह के अलावा पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं के सिर बांधना चाहिए था उसे आपने चापलूसों को राहुल के सिर बांधने की छूट दे दी। उन्नीस सौ अठानवे में अपने पहले भाषण में पार्टी को चापलूसों से मुक्त करने की नसीहत आप खुद भूल गर्इं और राहुल के बारे में लोग वही बोलने लगे जो वे दिल से सोचते नहीं थे। आपकी चुप्पी में इतना शोर था कि पार्टी में सच बोलने की हिम्मत किसी नेता


में नहीं हुई।  

दो हजार नौ में जब यूपीए-दो सरकार आई तो आपने धीरे-धीरे राहुल गांधी को आगे बढ़ाना शुरू किया और पार्टी के फैसलों में उन्हें अहमियत मिलने लगी। राहुल गांधी ने अपनी एक टीम बनाई जो हाइटेक थी, लैपटॉप और आइपैड से लैस, जिनके हाथों में देश के हर चुनाव क्षेत्र के आंकड़े थे, मतदाताओं का जातिगत विवरण था, जो पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन से चुनावी रणनीति बनाते थे। राहुल गांधी के अलग दफ्तर होने की वजह से कांग्रेस पार्टी में एक अलग सत्ता केंद्र उभरने लगा। उन्होंने दो हजार तीन में शिमला बैठक में हुए पार्टी के फैसले को पलटते हुए गठबंधन की राजनीति के बजाय कांग्रेस के एकला चलो की नीति पर जोर दिया। 

यूपीए के दूसरी बार सत्ता में आने के बाद राहुल गांधी ने दो हजार दस में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में अकेले लड़ने का फैसला किया। पार्टी ने लालू यादव जैसे अपने विश्वसनीय सहयोगी को दरकिनार कर दिया। राहुल की टीम ने बिहार विधानसभा चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया। युवाओं को नेतृत्व देने के नाम पर कांग्रेस के पुराने और आपके वफादार जमीनी नेताओं को दरकिनार कर दिया गया। टिकट बंटवारे से लेकर चुनावी रणनीति तक में राहुल गांधी का दफ्तर यानी आरजी आॅफिस हावी रहा और यहां तक हुआ कि आरजी आॅफिस के फैसलों में कांग्रेस प्रेसिंडेट आॅफिस को शामिल नहीं किया गया। अहमद पटेल और मोतीलाल वोरा जैसे आपके साथ काम करने वाले पुराने पीढ़ी के नेताओं की पूछ घटी तो अन्य बड़े नेताओं ने अपने आपको किनारे कर लिया। 

राहुल गांधी के सहयोगियों का तर्क, विश्वास और दावा था कि इससे पार्टी अपने बूते पर बिहार में खड़ी हो पाएगी। लेकिन चुनाव नतीजों ने इन तर्कों, दावों और विश्वास की हवा निकाल दी। कांग्रेस को पिछले चुनाव से भी कम सीटें मिलीं। लालू यादव जैसा विश्वस्त और मजबूत सहयोगी खोया सो अलग। लेकिन आप खामोश रहीं। 

बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार से भी टीम राहुल ने सबक नहीं लिया और अब वे टीम सोनिया से सीधे-सीधे होड़ लेने लगे। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक तो राहुल गांधी की टीम में झोलाछाप एनजीओ टाइप लोगों का बोलबाला हो गया था। बची-खुची कसर दिग्विजय सिंह और बेनी प्रसाद वर्मा जैसे नेताओं ने पूरी कर दी। राहुल गांधी के ताबड़तोड़ दौरों और बाबालोग की लैपटॉपी रणनीति ऐसी फेल हुई कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे भी पार्टी के पिछले प्रदर्शन से खराब रहे। 

सोनियाजी, आपने टीम राहुल को इस बात के लिए नहीं रोका कि वे आपके विश्वस्त सहयोगियों को दरकिनार न करें। टीम राहुल को इस बात का मलाल रहता था कि सरकार में उनकी उतनी क्यों नहीं सुनी जाती है जितनी आपकी टीम के लोगों की सुनी जाती है। हनक की इस ललक में उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। कांग्रेस अध्यक्ष के दफ्तर और राहुल गांधी के दफ्तर के बीच की इस रस्साकशी में प्रधानमंत्री बेबस महसूस करने लगे। 

नतीजा यह हुआ कि मनमोहन सरकार तटस्थ हो गई। असर कामकाज पर पड़ा। आप खामोश देखती रहीं। इस बीच देश में एक से एक बड़े घोटाले हो रहे थे। मीडिया सरकार पर इन घोटालों को लेकर हमलावर हो रहा था, लेकिन सरकार के मंत्री हाथ पर हाथ धर कर बैठे थे। कांग्रेस के बड़े नेता पार्टी और सरकार के बचाव में सामने नहीं आ रहे थे। जब अण्णा हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन अपने उफान पर था तब राहुल गांधी खामोश थे। जब पूरा देश उनकी ओर अपेक्षा भरी निगाहों से देख रहा था तब भी वे खामोश थे। संसद के विशेष सत्र में उन्होंने भाषण अवश्य दिया लेकिन उस अमूर्त वक्तव्य से जनता को कुछ ग्रहण नहीं हो सका। इस बीच आपने अपने स्वास्थ्य के मद््देनजर राहुल गांधी के हाथ में पार्टी की कमान सौंप दी। वे पार्टी के उपाध्यक्ष बने लेकिन वरिष्ठ नेताओं, सरकार और अपनी टीम के बीच सामंजस्य नहीं बना पाए। 

देश की राजनीति को बदलने का संकल्प लेकर देश में निकले राहुल गांधी ने कांग्रेस को भी बदलने की ठानी। उनकी अनुभवहीनता और वरिष्ठ नेताओं की तटस्थता का फायदा नरेंद्र मोदी ने उठाया। दो हजार चार में जब भारतीय जनता पार्टी ने शाइनिंग इंडिया का नारा दिया तो कांग्रेस ने आम आदमी के साथ का नया नारा गढ़ा। इस बार के चुनाव में कांग्रेस मोदी के नारे का जवाब देती नजर आई। मोदी के ‘मैं’ के जवाब में कांग्रेस ने ‘हम’ पर दांव लगाया लेकिन तब तक वह मोदी के व्यूह में फंस चुकी थी। सोनियाजी, आपका राहुल गांधी के प्रति प्रेम भारतीय परंपरा के अनुरूप है लेकिन पुत्र-मोह को लेकर और भी मिथकीय मुहावरे प्रचलित हैं। ध्यान रखिएगा।  


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