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अकाट्य तर्क PDF Print E-mail
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Tuesday, 03 June 2014 11:51

अरुणेंद्र नाथ वर्मा

जनसत्ता 3 जून, 2014 : उनके दफ्तर से मेट्रो स्टेशन दूर नहीं था। सुबह तो वे मेट्रो स्टेशन से पैदल ही दफ्तर आ जाते थे, पर शाम को कुछ घर पहुंचने की जल्दी और कुछ दिन भर के काम की थकावट मजबूर कर देती थी कि तीनों दफ्तर के सामने खड़े किसी रिक्शा पर एक साथ लद जाएं। उसके बाद रिक्शे पर एक दूसरे पर लुढ़कते-पुढ़कते, पान चबाते, सिगरेट के कश लेते हुए वे अपनी चुहल और जोरदार बहसें तब तक जारी रखते थे, जब तक रिक्शेवाला मेट्रो स्टेशन पहुंच कर अपनी नजरों से याचना उन तक पहुंचाए नहीं कि अब तो अपना रास्ता नापो। पिछले महीने की बात है। उस दिन सारे रास्ते चुनावी बहसें होती रहीं, पर उसके बाद कुछ अलग-सी बात हुई। गंतव्य पर पहुंच कर उनकी बातें थम गर्इं। पर रिक्शाचालक अपनी सीट से उतर कर उनकी तरफ ऐसे अंदाज में देखता रहा, जैसे कुछ कहना चाहता हो।

आखिर उन्हीं ने पहल की। पूछा- ‘कुछ कहना चाहते हो क्या?’ सहमति में सिर हिला कर उसने कहा- ‘बाबूजी, आप लोगों की बातें सुन कर कुछ हमारा भी कहने का मन हो रहा है। पर डर लगता है कि आप लोगों को अच्छा नहीं लगेगा।’ पहली सवारी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और पहली बार महसूस किया कि वह पटरी से खरीदी हुई सस्ती नीली जींस और अंग्रेजी के बेमानी शब्दों से सजी गोल गले की टी-शर्ट के नीचे छिपा एक इंसान भी था, न कि सिर्फ रिक्शा खींचने की एक मूक मशीन। दूसरे ने कहा- ‘अरे बोल यार, बिंदास बोल। कम से कम तू बोलने की हसरत और दम तो रखता है, तेरा बापू होता तो न कह पाता कि हम भी बोलेंगे।’ तीसरे ने जोरदार ठहाके के साथ उसे चिढ़ाते हुए कहा- ‘बोल भाई, इस चुनाव में तो सारा हिंदुस्तान बोल रहा है, बस सुनने वाला कोई नहीं है। तू भी बोल। जरा सुनें, क्या कहना है तुझे!’  

थोड़ा झिझकते हुए वह बोला- ‘जी, आप लोग कह रहे थे कि हम बिना पढ़े-लिखे लोग बस आंख मूंद कर अपनी जात-बिरादरी वालों को वोट दे देते हैं या फिर कंबल और दारू वालों के हाथ अपना वोट बेच देते हैं। पर बाबूजी, हमें लगता है कि पहले होता होगा। अब जो कुछ हम गांव-गंवई के लोग करते हैं, सोच-विचार कर करते हैं। आंख मूंद कर वोट अब कोई नहीं देता।’ उन तीनों में से एक ने जो अभी भी रिक्शे पर ही आसीन था, कहा- ‘अरे यार, तुम्हीं लोगों ने अपने मुख्यमंत्री के हटाए जाने पर उनकी मुश्किल से चौथी कक्षा पास श्रीमतीजी को अपने इतने बड़े राज्य की मुख्यमंत्री बनने दिया। बल्कि बाकायदा


चुनाव जिता कर दुबारा बनाया। अब देखो, हमें अपनी कंपनी में इतनी पढ़ाई करने के बाद किसी नौकरी के लायक समझा जाता है। क्या इतना बड़ा राज्य चलाने के लिए किसी पढ़े-लिखे की जरूरत नहीं थी?’ पर वह उत्तर जैसे पहले से सोचे बैठा था। बोला- ‘अरे बाबूजी, जो बड़े-बड़े विद्वान देश की कमान संभाले बैठे हैं, आप लोग तो उन्हें भी अभी निकम्मा कह रहे थे। उनके पढ़े-लिखे होने से क्या फर्क पड़ गया?’

अब दूसरे बाबूजी को जोश आ गया। अपनी सिगरेट से आखिरी कश लेकर उसे पैरों के नीचे कुचलते हुए बोले- ‘अरे तुम लोग मूर्ख के मूर्ख ही रहोगे। क्या तुमने कभी चारा घोटाले का नाम नहीं सुना?’ रिक्शे वाले की आवाज में इस बार अड़ियलपना साफ  झलकने लगा। इतना निरीह और दब्बू वह निकला नहीं, जितना इन तीनों ने उसे समझ लिया था। आवाज में थोड़ी तल्खी, थोड़ी अकड़ के साथ बोला- ‘हां-हां, सब घोटालों का नाम सुन रखे हैं। कोयले की खान का, आसमान की तरंग का, किसानों की जमीन हड़पने का। वह सब भी तो घोटाला ही था न? आप लोगों ने सिर्फ एक चारा घोटाले के पीछे हमारे नेता को चुनाव लड़ने की मनाही करा दी। इतने गुरुघंटाल लोग मैदान में डटे हैं। सबको काहे नहीं मना कर दिया चुनाव लड़ने को?’

उसका तर्क शायद उसकी अशिक्षाजन्य संकीर्णता का प्रतीक था, ऐसा सोच कर तीनों सवारियों में से सबसे अधिक धीरज वाले ने उसके कंधे पर हाथ रख कर बड़े प्यार-मनुहार भरे स्वर में समझाया- ‘देखो भाई, कोई करोड़ों रुपयों का पशुओं का चारा खा गया और तुम हो कि उसी की वकालत कर रहे हो!’ रिक्शे वाले ने माथे से पसीना पोंछते हुए कहा- ‘काहे न उनका साथ दें साहेब। आज तक आपे बबुआन लोग न खाए हैं! अब हमारे किसी भाई को मौका मिला तो कैसा अखर रहा है आप लोगों को?’ आगे तर्क की गुंजाइश नहीं थी। उन तीनों ने जल्दी से अपनी राह पकड़ी और चलते बने।


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