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तो हारा कौन PDF Print E-mail
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Thursday, 22 May 2014 10:56

विनोद कुमार

जनसत्ता 22 मई, 2014 : चुनाव परिणाम आने के बाद से एक वाक्य मुझे परेशान किए हुए है- ‘इंडिया विन्स,’ यानी ‘भारत की विजय हुई।’ यह साधारण वाक्य नहीं। इसे नरेंद्र मोदी ने जीत के बाद ट्विटर पर लिखा और उसे अगले कुछ ही मिनटों में अट्ठावन हजार से ज्यादा लोगों ने ‘रीट्विट’ किया। साढ़े सैंतीस हजार लोगों का यह पसंदीदा वाक्य बना। मेरे जेहन को यह मथ रहा है कि जब भारत जीता तो हारा कौन? घर में मोदी के एक समर्थक का कहना है कि यह बस बोलने की शैली है, अभिव्यंजना है। लेकिन वे दबे कंठ से यह स्वीकार करते हैं कि इस तरह बोलना उचित नहीं। जब उचित नहीं तो फिर अनुचित है और उससे भी ज्यादा प्रासंगिक यह कि अनुचित क्यों है! शायद इसलिए कि ‘भारत जीता’ के साथ क्रिकेट मैच देखने वालों के अभ्यस्त दिमाग के लिए उभरता है एक ही वाक्य- ‘पाकिस्तान हारा’। यह अर्थ निकालना अनर्थ और अतिरंजित होगा। मगर इसका एक अर्थ यह हो सकता है कि मुसलिम समर्थक राजनीति हारी। तो क्या जीत मुसलिम विरोधी राजनीति की हुई?

बहरहाल, मोदी खुद को देश का पर्याय मानते हैं। पार्टी का भी पर्याय मानते होंगे। तो क्या उनकी जीत देश की जीत हुई? ऐसा पहले इंदिरा गांधी कह चुकी हैं। उनके समर्थकों ने ‘इंदिरा इज इंडिया’ का नारा दिया था। इसलिए मोदी की जीत से देश की जीत के मिलान में कोई खास नवीनता नहीं। एक अर्थ हो सकता है कि इस बार भारत जीता, हर बार पाकिस्तान जीतता था! इसे भी बकवास कहा जाएगा। चलिए, चीन, नेपाल या श्रीलंका का नाम ले लेते हैं! भारत एक देश का नाम है तो हारेगा भी कोई देश ही न! देश के भीतर दो देश तो हो नहीं सकते हैं। फिर सवाल है कि चुनाव अपने देश में हुआ तो कोई पड़ोसी मुल्क कैसे जीतेगा या हारेगा? हां, पड़ोसी या दूरदराज के मुल्कों का नाम आ सकता है। यानी पाकिस्तान-परस्त राजनीति की हार और अमेरिका-परस्त राजनीति की जीत हुई आदि! लेकिन लगता नहीं कि मोदी अभी विदेश नीति को ध्यान में रख कर ऐसा कह रहे हैं।

मुझे बार-बार लगता है कि वे देश की अंदरूनी राजनीति को ध्यान में ही रख कर यह जुमला उछाल रहे थे- ‘इंडिया विन्स।’ एक अर्थ यह हो सकता है कि पहले भारत विरोधी जीतते थे, इस बार भारत के हितैषी जीते हैं! पहले राष्ट्र-विरोधी जीतते थे, इस बार राष्ट्रवादी जीते हैं! लेकिन अगर मोदी के वाक्य की ऐसी व्याख्या हो तो वह भी उचित नहीं। यह तो बच्चों वाली बात हुई कि चुनाव जीतने वाले राष्ट्रभक्त और चुनाव


हारने वाले राष्ट्र-विरोधी! तब तो 1974 के पहले के चुनावों में भाजपा या जनसंघ कभी संसद में दो अंकों वाली पार्टी नहीं बन सकी थी। इसका मतलब कि क्या तब वह ‘राष्ट्रद्रोही’, ‘देश की दुश्मन’ वगैरह थी? और अगर वह अगले चुनाव में फिर पिट गई तो क्या वह राष्ट्रभक्त से ‘राष्ट्र-विरोधी’ हो जाएगी? ऐसे अर्थों से तानाशाही की बू आती है। ऐसा हिटलर मानता था कि उसका विरोधी जर्मनी का भी विरोधी है।

मेरे भीतर से एक सहमी हुई शंका सिर उठाती है। कहीं हिंदुस्तान तो नहीं हार गया! वह हिंदुस्तान, जिसमें सहिष्णु हिंदू रहते हैं, मुसलमान, दलित, आदिवासी और ईसाई भी। कुछ लोग कहेंगे कि मोदी इतने ज्यादा मतों से जीते हैं तो जाहिर है, उन्हें सभी तबकों का समर्थन हासिल हुआ। लेकिन मुझे तो आशंका है। मुसलमान तो भाजपा में नहीं हैं! उन्होंने टिकट ही बहुत कम मुसलमानों को दिया तो रहेंगे क्यों? रहे दलित और आदिवासी। उत्तर प्रदेश को ही सामने रख लिया जाए। मायावती का दलित वोट उनसे पूरी तरह जुड़ा रहा, भले ही वह सीटों में तब्दील नहीं हुआ। उन्हें उन्नीस-बीस फीसद वोट मिले। जाहिर है, दलितों ने भाजपा को वोट नहीं दिया। इसके अलावा, अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट से तो आदिवासी ही जीतेंगे। भाजपा की भी यह मजबूरी है कि उन्हें उन सीटों से आदिवासी उम्मीदवार उतारने थे। झारखंड में छह सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा के दो और चार पर भाजपा प्रत्याशी जीते। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश आदि राज्यों के आदिवासियों की तो बात ही नहीं की जाए। वहां आदिवासियों की कोई अलग पार्टी नहीं। यानी जीतेगा वही दलित प्रत्याशी जो उनकी पार्टी का मुखापेक्षी होगा। यह खतरनाक है। जिन्ना और आंबेडकर इसी से आशंकित थे। उन्हें लगता था कि बहुसंख्यक आबादी के साथ तो अल्पसंख्यक आबादी का दम घुट जाएगा। ‘इंडिया विन्स’ इस डर को घनीभूत करता है। मेरी बेचैनी का सबब यह है!


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