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स्वार्थ के सोपान PDF Print E-mail
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Saturday, 24 May 2014 10:22

आशुतोष गर्ग

जनसत्ता 24 मई, 2014 : कुछ दिन पहले जब मैं एक मित्र के डीडीए फ्लैट में पहली मंजिल पर स्थित घर में जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ रहा था तो मुझे अपने चेहरे पर कुछ महसूस हुआ। मैंने हाथ से छुआ तो देखा कि हवा में झूलता एक मकड़ी का जाला मेरे चेहरे पर चिपक गया था। मुझे बहुत बुरा लगा, पर उसमें उस बेचारे कीड़े का क्या दोष! मकड़ियां मनुष्यों के बसेरे से बेखबर हों तो चलता है, पर मनुष्य भी मकड़ियों की बसावट पर ध्यान न दे तो बात हजम नहीं होती। खैर, ऊपर की ओर आगे बढ़ते हुए मैं सतर्क रहा। मैंने आसपास नजर दौड़ाई तो देखा कि हर तरफ धूल-मिट्टी थी और दीवारों पर तिलचट्टे घूम रहे थे। दीवारों का रंग तो उड़ा हुआ था ही, उनका पलस्तर भी जगह-जगह से उखड़ा था। ऐसा लग रहा था, मानो लंबे समय से वहां किसी मनुष्य ने पैर नहीं रखा हो। मुझे बहुत अचरज हुआ। कैसे लोग रहते हैं, जिन्हें अपने ही घर तक जाने वाली सीढ़ियों की साफ-सफाई की परवाह नहीं है!

मित्र के घर की बाहरी दीवार और दरवाजे से ताजा पेंट की महक आ रही थी। मैंने घंटी बजाई। मित्र ने दरवाजा खोला, मुस्कराते हुए मेरा अभिवादन किया। अंदर मैंने उनके ड्रॉइंग रूम में चारों ओर नजर घुमाई। नए रंग-रोगन से उनकी दीवारें चमक रही थीं। देखने से पता लग रहा था कि घर के काम में काफी पैसा लगाया गया था। साफ-सफाई को देख कर मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि जो गंदी सीढ़ियां चढ़ कर मैं ऊपर आया था, वे इसी साफ-सुथरे घर तक आती हैं! मित्र के घर और उनकी सीढ़ियों में जिस ‘विषमता’ के दर्शन मुझे हुए थे, उसका प्रभाव मेरे चेहरे पर झलक आया था। मित्र ने पूछ लिया- ‘क्या हुआ यार! कुछ परेशान लगते हो!’ मैंने बिना भूमिका बांधे उनसे सीधा सवाल किया- ‘तुमने शायद घर में रंग-रोगन करवाया है। पर ये नीचे की सीढ़ियां क्यों छोड़ दीं? इन्हें भी साफ करवा लेते।’ मित्र ने बिना सोचे तपाक से उत्तर दिया- ‘सीढ़ियां मेरी नहीं हैं यार। वह तो आम रास्ता है। इमारत के सभी लोग उसका उपयोग करते हैं। उसकी जिम्मेदारी मैं अकेला क्यों लूं? वे गंदी रहें या साफ, मुझे क्या!’ मित्र का उत्तर सुन कर मैं सन्न रह गया।

मैंने कहा- ‘यार, कोई नहीं करवाता तो तुम ही उसकी मरम्मत करवा दो। ज्यादा खर्च तो होगा नहीं! और फिर इसी रास्ते से तुम भी आते-जाते हो। सीढ़ियों की गंदगी और जालों आदि से तुम्हें भी तो असुविधा होती होगी! तुम्हारे मेहमानों को दिक्कत होती है, सो अलग। अभी ऊपर आते समय मेरे चेहरे पर


भी जाला चिपक गया था!’ मित्र ने मुझे ऐसे देखा, जैसे मैंने कोई अपराध कर दिया हो। वे बोले- ‘क्यों भाई, मेरे पास पैसा फालतू है क्या? अभी सामने वाले सक्सेनाजी ने भी तो अपने घर में रंग-रोगन करवाया था! वे भी सीढ़ियां साफ करवा सकते थे। मुझे पागल कुत्ते ने नहीं काटा है जो मैं सार्वजनिक संपत्ति पर अपना समय और पैसा बर्बाद करूं!’

मैं कुछ और कहता, इससे पहले ही मित्र ने कहा- ‘खैर छोड़ो यार, तुम आ गए न सिर बचा कर अपना! ऐसे ही दूसरे लोग भी आ जाते हैं। आदत हो गई है अब हमें। किस सीढ़ी पर कहां, कितना बड़ा जाला है, हमें तो अब यह भी याद हो गया है। जाला जब ज्यादा लटक जाता है तो किसी न किसी से टकरा कर अपने-आप टूट जाता है!’ इतना कह कर मित्र हंसने लगे। उनकी बात सुन कर मैं समझ गया कि अपने घरों पर पानी की तरह पैसा बहाने वाला यह तथाकथित सभ्य समाज वास्तव में मानवीयता और सभ्यता से कोसों दूर है, क्योंकि आज भी हमें अपने अधिकारों और कर्त्तव्यों में सही सामंजस्य स्थापित करना नहीं आया है। आधुनिक युग में अधिकार तो सबको चाहिए, पर बात अगर कर्तव्य की हो तो जो ‘सबका’ है, वह किसी का भी नहीं है!

जब हम देश के संसाधन, पैसा और समाज की सार्वजनिक संपत्ति का दुरुपयोग करते हैं, उस समय हम यह भूल जाते हैं कि वह ‘सबका’ है और तब हम उसे ‘निजी’ समझ कर उसका शोषण करते हैं। लेकिन जब बात उसी सार्वजनिक संपत्ति के रख-रखाव और देखभाल की होती है तो हम उस संपत्ति को ‘कॉमन’ या ‘सार्वजनिक संपत्ति’ बता कर नजरअंदाज कर देते हैं और बड़ी आसानी से अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेते हैं। यह बात हरेक सार्वजनिक वस्तु पर लागू होती है। यह न सिर्फ एक घनघोर स्वार्थी रंग-ढंग है, बल्कि देश और समाज के प्रति गैर-जिम्मेदाराना रवैया भी है।


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