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और हमारी चाय PDF Print E-mail
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Thursday, 29 May 2014 10:36

वर्षा

जनसत्ता 29 मई, 2014 : चाय के अड्डे, चाय पीने वालों के साथ-साथ खबरचियों, कवियों, लेखकों, राजनीतिकों और समाज की हवा समझने के लिए बड़ी उम्दा जगहें हैं। चूल्हे पर खौलती चाय के इर्द-गिर्द टीवी पर भी चुनावी चर्चाएं होती रही हैं। इधर चाय में पत्ती डाली कि किसी ने कहा थोड़ी कड़क तो थोड़ी और पत्ती डाल दी। चीनी पर सबकी अपनी-अपनी राय है। ‘डायबिटीज युग’ में अब भी काफी चीनी घोल कर मीठी चाय पीने वाले लोग हैं जो कम चीनी डालने पर झगड़ पड़ते हैं। इसलिए चाय वाले सबकी पसंद का खयाल रखते हुए अलग-अलग चाय बनाते हैं। चाय का भगोना चूल्हे पर चढ़ा नहीं कि कोई मुद्दा छेड़ दिया गया। कुछ समय पहले सबसे उम्दा और रसीला मुद्दा चुनाव का था। पूरी तरह पक चुकी चाय प्यालियों में छननी शुरू हुई, इसके साथ ही बहस और परवान चढ़ी। आसपास के अजनबी भी बहस में साथ हो लिए। चाय ने सबको एक सूत्र में पिरो दिया। चाय बनाने वाला भी भरपूर लुत्फ उठा रहा था। बीच में किसी ने बहस तोड़ी, चाय वाले को आवाज लगाई- ‘चहवा और दिया जाए... एक-एक प्याली और हो जाए!’ अब चाय को न कैसे कहा जा सकता है!

चाय की यह ‘अड़ीबाजी’ सबको खूब भाती है। लेकिन चाय के अड्डों पर कोई महिला भी मौजूद हो तो रंगत अलग होती है। मैं जिसकी बात कर रही हूं, वह चाय का अड्डा बूढ़े बाबा और अम्मा का है। बाबा मिलनसार हैं और अम्मा दबंग किस्म की। चाय पीने आए और फिर वहीं जम गए लोगों को अम्मा खूब फटकार लगाती हैं। चाय के अड्डे पर आने वाले लोगों का समय अमूमन तय होता है। जिस समय चाय पीने अपने दफ्तरों से निकल कर कुछ महिला-पुरुष पहुंचते हैं, वही वक्त स्थानीय दबंग किस्म के कुछ लोगों का भी होता है। उन्हें देख कर मेरठ-मुजफ्फरनगर या हरियाणा की खाप पंचायतों के खुर्राट याद आते हैं, जो हुक्का गुड़गुड़ाते हुए अपनी खास किस्म की ऐंठ और बदमिजाजी में रहते हैं। जैसे तपाक से कोई फैसला सुनाने वाले हों- ‘आज से गांव की कोई लड़की मोबाइल लेकर नहीं निकलेगी... या फिर गांव की कोई लड़की जींस नहीं पहनेगी!’

यहां हुक्का और वह पंचायत नहीं है, मगर इनके चेहरों के भाव वही हैं। यह उनका गांव नहीं, चाय की एक छोटी-सी दुकान है। यहां लड़कियों को चाय पीते और बहस करते देख उन पुरुषों को अच्छा नहीं लगता! यह उनके चेहरे से झलक जाता है। वे बीच में अपनी निगाहों से सामने खड़ी महिला को तौलते हैं। शायद सोचते हों कि अभी यह हमारा गांव होता तो हुक्का गुड़गुड़ाते हुए फरमान सुना दिया होता कि आज से कोई महिला चाय की दुकान पर चाय पीने


नहीं जाएगी! मगर अपनी मजबूरी समझते हुए वे अपना गम और गुस्सा कलेजे में दफन कर लेते हैं, बेचैन होते हैं। इनके घर की औरतें तो अब भी लंबा घूंघट काढ़ कर चलती हैं। मजाल किसी की जो बिना घूंघट सामने आ जाए। मगर चाय की इस छोटी-सी दुकान पर सब अपनी मर्जी के कपड़ों में हैं। सिवा उनके जो इन्हीं के घरों से कभी-कभार इधर की ओर आ जाती हैं। हाथ भर लंबा घूंघट ताने। हालांकि घूंघट वाली ये महिलाएं भी दबंग होती हैं। लेकिन अब तक अपने घूंघट से नहीं लड़ पार्इं, क्योंकि यह उन्हें स्वीकार है।

हमारी चाय हम तक आ पहुंची थी। कुर्सियों पर जमे इन खुर्राट किस्म के लोगों से अम्मा ने कुर्सी खाली करने को कह दिया। रही-सही कसर भी पूरी हो गई। शर्मिंदगी रंग बदल कर चेहरे पर उतर आई। ‘बैट्ठो...!’ कह कर एक शख्स उठा। हमने इशारे से मना कर दिया। उनके चेहरों पर मलाल था, हमारे चेहरों पर मुस्कान। वे खींच कर हम सबको उसी पंचायत में ले जाना चाहते थे, जब पूरा गांव बैठ कर हमारे खिलाफ फैसला सुनाता। अपने वक्त की पंचायत में वे हमें ‘गांव-निकाला’, ‘देश-निकाला’ देने वाले थे। लेकिन हम चाय पीने के साथ-साथ कोई मजेदार बात आने पर हंस भी रही थीं। तुर्रा यह कि राजनीतिक दलों की गतिविधियों पर बहस भी कर रही थीं। उस वक्त वे खुर्राट लोग अपनी निगाहें अखबारों के पन्नों में दफन कर लेते। दरअसल, यह भाव हर कोई देख और समझ नहीं सकता। मैं उन पर गौर कर रही थी और उनकी अचकचाहट खूब समझ रही थी। चाय पी ली गई। पैसे देने की बारी आई तो अपने दो पुरुष साथियों को रोक कर मैंने पैसे बढ़ाए। उस वक्त मैंने पलट कर नहीं देखा कि उनकी निगाहें क्या कह रही हैं। शायद उन्हें अच्छा ही लगा हो। बदलाव तो आना ही चाहिए। कुछ और लड़के-लड़कियां चाय पीने आ रहे हैं। दोपहर से कुछ पहले तक यह क्रम जारी रहेगा। चाय की खुशबू यहां छनती रहेगी।


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