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भारतीय राजनीति में वंशबेल PDF Print E-mail
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Wednesday, 28 May 2014 10:46

कनक तिवारी

जनसत्ता 28 मई, 2014 : भारतीय राजनीति में वंशवाद को कोसना तटस्थ आलोचना है या चोचला, तय नहीं हो पाता है।

‘वंशवाद’ शब्द नेहरू-गांधी परिवार की निंदा के लिए विद्वत्ता का मुखौटा लगाने का अवसर देता है। स्वतंत्रता आंदोलन में मोतीलाल नेहरू ने महात्मा गांधी के आह्वान पर सब कुछ न्योछावर कर दिया था। नए भारत के निर्माता और बड़े बुद्धिजीवी जवाहरलाल नेहरू ने अपनी जवानी जेल और संघर्ष में बिता दी। तपेदिकग्रस्त पत्नी कमला को अस्पताल में छोड़ कर नेहरू ने आजादी के युद्ध में खुद को झोंक दिया। योजना आयोग, आणविक शक्ति, सार्वजनिक उपक्रम, गुटनिरपेक्ष विदेश नीति, वैज्ञानिक समाजवाद और हरित क्रांति जैसे सोपानों पर भारत नेहरू के नेतृत्व में ही पहुंचा। इकलौती बेटी इंदिरा ने बचपन से ही स्वतंत्रता आंदोलन के सत्याग्रहियों की मदद के लिए वानर सेना का गठन भी किया था। पति, पिता और छोटे पुत्र को खोते इंदिरा गांधी का एकाकी जीवन देश की व्यापकता में समाता गया। उनकी हत्या के कारण बड़े बेटे राजीव को प्रधानमंत्री बनाया गया। उनकी भी हत्या हुई। पत्नी सोनिया गांधी ने टूटती-गिरती कांग्रेस को सूझबूझ से सम्हाला, जब धाकड़ कांग्रेसी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए थे। 

राजीव और सोनिया की बेटी प्रियंका में लोग इंदिरा गांधी को ढूंढ़ते रहे लेकिन प्रियंका ने राजनीति को अलविदा कह दिया। फिर भी कांग्रेसी मौजूदा चुनावों में पराजय के बाद उनमें ही संकटमोचक ढूंढ़ रहे हैं। सोनिया गांधी ने एक गैरराजनीतिक और किताबी अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह को पार्टी के संकोच के बावजूद प्रधानमंत्री बनवाया कि वक्त और जरूरत आने पर राहुल को नेतृत्व सौंपा जा सके। राहुल गांधी में देश का नेता बनने की इच्छाशक्ति और संकल्प का अभाव सीधा-सीधा पढ़ा जा सकता है। वे राजनीतिक सुधारों के सलाहकार की भूमिका को ज्यादा मनोनुकूल समझते हैं। उनकी और सोनिया गांधी की अगुआई में कांग्रेस ने सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में पार्टी के मात खाने का रिकॉर्ड बना दिया है। 

राजनीति में हजारों वंशज मलाईदार पदों पर काबिज होते हैं। पुराने दलित नेता बाबू जगजीवनराम की बेटी मीरा कुमार भारतीय विदेश सेवा की नौकरी अधबीच में छोड़ कर लोकसभाध्यक्ष तक बनीं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव के परिवार में बेटे अखिलेश उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, भाई शिशुपाल मंत्री, बहू डिंपल सांसद, भाई रामगोपाल सांसद और अन्य कई रिश्तेदार लाभ के पदों पर काबिज होते रहे। पार्टी के पांचों नव-निर्वाचित सांसद भी इसी परिवार के हैं। उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के सांसद भी केवल सोनिया और राहुल हैं। कुनबापरस्त लालू यादव के आपराधिक मामले में फंसने पर उनकी लगभग अशिक्षित पत्नी राबड़ी बिहार की मुख्यमंत्री बनी थीं। बेटी, बेटा और साला सब मिलजुल कर सत्ता का मेवा खाते रहते हैं!

ओड़िशा के शक्तिशाली नेता बीजू पटनायक के पुत्र नवीन बाबू ठीक-ठीक ओड़िया नहीं जानने और विदेश में शिक्षित होने के बावजूद पिता के यश का नकदीकरण करते हैं। रफी अहमद किदवई के परिवार की मोहसिना, शेख अब्दुल्ला के पुत्र फारूक अब्दुल्ला और पौत्र उमर संघर्ष के बदले उत्तराधिकार के लाभार्थी हैं। देशबंधु चितरंजन दास के नाती सिद्धार्थशंकर राय, यशस्वी मंत्री गोविंदवल्लभ पंत के पुत्र कृष्णचंद पंत और प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के पुत्रों हरिकृष्ण, अनिल और सुनील को भी लाभ मिला। हेमवतीनंदन बहुगुणा का धमाकेदार व्यक्तित्व संतानों रीता बहुगुणा जोशी और विजय बहुगुणा में नहीं है, लेकिन पद-लाभ कराता है। 

सलमान खुर्शीद, आंध्र के ताकतवर मुख्यमंत्री रहे वाइएसआर रेड््डी की पत्नी और पुत्र जगन को भी नाम की रॉयल्टी से ही नाम कमाना आता है। एनटी रामाराव जैसे शिखर पुरुष की पत्नी और पुत्र-पुत्रियां विफलता का झूला झूलते रहे। दामाद चंद्रबाबू नायडू ने ऊंची कुर्सियों का मुशायरा लूट लिया। तमिलनाडु के एकछत्र नेता एमजी रामचंद्रन की पत्नी जानकी तो खेत रहीं लेकिन फसल सखी-शिष्या जे जयललिता ने लूट ली। 

प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे चरणसिंह के पुत्र अजित सिंह और पौत्र जयंत चौधरी वंशानुगत लाभ को पांचसितारा आदतों के चलते स्थिर नहीं रख सके। हरियाणा के तीन लालों बंसीलाल, भजनलाल और देवीलाल के उत्तराधिकारी प्रेमालाप और भ्रष्टाचार के विशेषज्ञ रहे। हरियाणा की इकलौती संसदीय सीट आखिर कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड््डा के बेटे दीपेंद्र ने ही जीती। मजबूत मराठा नेता शंकरराव चव्हाण के बेटे अशोक चव्हाण को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री पद आदर्श सोसायटी में एकाधिक फ्लैट लेने-देने के आरोप में आदर्श-च्युत हो गया। वे फिर भी लोकसभा चुनाव जीत गए। धनाढ्य कांग्रेसी मंत्री मुरली देवड़ा ने अपनी जगह पुत्र मिलिंद को पदारूढ़ करना सुनिश्चित किया। 

शिवसेना में बाला साहब ठाकरे का उत्तराधिकार पुत्र उद्धव, बहुओं और पोते में फन काढ़े बैठा उत्तर भारतीयों को फुफकारता रहता है। भतीजे राज ठाकरे ने मातृ संगठन में उद्धव की विकसित संभावनाओं के चलते महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की स्थापना कर ली। 

मोर्चा बेटी सुप्रिया सुले ने भी सम्हाला है क्योंकि शक्तिशाली पिता शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस का मराठा साम्राज्य दरक गया है। अगाथा ने भी पिता पीए संगमा का ऊंची कुर्सी पर बैठने के लिए मोदी के इजलास में शाखामृग हरकतों में साथ दिया है। सदाबहार सत्तालोलुप रामविलास पासवान ने वंशज चिराग को भाजपाई जमावट के साथ फिट कर दिया, अन्यथा चिराग लेकर ढूंढ़ने पर भी कोई चिराग को कहां पाता। गुरुजी शिबू सोरेन के पुत्र हेमंत झारखंड में बाबूलाल मरांडी जैसे अनुभवी राजनेता को धता बता कर मुख्यमंत्री बन बैठे हैं। यशवंत सिन्हा ने भी चुनावनिवृत्त होते संसदीय आसंदी पर पुत्र की ताजपोशी कर दी। 

प्रणब मुखर्जी के सियासी दिग्गज पुत्र होने का लाभ अभिजीत मुखर्जी को मिला


ही है। पी चिदंबरम ने भी बेटे को आगे किया है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और पटियाला के पूर्व नरेश कैप्टन अमरिंदर सिंह परिवारजन अर्थात बहू को राजनीतिक कुर्सियों पर फिट करने का जतन करते रहे हैं। धांसू युवा तुर्क राजेश पायलट की सीट पुत्र सचिन और संगठन की सत्ता में नंबर दो की स्थिति तक पहुंचे जीतेंद्र प्रसाद की रिक्ति की भरपाई बेटे जितिन प्रसाद ने ही की। ममता बनर्जी ने भी आखिर अपने भतीजे को संसदीय राजनीति में आगे बढ़ाया है। प्रख्यात अभिनेत्री सुचित्रा सेन की बेटी मुनमुन ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के धाकड़ नेता को आखिर वंशवादी लोकप्रियता के आधार पर हरा ही दिया। 

चरणस्पर्श शैली के आविष्कारक कमलापति त्रिपाठी के पुत्र लोकपति त्रिपाठी ने राजनीति में हिकमत आजमाई लेकिन असली दबदबा बहूजी का रहा। ससुर उमाशंकर दीक्षित के नक्शेकदम पर चलने का काम बहू शीला दीक्षित ने किया। पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा सिकुड़ती जा रही पार्टी जनता दल (सेक्युलर) में पुत्र एचडी कुमारस्वामी को  एकाधिकारी उत्तराधिकार सौंप दिया। 

वंशवाद का एक बड़ा उदाहरण करुणानिधि परिवार भी है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के वटवृक्ष के पुत्र अलागिरि और स्टालिन दाएं-बाएं होते रहते हैं। पुत्री कनिमोड़ी हों या मुरासोली मारन और दयानिधि मारन जैसा निकटतम परिवार, पार्टी को जेबी संगठन बना कर रखता गया है। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल लोकतंत्रीय हैं, जो बेटे सुखबीर सिंह के लिए उपमुख्यमंत्री की कुर्सी ईजाद करें और बहू को भी संसद पहुंचाएं! 

सेठ गोविंददास स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, दीर्घावधि के लोकसभा सदस्य और हिंदी के पक्षधर योद्धा थे। पुत्रों और पौत्र ने चुनावी राजनीति का यश हासिल किया। अदालती मुसीबत के दिनों में कमलनाथ को भी पत्नी अलका नाथ को उत्तराधिकारी सांसद बनाना पड़ा था। मध्य भारत के महत्त्वपूर्ण नेता रविशंकर शुक्ल के पुत्र अंबिकाचरण, भगवतीचरण, श्यामाचरण, विद्याचरण और पौत्र अमितेश के राजनीतिक उद््भव के पीछे यशस्वी कुलपूर्वज का श्रेय रहा है। भाजपा में प्रमोद महाजन के पुत्र राहुल को सत्ता का टिकट घर बैठे मिलता लेकिन वह घटिया फिल्मी हरकतों के कारण गुमनाम, नामालूम और बदनाम होता रहता है। मोर्चा बेटी पूनम महाजन ने सम्हाला है। 

भाजपा के नए प्राणरक्षक नरेंद्र मोदी राजनीतिक निरवंशी हैं। पत्नी तक को उन्होंने परित्यक्त कर रखा है। रमन सिंह, दिलीप सिंह जूदेव, कल्याण सिंह, प्रेमकुमार धूमल, बाबूलाल गौर वगैरह ने एकाध बार वंशजों को उपकृत करने की कोशिशें की हैं। ग्वालियर की पूर्व राजमाता विजयाराजे सिंधिया को अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राजनेता का भी संरक्षण मिला। उनके पुत्र माधवराव सिंधिया और पौत्र ज्योतिरादित्य कांग्रेस और पुत्रियां वसुंधरा और यशोधरा भाजपा की राजनीति में सामंतवादी ठसक के अतिरिक्त माता के यशवंशज भी हैं। 

लोकतंत्र में अगर मतदाताओं का विजयी समर्थन न मिले तो सिफारिशों का मुकाम सिफर ही होता है। पिता के जूते में पैर फिट करने के बाद भी फिसलन भरी सड़क पर चलना कच्चे सियासी खिलाड़ियों के लिए संभव नहीं होता। माता-पिता के रसूख के कारण शुरुआती मनोनयन में बढ़त मिलती है। अंतत: खुद का दमखम ही काम आता है। 

केवल वंशज होने के आधार पर सियासी मंजिलें मकसूद की जा सकतीं तो राहुल और प्रियंका गांधी की अगुआई में कांग्रेस की इतनी दुर्गति नहीं होती। इंदिरा गांधी की अप्रतिम सफलता वंशवाद का नेहरू से मिला प्रसाद नहीं है। जवाहरलाल के बाद तो लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने थे। इंदिरा की शख्सियत का असली तेवर उनके महान पिता के पत्रों और दी गई ट्रेनिंग से प्राप्त व्यक्तित्व में झलकता है। 

वंशवाद के प्रेरक कारकों में सुसंस्कृत और अशिक्षित दोनों तरह के मतदाताओं की संकीर्ण कूढ़मगजता भी है। सामंतवादी तत्त्वों के चुनावों में मतदाताओं का लोकतंत्रीय आचरण कोर्निश करने लगता है। इस मिथक को टूटने में पचास वर्षों से ज्यादा समय लगा। सामंतवादी ठसक पूरी दुनिया में फिर भी कायम है। राष्ट्रमंडल की मुखिया इंग्लैंड की महारानी हैं। नोबेल पुरस्कार स्वीडन के महाराजा के हाथों दिया जाता है। भारतीय संविधान से राजप्रमुख शब्द हटाया नहीं गया है, भले ही कोई राजप्रमुख नहीं बचा। देश के बीमारू (बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश आदि) इलाकों और अन्य प्रदेशों में भी जातीय और वर्णाश्रमी वंशवादिता सामान्य जनता के जेहन में ठुंसी पड़ी है। हजारों ऐसे गांव हैं जहां ब्राह्मण-श्रेष्ठता का परचम लहराता है। कुलीन दिखते लेकिन निष्ठुर क्षत्रियों की हुकूमत का जहर जनता की जीहुजूरी में बहता रहता है। उच्चकुलीन तबकों में वैश्यों की आर्थिक इजारेदारी भी ऑक्टोपस की तरह अकिंचनों की अर्थव्यवस्था को जकड़े हुए है। 

सवर्ण उम्मीदवार उपेक्षित इलाकों से भी पिछड़ों और दलितों के मुकाबले जीतते रहते हैं। तथाकथित सामाजिक अभियांत्रिकी का अब भी मैदानी अनुतोष मिलता नहीं है। ऐसे में ठर्र राजनीति में प्रतिद्वंद्विता और लोकप्रियता की दुधारी तलवार पर चलते हुए लोकतंत्रीय राजवंशियों के उत्तराधिकारी मुकाबला करते हैं तो उसे वंशवाद की ठठरी की तरह नहीं जकड़ा जा सकता।


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