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गांधी का अंतिम आदमी PDF Print E-mail
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Friday, 23 May 2014 12:05

केसी त्यागी

जनसत्ता 23 मई, 2014 : सन 2002 में जब बिहार के चंपारण जिले में मुसहर जाति के बाईस लोग भूख से मर गए, तब पहली बार इस जाति के लोगों के बारे में चर्चा हुई। दुर्भाग्यवश उस समय वहां के जिलाधिकारी ने इसका खंडन किया और उन असहाय परिवारों को कोई मुआवजा तक नहीं मिला। चंपारण वही जगह है जहां लगभग सत्तानबे वर्ष पहले गांधीजी ने नील खेती करने वालेकिसानों के लिए सत्याग्रह किया था और 2017 में देश चंपारण आंदोलन का सौवां वर्ष मनाएगा। उस दौरान गांधीजी एक गांव में गए जहां उन्होंने मुसहर जाति के लोगों को देखा, जिनके पास न तन ढकने के लिए कपड़े थे, न सिर पर छत थी। न जमीन और न खाने के लिए भोजन। इसी के बाद गांधीजी ने अपने वस्त्र त्याग दिए थे और अपने तन पर सिर्फ एक धोती लपेट ली थी। आजादी के बाद गांधीजी ने कहा था कि इस आजादी की असली चमक तब पता चलेगी जब समाज के आखिरी आदमी की जिंदगी में परिवर्तन आएगा।

मेरा मानना है कि कुछ हद तक आज बिहार ने मुसहर जाति से आने वाले जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना कर शायद गांधी की इस इच्छा को पूरा करने का प्रयास किया है। कौन हैं मुसहर? यह प्रश्न आज से लगभग सौ-डेढ़ सौ वर्ष पहले से समाज का ध्यान आकर्षित करता रहा है। अंगरेज आयुक्त एए रिजले ने पहली बार मुसहर समाज को बंगाल की जाति और जनजाति में परिभाषित किया था। इस समुदाय के लोग उत्तर भारत में विभिन्न स्थानों पर फैले हुए थे और उन्हें हर क्षेत्र में अलग-अलग नाम से जाना जाता था। रिजले ने अपने अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला कि मुसहर एक आदिवासी जनजाति है जो भुइयां जाति की ही एक शाखा है। उन्होंने मुसहर को द्रविड़ समुदाय का हिस्सा माना जो आगे चल कर हिंदू धर्म में समाहित हो गया। रिजले भी चूहे पकड़ने और खाने को इस समाज से जुड़ा मानते थे। उनके अनुसार हालांकि ये हिंदू समाज के साथ जुड़ गए थे, मगर जाति समीकरणों के चलते इस वर्ग को हिंदू समाज के सबसे निम्न स्तर के चूहे खाने वाले तबके के रूप में देखा गया। विडंबना यह है कि आज भी हमारा समाज इन्हें चूहा पकड़ने और खाने वाला वर्ग ही मानता है। यह सोच अंगरेजों के सोच से भिन्न नहीं है।

मूषक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है चूहा और मुसहर का अर्थ है चूहा खाने वाला। इस जाति के लोग आमतौर पर चूहे पकड़ते हैं और उसी पर उनका जीवन निर्भर होता है। उन्हें दलितों में भी सबसे नीचे माना जाता है! उत्तरी बिहार में इन्हें ‘सदा’ या ‘सदय’ और मध्य बिहार में ‘मांझी’, ‘मुसहर’ या ‘मंडल’ के उपनाम से जाना जाता है। दक्षिण बिहार के गया में इन्हें


‘भुइयां’ और ‘भोक्ता’ कहा जाता है। उत्तर प्रदेश में भी इनकी आबादी पांच से सात लाख है और बिहार में इनकी संख्या करीब तीस लाख है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो मूल रूप से ये आदिवासी हैं और झारखंड के गुमला और के आसपास से आते हैं। यह जाति उत्तर की ओर दास बन कर बढ़ती रही। आजादी से पहले इन्हें अनुसूचित जनजाति और बाद में 1951 की जनगणना में अनुसूचित जाति से जोड़ा गया। लेकिन इनकी दशा वैसी ही रही। मजदूरी पर आश्रित इस जाति के लोग समाज से बाहर एक अलगाव की जिंदगी जीते रहे हैं, जिनके पास जीने के लिए कुछ टूटे हुए बर्तन, टूटी झोपड़ी, फटे वस्त्र और भुखमरी के हालात के सिवा कुछ नहीं रहा। ये ज्यादातर जमींदारों के खेत में बेहद कम मजदूरी पर गुजारा करते हैं। समाज के इस वर्ग में केवल 2.9 फीसद लोग शिक्षित हैं, जिनमें महिलाओं का अनुपात एक फीसद से भी कम है। जातिगत भेदभाव और भयानक गरीबी या अभाव जैसी कई वजहों से शिक्षा के मोर्चे पर ये पीछे रहे।

मुसहर समाज का जीवन आज मुख्य रूप से जनवितरण प्रणाली पर आश्रित है, जहां से मिले अनाज इनके जिंदा रहने के काम आते हैं। इस समुदाय के लोगों को पर्याप्त मात्रा में स्वास्थ्य सेवाएं भी नहीं मिल पातीं। यह बेवजह नहीं है कि इस समुदाय में नवजात शिशुओं से लेकर कम उम्र के बहुत सारे बच्चों की जान नाहक चली जाती है। इनके बीच के ज्यादातर लोग अपना जीवन खुले आसमान के नीचे बिताते हैं। सरकारी पैमाने पर चलाई गई इंदिरा आवास योजना का भी इस तबके को कोई विशेष लाभ नहीं मिला।

मुसहर समाज की बदहाली का एक बहुत बड़ा कारण उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अभाव रहा है। इस समाज से गिने-चुने लोग ही राजनीतिक क्षेत्र में आगे बढ़ पाए हैं। संसद सदस्य बन सकी भगवती देवी के बाद जीतन राम मांझी पहले मंत्री और अब मुख्यमंत्री बने। लेकिन विडंबना यह है कि आज भी चुनावों के दौरान अपने विवेक से मताधिकार का इस्तेमाल करने से इन्हें कई जगहों पर रोका जाता है!


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