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लभेड़े का अचार PDF Print E-mail
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Wednesday, 04 June 2014 08:42

सीरज सक्सेना

जनसत्ता 4 जून, 2014 : अचार हमें फलों और सब्जियों को बेमौसम चखने की सहूलियत देता है, जैसे बारहों महीने आम, कटहल, मिर्च, नीबू हम अचार के रूप में अपने आहार में शामिल करते हैं। अचार को हम अपने भोजन का शृंगार भी कह सकते हैं। यह हमारी थाली में स्वाद के साथ-साथ एक सुर्ख रंग भी जोड़ता है। अचार अपनी विशिष्टता खुद बनाता है, उसे आप सब्जी या रायते की तरह नहीं खा सकते, उसे चटनी की तरह और वह भी जब कुछ और न हो तब या सब कुछ के साथ भी खा सकते हैं। कई घरों में अचार के बिना भोजन पूर्ण नहीं होता, पर भूमंडलीकरण के इस दौर में, इस दौड़ में अचार की यह कमजोरी ठीक नहीं। यह कमजोरी अपने शहर, देश, अपने प्रदेश से दूर नहीं जाने देती। अपने शहर इंदौर की बात करें तो यहां बिना सेव (नमकीन) के दिन के हर पहर का भोजन अपूर्ण है, ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली में पनीर और दाल मखनी को मुख्य भोजन कहा जा सकता है, जैसे बंगाल और असम में मछली और गुजरात में कढ़ी। कभी-कभी उनके बारे में भी जानने का मन होता है, जिन्होंने तरह-तरह की प्राकृतिक चीजों से इतने प्रकार के स्वाद और उनके रंगों की रचना की है। 

आचार का मीठापन मुरब्बा कहलाता है। मुरब्बा आम या आंवले का ही अधिक लोकप्रिय है। दिल्ली में कलाकार मित्र राजेश पाटील की दिवंगत मां के हाथों का मुरब्बा आज भी याद है, उनसे सीखा भी और बनाया भी, पर सिलसिला आगे न बढ़ सका और मुरब्बा भी छूट गया। जीवन आगे बढ़ता रहा, पर मुरब्बा नहीं है साथ। ग्वालियर के पास मुरार वाली दादी के हाथों का साबुत लाल मिर्च का अचार फिर कभी नहीं चखा। मिर्च के पेट में पीली सरसों लबालब भरी होती और कच्ची घानी सरसों के तेल की महक लिए वह अचार धूप में परिपक्व होता था और हर साल एक बरनी में मम्मी की रसोई तक पहुंचता। उस वक्त न कोरियर कंपनी थी, न होम डिलिवरी की कोई व्यावसायिक सुविधा, पर बचपन इसी अचार के साथ बीता। 

हाल ही में इंदौर जाना हुआ। अपने शहर को बड़ा होते देख रहा हूं, यह भी एक विचित्र अनुभव है। हर शहर को न जाने क्यों महानगर होने की होड़ मची है, जहां देखो वहां खुदाई हो रही है और चौराहों पर बड़ी-बड़ी इमारतों में बने फ्लैटों की लुभावनी तस्वीर में कोई न कोई लोकप्रिय खिलाड़ी या फिल्मी अभिनेता खड़ा होता है। शायद अब जमीन के घर को छोड़ ऊपर उठने का समय है। अपने अवकाश को छोटा कर भौतिक इच्छाओं को पाने का समय है, यह एक भ्रम का समय है। 

जबलपुर वाली भाभी ने मम्मी के लिए लभेड़े का अचार भेजा। लभेड़े का अचार कई सालों बाद


नसीब हुआ। हमारी दादी डाला करती थीं। शाहपुर के हमारे पुश्तैनी घर के पास लभेड़े का एक पेड़ हुआ करता था। दादी भी पढ़ी-लिखी और हुनरमंद थीं, पर भाभी ने दादी से यह अचार बनाना नहीं सीखा। उन्होंने अपनी नानी से सीखा है। ऐसा भी शायद अक्सर होता है कि लड़के दादी से और लड़कियां नानी से सीखती हैं। 

अचार, बड़ी, पापड़ आदि लघु उद्योग को बचाने-संवारने और विस्तारित करने का प्रयास खादी ग्राम उद्योग भी कर रहा है। शायद बरसों से। ग्राम, प्रदेश और देश स्तर पर। दिल्ली का सबसे बड़ा खादी ग्राम उद्योग स्टोर रीगल के पास कनॉट प्लेस के बाहरी गोले पर तीन मंजिला इमारत में है। यहां अक्सर जाना होता है। हर बार कपड़ों के अलावा हींग, पापड़, बड़ी, चिप्स, साबुन आदि घर लाते हैं। यहां खाने-पीने की वस्तुओं का स्तर बढ़ना चाहिए, पर हो उलटा रहा है। खादी की बड़ी से बड़ी निराशा हुई। हम बड़े उत्साह से अपनी रसोई में बनी बड़ी, रोटी के साथ खा रहे थे। पर एक कौर खाते ही हम पति-पत्नी एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। अब इस दुकान ने अपना एक ग्राहक खो दिया है, पर इससे बड़ी के इस व्यवसाय पर कोई असर नहीं पड़ेगा। ताइवान प्रवास के दौरान कोरियाई अचार (जिसे किमची कहते हैं) ने मेरा बहुत साथ दिया। मेरे अमेरिकी कलाकार मित्र टेनर ने मुझे किमची के बारे में बताया था और एक दिन दोपहर का भोजन वे ले आए। चावल और किमची। लगभग एक माह दोपहर का भोजन यही रहा। कभी रेस्तरां में, तो कभी स्टूडियो में। 

अचार यात्राएं भी खूब करता है। देश-विदेश में यह बड़े जतन से पहुंचता है। कभी मां, भाभी, पत्नी, बहन, दीदी, पड़ोसी द्वारा तो कभी ससुराल, मायके, ननिहाल या दादी के घर से यह अपने गंतव्य तक बड़े गर्व से पहुंचता है। अचार की यह यात्रा हमारे आपसी रिश्तों और संबंधों में भी स्वाद बढ़ाती है। बिरले ही होंगे, जो अचार को कमतर आंकते हैं। आज की महानगरीय संस्कृति में जो देशीपन बचा है, उसमें बहुत कुछ श्रेय अचार को भी दिया जाना चाहिए। 


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