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एक तुम ही नहीं PDF Print E-mail
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Tuesday, 27 May 2014 12:12

विष्णु नागर

जनसत्ता 27 मई, 2014 : मुझे माफ कीजिएगा, हल्की-सी आत्मप्रशंसा के साथ शुरू कर रहा हूं! तब मैं मध्यप्रदेश के शाजापुर में पढ़ता था। शायद दसवीं-ग्यारहवीं में या बीए प्रथम वर्ष में था। वह किसी की शादी का मौका था और उज्जैन से किसी बारात में आए थे मेरे एक हमनाम और हमउम्र। उन दिनों वहां के किसी अखबार में उनकी कविताएं छपती थीं। लिखते तो हम भी थे, मगर हमारी कविताएं तब तक किसी स्थानीय अखबार में भी नहीं छपी थीं तो हम उज्जैन वाले उन हमनाम से प्रभावित थे और उनके स्वागत में हो सकता है हमारे ही सद्प्रयासों से वह गोष्ठी हुई हो, जिसमें हमने खासी बुरी कविताएं पेश की थीं। उन्होंने भी कविताएं सुनार्इं, लेकिन वे थे उदारमना (अब भी वे कहीं होंगे)। उन्होंने पता नहीं कैसे, तभी हमारी प्रतिभा का लोहा मान लिया था और यह घोषणा कर दी थी कि किसी तरह से नाम का भ्रम पैदा न हो, इसलिए अब से वे नहीं, सिर्फ हम ही कविताएं लिखेंगे और छपेंगे। इस तरह विष्णु नागर नाम के इस कवि आदि को हिंदी कविता के युद्धक्षेत्र में निर्बाध प्रवेश मिला और तब से इस नाम के अकेले कवि शायद हम ही हैं।

अब हम सीधे ‘गूगल’ के इस युग में लौटते हैं। कुछ साल पहले एक दिन इस नाचीज को यह जानने की इच्छा हुई कि हमारा साहित्यादि में जितना भी नाम है या नहीं है, वह तो खैर ठीक ही है, मगर हम ‘गूगल’ वगैरह पर भी कहीं उपस्थित हैं या नहीं हैं! वरना यह जीवन तो अकारथ गया, दूसरे में देखेंगे। हमें गहन आत्मसंतोष प्राप्त हुआ कि यार, तुम इतने नाकारा भी नहीं हो कि ‘गूगल’ की इस अत्यंत विपुल धरा पर तुम्हारा कहीं नाम न हो! है, कहीं-कहीं है। तभी हमें यह ज्ञान भी प्राप्त हुआ था कि अंग्रेजी में हमारी जो वर्तनी है, उससे नागर और नगर, दोनों बनता है। तो विष्णु नगर नाम की कई कॉलोनियां भी इस देश में यत्र तत्र सर्वत्र फैली हुई हैं। यह जान कर झटका तो जरूर लगा, मगर आनंद भी उतना ही आया कि चलो, इस बहाने सही, हमारे होने का भ्रम तो पैदा हो रहा है! हमने सोचा था कि गंभीरतापूर्वक तो हम सदैव लिखने का प्रयत्न करते ही रहे हैं, कभी इस पर भी कुछ लिखेंगे। वह सुअवसर अब जाकर हमें प्राप्त हुआ है।

फिर से हमने ‘गूगल’ खोला तो हमारी जानकारी में बहुत-सी नई वृद्धि हुई। पता चला कि नागर नामक विष्णु, तुम जो अब तक समझ रहे थे कि उस और इस विष्णु नागर के बीच कोई और नहीं है तो यह तुम्हारा भ्रम था। अब भी तुम्हारे बहुतेरे हमनाम आ रहे हैं। फिर


से हल्का-सा झटका लगा और मजा आने लगा तो हमने सोचा कि देखें कि ये हमारे हमनाम आखिर हैं कौन-कौन! फेसबुक पर कई विष्णु नागरों के प्रोफाइल मिल गए। उन्हें देखने लगे तो फिर से आनंद आने लगा कि ये सब युवा हैं और उनमें हमारे जैसा बुढ़ऊ कोई नहीं है। एक ने अपने फेसबुक एकाउंट पर ‘हैप्पी वेलेंटाइन डे’ लिख रखा है और साथ में दिल का फोटो भी है। एक हैं जिनकी पसंद ‘वीर-जारा’ फिल्म है जो हमने भी कभी देखी थी और आंसू-बहाऊ होने के बावजूद मजे की थी। एक और की पसंद अंगरेजी गाने हैं और उन्होंने अपने प्रोफाइल में अपनी नहीं, किसी सुंदरी की तस्वीर लगा रखी है, जो अगर कोई हिरोइन भी होगी तो उसके बारे में हमारी जानकारी शून्य है। एक ने अपने बजाय किसी (शायद अपने) बच्चे की प्यारी-सी तस्वीर लगा रखी है, जिसने अपनी तीन अंगुलियां मुंह में घुसा रखी हैं। एक और हैं जो भगवान के जबर्दस्त फैन हैं। उनके प्रोफाइल में हनुमानजी, गणेशजी, कृष्णजी आदि उपस्थित हैं और अगर हम जानकारी न दें तो यह हमारा अपराध होगा कि वहां खाटूजी के मंदिर और स्वर्णखचित-रत्नजड़ित सार्इंबाबा की तस्वीर भी लगी है। उनके फेसबुक प्रोफाइल पर ढाई लाख से ज्यादा ‘लाइक्स’ तब तक दर्ज हो चुकी थीं। एक विष्णु नागर ‘किंग’ हैं। एक और कोई हीरो-टाइप हैं, जिन्होंने पहाड़ और प्रकृति की गोद में अपनी तस्वीर लगा रखी है। एक प्रकृति की गोद में लेटे-से हैं और उन पर दो तितलियां उड़ते हुए मंडरा रही हैं। इस प्रकार, यहां दर्शनीय-सुदर्शनीय बहुत कुछ है।

संक्षेप में हम यह भी बताते चलें कि डोंबिवली के विष्णु नगर स्थित थाना आपका स्वागत करता है और वहां एक वड़ा-पाव की दुकान है, जिसकी तारीफ में एक अंंगरेजी अखबार में छपा है। छिपाएंगे नहीं कि राजकमल प्रकाशन और हिंदी बुक सेंटर में हमारी जो पुस्तकें उपलब्ध हैं, उनका विवरण भी यहां उपस्थित है और कांचीपुरम के विष्णु नगर में न्यूनतम सात लाख में दो कमरों के फ्लैट के उपलब्ध होने की जानकारी भी है। भूल-चूक लेनी-देनी!


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