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जनतंत्र के सामने PDF Print E-mail
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Monday, 26 May 2014 10:53

अंजुम शर्मा

जनसत्ता 26 मई, 2014 : रात करीब नौ बजे खाने के बाद अमूमन रोज पार्क में टहलने निकलता हूं। चुनाव परिणाम वाले दिन नुक्कड़ से चौराहे तक और दुकान से पार्क तक हर कहीं चर्चा का विषय एक ही था- नरेंद्र मोदी की जीत। टहलते हुए नतीजों पर मैं भी अपने दो मित्रों के साथ चर्चा कर रहा था। बोलने के लिए मेरे पास कम, उनके पास ज्यादा था। एक ने कहा- ‘सुना है कि बुद्धिजीवियों को सांप सूंघ गया है! बड़ी हाय-तौबा मचाए हुए थे! फेसबुक पर टिप्पणियां, अखबार में लेख कि देश छोड़ देंगे, ये कर देंगे, वो कर देंगे। लेकिन हुआ कुछ? वे ‘शेर’ हैं भइया! सब जानते थे कि आएंगे वही, लेकिन नाटक करना था बेकार का! यों कुछ और काम है भी नहीं इनके पास! चर्चा में आने के लिए विरोध में कुछ भी लिख दो! लेकिन अब लिखो, पता चलेगा...!’ 

मैं कुछ भी कहता तो चुनावी नतीजों के आंकड़े बोलने नहीं देते। इसलिए ‘समय बताएगा’ कह कर चुप हो गया। तभी सामने से हिजाब पहने एक महिला आ रही थी। उसके निकल जाने के बाद हमसे जरा-सा ही आगे चल रहे दो युवाओं में से एक ने पीछे मुड़ कर उस स्त्री की ओर देखा और कहा- ‘वे आ गए हैं, बस कुछ दिन और! अब सच होगा सपना!’ इतना कह कर दोनों हंसने लगे। दूसरे ने कहा- ‘देखिएगा! इतिहास में दर्ज होगा नाम! देखते जाइए, बहुत जरूरी है अब देश के लिए! कोई भी आकर आंख दिखा कर चला जा रहा है!’ इसके बाद दोनों फिर हंसे।

क्या यह वाकया हंसी की जगह बेचैनी पैदा नहीं करता? इन युवाओं को क्या चाहिए? ‘अब सच होगा सपना’ मुझे संबोधित कर क्यों नहीं, हिजाब को देख कर ही क्यों कहा गया? ‘बुद्धिजीवियों को अब पता चलेगा’ जैसी बातें क्या संकेत करती हैं? भाजपा के जीते गए कुल दो सौ बयासी सीटों में एक भी मुसलिम सांसद के न होने को किस तरह देखा जाना चाहिए? यूआर अनंतमूर्ति को किसी मोदी ब्रिगेड की ओर से कराची के लिए एकतरफा हवाई-यात्रा के लिए टिकट भेजने की खबर कहीं ‘बुद्धिजीवियों को बताए जाने’ के संकेत तो नहीं!

जानता हूं, इस तरह के खयाल जाहिर करने पर मुझे दुराग्रही, अपरिपक्व आदि कहा जाएगा। लेकिन मेरी चिंता को उन दो युवाओं के साथ-साथ भाजपा में मुसलमानों के नदारद प्रतिनिधित्व और अनंतमूर्ति के साथ शर्मनाक हरकत की खबर ने कई गुणा बढ़ा दिया है। पिछले पचास सालों में पहली मर्तबा सोलहवीं लोकसभा में मुसलिम सांसदों की संख्या महज बाईस रहेगी। महबूब अली कैसर अकेले मुसलिम सांसद हैं जो शायद भाजपानीत राजग में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करेंगे। उत्तर प्रदेश की अस्सी में


से बत्तीस सीटों पर मुसलिम आबादी पंद्रह फीसद से अधिक है। लेकिन भाजपा ने किसी उम्मीदवार को वहां से टिकट तक नहीं दिया। कुल चार सौ बयासी उम्मीदवारों में से केवल बिहार, जम्मू-कश्मीर, बंगाल और लक्षद्वीप से सात उम्मीदवारों को भाजपा ने खड़ा किया था। अगर लहर पर भरोसा था तो देश की सोलह फीसद आबादी के लिए भाजपा ने सात उम्मीदवार ही क्यों उतारे? तर्क दिया गया कि भाजपा ने इस बार धर्म और जाति से ऊपर उठ कर फैसले किए और वोट भी इसी आधार पर पड़े। जिन सात उम्मीदवारों को टिकट मिला, उनमें से कोई नहीं जीत सका। जबकि मुसलिम बहुल इलाके में हिंदू उम्मीदवार विजयी हुए। भाजपा ने धर्म से ऊपर उठ कर उम्मीदवार उतारने का खेल हिंदू बहुल इलाके में मुसलिम उम्मीदवार को उतार कर और उन पर भरोसा जता कर क्यों नहीं खेला? क्या यह तस्वीर पार्क में एक मोदी समर्थक की हिजाब पहनी महिला को देख कर की गई टिप्पणी की ओर इशारा नहीं करती!

भाजपा के कुछ समर्थक विरोधियों को पाकिस्तान भेजे जाने की वकालत करते हैं। सवाल है कि अनंतमूर्ति को कराची का ही टिकट क्यों भेजा गया! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिस नैतिकता की दुहाई देकर राष्ट्रीय हित का राग अलापती है, उसके समर्थकों के बीच वही नैतिकता अनंतमूर्ति को टिकट भेजते वक्त कहां चली जाती है? क्या मोदी का अंतिम व्यक्ति को साथ लेकर चलने का फार्मूला यह है, जिसमें ‘अंतिम व्यक्ति’ का मतलब ‘अंतिम भक्त’ तक सीमित है? असहमति का यह कैसा विरोध है जो लोकतंत्र के आधार को ही खत्म कर दे?

विरोध लोकतंत्र की नींव है जिसे अंध-समर्थन की चोट से खतरा होता है। एक ‘समझ’ का प्रेमी है, दूसरा ‘दंभ’ का। नरेंद्र मोदी को जनादेश मिला है। अब क्या वे अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का भरोसा दे सकेंगे और अपने से असहमत लोगों के भी विरोध करने के लोकतांत्रिक हक को पहले की तरह बहाल रख सकेंगे? यह देखना दिलचस्प होगा कि मोदी ‘अंतिम व्यक्ति’ तक पहुंचने में दंभ और समझ में से किसे तरजीह देते हैं!


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