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झूठ से शुरुआत PDF Print E-mail
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Friday, 30 May 2014 11:39

राजकिशोर

जनसत्ता 30 मई, 2014 : ईश्वर से मेरा झगड़ा तब से है जब मैंने हायर सेकेंडरी की परीक्षा पास कर ली थी। शंका-प्रतिशंका तो कई वर्षों से चल रही थी। बहुतों की तरह, मैं भी यही मानता था कि कोई शक्ति है जरूर जो इस सृष्टि को चला रही है। अभी तक वैज्ञानिक उस शक्ति की खोज नहीं कर पाए हैं। यह तो हो नहीं सकता कि ईश्वर ब्रह्मांड के किसी सुदूर गह्वर में छिपा बैठा हो। जो साधक को दर्शन दे सकता है, वह बाकी दुनिया से क्यों घबराएगा? जिस दिन मैंने अपने अंत:करण में मौजूद ईश्वर को निकाल बाहर किया, यह पूरी दुनिया एक भयावह जगह लगने लगी जो जितनी अनुशासित है, उससे ज्यादा अराजक है। ऐसा नहीं है कि ईश्वर ने जो जगह खाली की थी, वह खाली ही रह गई। वहां मैंने मानवता को बैठा दिया। हम सभी एक-दूसरे के लिए ईश्वर हैं।

कभी-कभी कुछ चीजें देर से दिखाई पड़ती हैं। ईश्वर से संबंध बिगाड़ लेने के बाद सारा धार्मिक साहित्य, पूजा-पाठ, प्रार्थना-उपदेश, मंदिर-मस्जिद अर्थहीन हो गए। लेकिन इस तरफ कभी मेरा ध्यान नहीं गया था कि हमारे सांसद-विधायक सभी तो ईश्वर की शपथ लेकर लोकतंत्र के राजमहल में प्रवेश करते हैं। संविधान में मंत्री, सांसद, विधायक आदि को तभी वैधता मिलती है जब उन्होंने संविधान की शपथ ले ली हो। लेकिन शपथ के पहले एक और शपथ लेनी पड़ती है। इसके लिए संविधान में दो विकल्प हैं- एक, मैं ईश्वर की शपथ लेता हूं कि...। दूसरा, मैं सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं कि...।

जाहिर है, संविधान सभा के सभी सदस्य ईश्वर के मामले में एकमत नहीं थे। बहुत-से सदस्य ईश्वरविहीन थे। खुद, संविधान ड्राफ्ट करने वाले भीमराव आंबेडकर को ईश्वर से कुछ लेना-देना नहीं था। जवाहरलाल नेहरू घोषित नास्तिक थे। इसलिए उन्होंने ईश्वर का एक विकल्प बनाया- ‘मैं सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं कि...।’ मानो सत्यनिष्ठा ही असली हो और ईश्वर नकली। वास्तविकता भी यही है। सत्य कोई हवाई चीज नहीं है। हम उसकी परख कर सकते हैं, इसलिए सत्य पर कोई विवाद नहीं हो सकता। यह दुनिया सत्य है तो है। जो लोग इसे माया बताते हैं, उनमें से निन्यानबे प्रतिशत इस तरह जीते हैं जैसे यह दुनिया ही सत्य हो- बाकी सब माया हो।

इसलिए इस बार जब प्रधानमंत्री और अन्य सभी मंत्रियों ने ईश्वर की शपथ ली, तो मेरा माथा ठनक गया। मुझे लगा कि ये सभी एक झूठ से शुरुआत कर रहे हैं। ईश्वर के बारे में ये क्या जानते हैं? ईश्वर से इनका कोई परिचय है? क्या उन्होंने कभी ईश्वर की पदचाप सुनी है? क्या ये जानते


हैं कि ईश्वर क्या चाहता है और क्या नहीं चाहता? फिर, ईश्वर की शपथ लेकर क्या ये अपने को झुठला नहीं रहे हैं? सरकार एक ठोस चीज है। संविधान एक ठोस चीज है। मंत्री और सांसद तो, खैर, ठोस चीज हैं ही। फिर, ये लोग अपना कामकाज शुरू करने के पहले ईश्वर जैसी अदृश्य चीज को बीच में क्यों ले आते हैं?

आश्चर्य यह है कि अदालतें भी ईश्वर को मान्यता देती हैं। तमाम गवाह गीता या कुरान की शपथ लेकर अदालत को विश्वास दिलाते हैं कि वे जो कुछ कहेंगे, सच कहेंगे और सच के अलावा कुछ नहीं कहेंगे। अस्सी से नब्बे प्रतिशत गवाह नहीं जानते कि गीता या कुरान में क्या लिखा है। शपथ का कार्यक्रम हो जाने के बाद ईश्वर गायब हो जाता है और न्यायाधीश और वकील मामले को अपने हाथ में ले लेते हैं। उसके बाद ईश्वर की कोई जरूरत नहीं रह जाती। अपराध मनुष्य के विरुद्ध किया जाता है और मनुष्य ही सजा देता है। अगर आप ईश्वर को मानते हैं, तो किसी को खुद दंडित नहीं कर सकते। खुदा के बंदे का हिसाब-किताब खुदा ही करेगा। बाइबिल कहती है- मूल्यांकन मत करो, नहीं तो तुम्हारा भी मूल्यांकन किया जाएगा।

इसी संदर्भ में ‘धर्म-भीरु’ और ‘ईश्वर-भीरु’ जैसे शब्द याद आते हैं। धर्म-भीरु, यानी धर्म से डरने वाला और ईश्वर-भीरु यानी ईश्वर से डरने वाला। तो क्या हमें धर्म और ईश्वर से डर कर ही अच्छे काम करने चाहिए और गलत काम नहीं करने चाहिए? जो धर्म को मानते हैं, धर्म उनके लिए शक्ति और जो ईश्वर को मानते हैं, ईश्वर उनके लिए शक्ति का स्रोत होना चाहिए। सच्चाई यह भी है कि ईश्वर से विमुख व्यक्ति भी उतना ही क्रांतिकारी हो सकता है जितना धर्म में श्रद्धा रखने वाला। देश की स्वतंत्रता के लिए एक साथ फांसी पर चढ़ने वालों में एक परम नास्तिक था और बाकी दोनों परम आस्तिक।


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