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सात काम जो मोदी तुरंत कर सकते हैं PDF Print E-mail
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Monday, 26 May 2014 10:44

राजकिशोर

जनसत्ता 26 मई, 2014 : एक दैनिक पत्र के अनुसार, मोदी युग शुरू हो गया है। आह, युग कितनी जल्द खत्म होते हैं और कितनी जल्दी शुरू होते हैं। गांधी का भी एक युग था, जब कांग्रेस के हर नेता के लिए उनकी सलाह ही उनकी आज्ञा थी। आज गांधी की चर्चा बढ़ गई है, पर उस युग के बारे में हमें कम से कम बताया जाता है। सत्याग्रह गांधीजी के कर्म दर्शन को समझने के लिए एक केंद्रीय शब्द है, पर स्वयं नेहरू द्वारा इसका मजाक उड़ाया जाता था और कहा जाता था कि स्वतंत्र देश में सत्याग्रह के लिए कोई जगह नहीं है। नेहरू युग में देश को एक ढांचा प्रदान किया गया, पर आज जनमानस में नेहरू की कितनी स्मृति बची है। इंदिरा युग की कुछ घटनाएं हमें आज भी याद हैं, पर उनसे किसी शुभ की प्रेरणा नहीं मिलती।

वस्तुत: किसी युग को हम उसके अंत से ही पहचानते हैं। किसी भी युग की शुरुआत में ही उसे पहचाना नहीं जा सकता। भविष्य को कोई नहीं जानता। इसलिए हमें यह दावा नहीं करना चाहिए कि आज से किसी नए युग का प्रारंभ हो गया या किसी व्यक्ति का युग शुरू हो गया। बच्चे की पहचान पालने में ही हो जाती होगी, पर नेता की पहचान के लिए हमें तब तक इंतजार करना चाहिए जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए या वह राजनीति न छोड़ दे। यह मोदी पर कोई टिप्पणी नहीं है, उनके बारे में एक छोटा-सा विचार है, जो मोदी की तारीफ के पुल बांध रहे हैं और इस तरह अपने को लघु मानव साबित कर रहे हैं। वे मोदी से बंधे हैं, पर मोदी उनसे बंधे नहीं हैं।

नरेंद्र मोदी को किसी की सलाह की जरूरत नहीं है। वे जानते हैं कि उन्हें क्या करना है। फिर भी, चूंकि लोकतंत्र विचारों की कोआॅपरेटिव सोसायटी है, इसलिए किसी को भी सरकार को सलाह देने या कहिए उससे मांग करने का अधिकार है। इसके बिना लोकतंत्र रेडियो या भोंपू की तरह इकतरफा हो जाता है। भारत की जनता को यह अधिकार संविधान ने नहीं दिया है, बल्कि यह पहले से ही था- संविधान ने सिर्फ उस पर मुहर लगाई है। इसी अधिकार का उपयोग करते हुए मैं नरेंद्र मोदी की सरकार के सामने सात प्रस्ताव रख रहा हूं। ये सभी प्रस्ताव ऐसे हैं जिन पर तुरंत अमल किया जा सकता है। लोकसभा में अब विपक्ष नाम की चिड़िया नहीं है, इसलिए सरकार के सामने कोई संसदीय बाधा नहीं होगी।

एक, कीमतों पर नियंत्रण: इस समय पूरे देश की जनता महंगाई से त्रस्त है। मध्यवर्गीय परिवारों का बजट दो हफ्ते में ही लड़खड़ाने लगता है। किसी ने दूध छोड़ दिया है, किसी ने फल तो किसी ने प्याज। अब तक की सभी सरकारें महंगाई बढ़ाती रही हैं। इससे ज्यादा खौफनाक बात यह है कि कीमतें कैसे कम होंगी, इस विषय में हमारे विद्वानों के पास कोई विचार तक  नहीं है। अगर अर्थशास्त्र में कहीं लिखा होता, तो मनमोहन सिंह ने महंगाई पर काबू नहीं पा लिया होता!

इस सिलसिले में मैं एक पुराने प्रस्ताव को दोहराना चाहता हूं। प्रस्ताव राममनोहर लोहिया का था, जो आज और ज्यादा उपयोगी है। उन्होंने तभी ताड़ लिया था कि महंगाई तेजी से बढ़ने वाली है, जिससे जन-जीवन तबाह हो जाएगा। तीसरी दुनिया में कीमतें शोषण का एक जबरदस्त हथियार हैं। इस हथियार को कुंद करने के लिए कीमतों को रोकना होगा। पुलिस या सेना से कीमतों को बढ़ने से नहीं रोका जा सकता। इसके लिए कोई सिद्धांत बनाना होगा, कुछ नियम बनाने होंगे।

एक जरूरी नियम यह होगा कि सरकार मुनाफे की अधिकतम दर- दस या पंद्रह प्रतिशत- निश्चित कर दे। औद्योगिक उत्पादों के पैकेट पर अधिकतम खुदरा मूल्य लिखा होता है। यह ग्राहकों के लिए होता है। इसी तरह, सरकार उत्पादकों के लिए अधिकतम बिक्री मूल्य क्यों तय नहीं कर सकती? भारत की नई सरकार को तुरंत घोषणा करनी चाहिए कि कोई भी वस्तु अपनी लागत के डेढ़ गुने से ज्यादा कीमत पर नहीं बिकेगी। इसमें पेट्रोल, डीजल और सीएनजी भी शामिल हैं। कृषि क्षेत्र में नियम यह होगा कि कोई भी कृषि उपज उसकी लागत के डेढ़ गुने से कम पर नहीं खरीदी जाएगी। देखिएगा, कीमतें धड़ाम से गिरती हैं या नहीं।

दो, सभी के लिए समान शिक्षा: प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात में देखा होगा कि कई तरह के स्कूल चल रहे हैं। सरकारी स्कूलों की कम से कम चार कोटियां हैं- केंद्र सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्कूल, राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्कूल, नगर निगमों के स्कूल और नवोदय विद्यालय। तरह-तरह के निजी स्कूल भी भारी संख्या में चलाए जा रहे हैं। कई स्कूल पूर्णत: वातानुकूलित हैं। सभी में शिक्षकों को अलग-अलग वेतन और छात्रों को अलग-अलग सुविधाएं मिलती हैं।

सभी बच्चे भारत माता की एक जैसी संतान हैं। फिर उनके बीच यह भेदभाव क्यों? कुछ संतानों को दूध और कुछ को छाछ क्यों? बहुतों को तो यह भी नहीं। कहा गया है, माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही। यानी दोष भारत माता का नहीं, उसके कुछ क्षुद्रात्मा बेटे-बेटियों का है जिनके लिए सभी बच्चे एक समान नहीं हैं। मोदी चाहें तो शपथ लेने के अगले ही दिन घोषणा कर सकते हैं कि आज से शिक्षा में विषमता खत्म। वैसे भी, भाजपा सामाजिक फर्कों को नहीं मानती- बाभन-दलित एक समान, बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक एक समान, सब का निजी कानून एक। तो फिर शिक्षा में ही इतनी भयावह विषमता क्यों?

तीन, बिजली का वितरण: सड़कों और हवाई अड््डों की तरह बिजली भी इनफ्रास्ट्रक्चर का जरूरी अंग है। मोदी को गर्व है


कि गुजरात में बिजली कभी नहीं जाती। यह गर्व कई अन्य राज्यों को भी है। पर जिन राज्यों में बिजली की कमी है, वहां उसके वितरण में बहुत भेदभाव हो रहा है। बिजली सबसे पहले शहरों को, उनसे बची तो कस्बों को दी जाती है। बिजली के नक्शे पर गांव कहीं हैं ही नहीं। उन्हें लगातार पांच घंटे भी बिजली नहीं मिलती। बिजली के वितरण के लिए एक केंद्रीय तंत्र भी है, जो बिजली के वितरण को नियंत्रित करता है।  

मोदी की सरकार तुरंत घोषणा कर सकती है कि अब शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली का समान वितरण होगा। दूसरे शब्दों में, अंधेरा है, तो उसमें शहर, कस्बे और गांव सभी का समान हिस्सा होगा। हमारे शहर जगमगाते रहें और गांवों में अंधेरा हो, यह सरासर अन्याय है। अन्य अन्यायों को मोदी धीरे-धीरे दूर कर सकते हैं, पर बिजली तो अब हवा और पानी की तरह जरूरी हो गई है। इसमें देर कैसी?

चार, आयात और निर्यात: आजादी के पहले हमारा निर्यात हमारे आयात से ज्यादा हुआ करता था। आजादी के बाद कोई साल ऐसा नहीं गया, जब हमारा आयात हमारे निर्यात से ज्यादा न रहा हो। हमारी जितनी क्षमता है, उससे अधिक आयात करने से ही हम हमेशा विदेशी ऋण से दबे रहते हैं। मोदी जैसे क्षमतावान व्यक्ति को जरूर पता होगा कि आयात और निर्यात का यह फर्क बहुत दिनों तक नहीं चल सकता। इसके चलते इंदिरा गांधी को रुपए का अवमूल्यन करना पड़ा था और चंद्रशेखर को सोना बेचना पड़ा था।

अभी तक तो किसी ने आयात को कम करने और निर्यात को बढ़ाने की गंभीर कोशिश नहीं की है। जिस विकास की चर्चा है, उससे आयात और बढ़ेगा। नरेंद्र मोदी निश्चय ही इस तथ्य से अवगत होंगे। इसलिए उन्हें तुरंत एलान करना चाहिए कि आज से हम उतना ही आयात करेंगे जितना निर्यात कर सकेंगे। इससे हमारी अर्थव्यवस्था में संतुलन आएगा।

पांच, रुके हुए फैसले: मेरे एक परिचित ने छह साल पहले हत्या की थी। जल्द ही उसे पकड़ लिया गया। तब से वह जेल में है। जेल में छह साल बिताने के बाद भी वह नहीं जानता कि उसका फैसला कब आएगा। इस बारे में वह न किसी से पूछ सकता है न किसी पर दबाव बना सकता है। क्या यह हमारी न्याय प्रणाली का कोई सभ्य चेहरा है?

मोदी शासन करने में सचमुच गंभीर हैं, तो उन्हें तत्काल उस क्षेत्र की ओर नजर घुमानी चाहिए जहां सबसे ज्यादा धांधली है। वहां भ्रष्टाचार भी कम नहीं है। यह मोदी का फर्ज है कि वे तुरंत ऐसे कदम उठाएं जिससे मुकदमे फालतू स्थगित न हों। पहले तो सभी न्यायिक रिक्तियों को तुरंत भरना चाहिए। उस समाज के बारे में हम कैसी धारणा बनाएंगे, जहां अपराधी ज्यादा और जज कम हों। जजों की संख्या बढ़ाइए, अदालतों से दो पाली में काम करवाइए, छोटा-मोटा अपराध करने वालों को चेतावनी देकर रिहा कर दीजिए। और भी जो उचित हो, कीजिए, पर खुदा के वास्ते अदालत-ग्रस्त लोगों को समस्या-मुक्त कीजिए। वे आप को भगवान समझेंगे।

छह, समान काम के लिए समान वेतन: संविधान का निर्देश है कि समान काम के लिए समान वेतन दिया जाए। संविधान के इस निर्देश की, जिसके तर्क को अंधा भी देख सकता है, बहुत ज्यादा उपेक्षा हुई है। मजे की बात है कि इस पर अमल करने में सरकार को एक नया पैसा भी खर्च नहीं करना पड़ेगा। उसे सिर्फ यह कानून बनाना होगा कि आज से समान कार्य के लिए समान वेतन दिया जाए। यह क्या बात हुई कि मुख्यमंत्री की गाड़ी चलाने वाले को प्रधानमंत्री की गाड़ी चलाने वाले से कम वेतन दिया जा रहा है?

सात, विदेश जाने पर रोक: इस समय भारत में सबसे उज्ज्वल भविष्य उन युवक-युवतियों का है जिनके पास कोई तकनीकी या प्रोफेशनल डिग्री है। वे जिस देश से भी वीजा मांगेंगे, वह सहर्ष प्रदान करेगा। आज शायद ही कोई उच्च-शिक्षित युवक या युवती विदेश जाकर बसने का सपना न देखता हो। इनके पिता मंत्री, नेता, आला अफसर, प्रोफेसर, उद्यमी, लेखक- कुछ भी हो सकते हैं। प्रतिभा के इस मुफ्त निर्यात को बंद करने के लिए तुरंत कदम उठाना होगा। जो देश छोड़ कर जाना चाहें, उन्हें क्यों रोका जाए? लेकिन जिन्होंने भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त की है, वे ज्यादा कमाने के लिए विदेश भाग जाएं और भारत की उनकी नागरिकता भी बनी रहे, यह किसी भी गरीब देश को मंजूर नहीं हो सकता। मोदी को भी मंजूर नहीं होना चाहिए। वे इस बारे में राष्ट्रीय नीति तुरंत घोषित कर सकते हैं।

आज के माहौल में ये प्रस्ताव बहुत भारी लग सकते हैं, क्योंकि हमारी आंखों पर माड़ी चढ़ी हुई है और हमारे कानों ने सिसकियां सुनना बंद कर दिया है। वरना ये तो बहुत मामूली चीजें हैं, जिनके बिना कोई भी देश सभ्य होने का दावा नहीं कर सकता। भारत संपन्न हो या नहीं, सभ्य तो वह हो ही सकता है।


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