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भाईचारे का भरोसा PDF Print E-mail
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Monday, 02 June 2014 02:02

जगमोहन सिंह राजपूत

जनसत्ता 2 जून, 2014 : कुछ समय पहले एक दिन प्रोफेसर मुरारीलाल सुबह कुछ अनमने-से आए और बोले- ‘लगता है किसी ने चुनावी भाषणों को तल्ख बनाने के लिए अलग शब्दकोश तैयार कर सभी दलों के नेताओं को मुफ्त बांट दिया है। इनकी अशालीन और अभद्रता के दायरे लांघती भाषा घर-परिवारों के सदस्यों और बच्चों के संवेदनशील मन पर कितना प्रभाव डालती होगी? वे लोग जो बार-बार अपनी उपलब्धियां गिनाते हैं या वे जो सत्ता में आने पर आमूल-चूल परिवर्तन कर देश को बदल देने के वायदे करते हैं, वे यह सब क्यों भूल जाते हैं। उन्हें तो यह सीखना होता है कि इस पृथ्वी पर सभी विविधताओें के बावजूद हर मनुष्य को बराबरी, मान-सम्मान और भाईचारे का हक है। नौ-दस वर्ष के बच्चे पर ‘वे जहर की खेती करते हैं’ या ‘चुनाव के बाद उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए’ जैसे वाक्य कैसा असर डालते होंगे? आप अपने दोस्त मुजीब खान के घर बैठे हों और उनका बेटा अपने अब्बू से पूछे कि ‘आप भी तो इनके साथ नहीं है, आपको पाकिस्तान जाना पड़ेगा.. मैं तो नहीं जाऊंगा,’ तब आप पर क्या बीतेगी?’

जब देश का विभाजन हुआ था तो काफी समस्याएं थीं, लेकिन हर मत-मजहब, क्षेत्र, भाषा का संवेदनशील नागरिक जानता था कि सबसे बड़ी और कठिन चुनौती देश को बचाने की है। प्राथमिकता सामाजिक सद्भावना और धार्मिक सद्भाव बढ़ाने की थी। आजादी के पहले के राजनीतिक नेतृत्व के पास भारत की समझ और देश के भविष्य की चिंता थी। लेकिन आज का राजनीतिक नेतृत्व सत्ता और चुनाव परिणामों में इस हद तक उलझ गया कि उसे इस चुनाव से अगले चुनाव तक की ही दुनिया दिखाई पड़ती है।

1984 में टीवी का मतलब दूरदर्शन ही था। उसके हर बुलेटिन में अनेक बार ‘उग्रवादी’ शब्द का प्रयोग होता था। छोटे-छोटे बच्चे भी समझते थे कि इसका इंगित पंथ-भ्रमित सिख युवाओं से था। तब मैं भोपाल में एक संस्था का प्राचार्य था। सिख समुदाय के मेरे एक सहयोगी प्रोफेसर पड़ोस में रहते थे। उनका आठ-नौ साल का बेटा रिंकू मेरे बेटे का साथी था। हर रोज शाम को कार्यालय से पैदल घर आते समय मैं संस्था के खेल के मैदान में बच्चों को खेलते देखता था। उन दिनों देश में माहौल तनाव और ग्लानि का था। कितने निरपराध केवल इसलिए मार दिए गए थे कि वे सिख धर्म के अनुयायी थे। मैंने एक दिन शाम को खाना खाते समय अपने बेटे से पूछा- ‘आजकल शाम को तुम लोगों के खेल में रिंकू मुझे दिखाई नहीं देता है। क्या कहीं बाहर गया है?’ भोलेपन से उसने कहा- ‘वह हम सबसे नाराज हो गया है। अब कभी खेलने नहीं आएगा।’ मैंने कहा- ‘तुमने उसे मनाया क्यों


नहीं?’ उत्तर था- ‘हम सब उसे उग्रवादी कहते हैं, इसलिए वह चिढ़ता है। पता नहीं क्यों चिढ़ता है!’

मुझे लगा कि प्राचार्य के नाते चूक तो मुझसे हुई है। मैंने संस्था के छात्रावास में रहने वाले सिख बच्चों को बुला कर पूछा कि उन्हें कोई भय या आशंका तो नहीं है? उत्तर था- ‘नहीं।’ संस्था से जुड़ा एक सीबीएसई स्कूल भी था। मैंने अपने बेटे से मिली जानकारी से विचलित होकर उन्हें फोन किया- ‘जो बच्चे स्कूल में इस समुदाय के हैं, उनकी क्या स्थिति है?’ यह ‘उग्रवादी’ शब्द वहां भी प्रचलित था। अगले दिन मैं वहां गया। उनमें से अधिकतर बच्चे स्कूल नहीं आ रहे थे। अध्यापकों से चर्चा, कक्षाओं में विषय पढ़ाना उस दिन से बंद। हर बच्चे के घर तीन-चार अध्यापक उसी शाम पहुंचे। अगले दिन सभी बच्चे स्कूल में थे। उस दिन शाम को रिंकू भी खेल के मैदान पर था।

मैंने यह बात प्रोफेसर मुरारीलाल को बताई तो उन्होंने शांतिपूर्वक कहा- ‘तब से अब तीस वर्ष बीत चुके हैं। क्या सामाजिक-सद्भाव बढ़ा है? मुझे तो लगता है कि पहले से अधिक चिंताजनक स्थिति आज देश के सामने है। दरअसल, अविश्वास जब लगातार बढ़ता है, तब विकास और सद्भाव की संभावना उसी अनुपात में घटती जाती है। चुनाव के दौरान अपनी क्षमताओं, रणनीतियों को उभारने और चमकाने के साथ विपक्षी के दृष्टिकोण को समझने और विश्लेषण करने की क्षमता हर शीर्ष नेता को विकसित करनी चाहिए। चुनाव में वाद-विवाद तो अवश्य उभरेंगे। लेकिन अगर श्रेष्ठ और सुधीजन, ज्ञानी और शोधक-अन्वेषक खुद भी वाद-विवाद तक सीमित हो जाएं, तब संवाद का आयोजन कौन करे?’ मैंने उन्हें कहा कि जटिलताएं जब बढ़ जाती हैं, तब वे खुद समाधान की जमीन तैयार कर देती हैं। यह भी उतना ही सच है, जितना यह कि ‘हर साम्राज्य अपने पतन के बीज खुद बोता है।’ सभी को प्रतीक्षा है उन प्रयासों की जो भारत के हर नागरिक को सम्मानपूर्वक सद्भाव और भाईचारे की पृष्ठभूमि दे सके।


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