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वाम के लिए सबक PDF Print E-mail
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Wednesday, 21 May 2014 11:51

अरुण माहेश्वरी

जनसत्ता 21 मई, 2014 : सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा की भारी लेकिन एक प्रकार से प्रत्याशित जीत ही हुई है। चुनाव प्रचार के दौरान ही इसके सारे संकेत मिलने लगे थे। फिर भी हमारे इधर के कई मंतव्यों से यह साफ है कि हम सामने दिखाई दे रहे इस सच को संभवत: समझ या स्वीकार नहीं पा रहे थे। 

हालांकि हमने ही अपनी एक टिप्पणी में लिखा था कि भारत का आर्थिक एकीकरण पहले के किसी भी समय से कहीं ज्यादा मजबूत हुआ है और इसके चलते सामाजिक एकीकरण की प्रक्रिया को बल मिला है। इसी के आधार पर हमने इस चुनाव में जाति, धर्म के पूर्वग्रहों से मुक्त नौजवान मतदाताओं पर भरोसा करते हुए आम आदमी पार्टी के भारी उभार की उम्मीद की थी। उसी सिलसिले में हमने वामपंथियों सहित देश की दूसरी सभी राजनीतिक पार्टियों के नवीनीकरण की मांग भी उठाई थी। 

यह अवलोकन दिल्ली के चुनाव और उसमें आम आदमी पार्टी की अप्रत्याशित सफलता के संदर्भ में था। 

उल्लेखनीय है कि उस समय तक नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जा चुका था और उन्होंने अपने प्रचार का काम शुरू भी कर दिया था। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को अपूर्व सफलता मिली थी। इसके बावजूद, दिल्ली के परिणामों और ‘आप’ की तरह की एक नई पार्टी के सामने आने के चलते उस समय हम भाजपा के स्वरूप और उसके संचालन में आ रहे परिवर्तन की थाह पाने में विफल रहे थे। 

बाद के समय में, ज्यों-ज्यों नरेंद्र मोदी का प्रचार आगे बढ़ा, देश के कोने-कोने से मोदी की गूंज सुनाई देने के बावजूद हम उस आवाज को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं थे। कांग्रेस की पराजय तो साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन भारतीय यथार्थ के बारे में अपने ही पूर्व आकलन के विपरीत हम स्वयं जाति-धर्म-क्षेत्र में बंटे भारतीय जन-मानस के पूर्वग्रह से बाहर नहीं निकल सके। यह यकीन करने के लिए तैयार ही नहीं थे कि एक खास धर्म और उसकी ऊंची जातियों के साथ जिस संघ परिवार की पहचान जुड़ी रही है, उसका कोई नेता कभी भी इस सीमा का अतिक्रमण करके सभी जातियों और सभी क्षेत्रों के लोगों की स्वीकृति हासिल कर पाएगा। इसीलिए चुनाव को गणितीय पैमाने पर परखते हुए ऐसा लग रहा था कि एक सांप्रदायिक समझी जाने वाली पार्टी को चुनने के बजाय निराश लोग फिर एक बार, सामयिक तौर पर ही क्यों न हो, अपनी जातीय और क्षेत्रीय अस्मिताओं के खोल में घुस जाएंगे। कांग्रेस के विकल्प के तौर पर तथाकथित तीसरी ताकतों के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करेंगे। 

हम मोदी के प्रचार के प्रभाव को देख पा रहे थे। पार्टी को दरकिनार करके अकेले खुद को एकछत्र नेता घोषित कर, ‘मोदी सरकार’ के नारे के पीछे से जाहिर हो रहे सर्वाधिकारवाद को भी देख रहे थे। मोदी के इस प्रकट सर्वाधिकारवादी रवैये के प्रति जनता के उन्मादपूर्ण समर्थन से हम चिंतित भी थे और सोच रहे थे कि क्या आज के नवउदारवादी दौर का ऐसी किसी प्रकट तानाशाही से कोई संबंध हो सकता है? इसी प्रश्न के साथ हमने चंद रोज पहले ही चीन के बारे में अपने एक अवलोकन में देखा था कि कैसे चीन की सर्वाधिकारवादी सरकार नवउदारवाद के अपने एजेंडे पर चलते हुए प्रशासन की प्रणाली के मामले में सारी दुनिया की संसदीय जनतांत्रिक प्रणाली को प्रश्नों के घेरे में खड़ी कर दे रही है। 

‘चीन एक ऐसी शासन प्रणाली का उदाहरण बना हुआ है जो जनता की कम से कम भागीदारी पर टिकी हुई पूरी शक्ति के साथ निर्णयों पर अमल करने वाली प्रणाली है और जिसमें जनता के प्रतिवाद और आक्रोश को काबू में रखने की भरपूर सामर्थ्य है। शायद इसीलिए कॉरपोरेट जगत इसको लेकर उत्साही है- वित्तीय पूंजी के साम्राज्य के निर्माण की एक सबसे अनुकूल प्रणाली। वह दुनिया के संसदीय जनतंत्रवादियों को इससे सीखने, इसे अपनाने पर बल दे रहा है।’

भारत में चुनाव प्रचार के दौरान चीन की शासन प्रणाली के बारे में हमारा यह आग्रह अनायास नहीं था। इसका सीधा संबंध भारत में मोदी और उनके प्रचार को मिल रहे व्यापक समर्थन को समझने की कोशिश से जुड़ा हुआ था। 

इन सबके बावजूद हम इस सच को देखने से पूरी तरह चूक गए कि मोदी-मोदी की पुकार की गूंज-अनुगूंज के पीछे दूसरे किसी भी समय की तुलना में कहीं अधिक एकीकृत भारत का सच, कॉरपोरेट की कामनाओं के साथ ही जनता की विकास की इच्छाओं के सच की भी अभिव्यक्ति हो रही है। बीच-बीच में भाजपा के कुछ नेताओं की उत्तेजक, विष-बुझी बातों और खुद नरेंद्र मोदी की भी कतिपय टिप्पणियों से हमारे उस पूर्वग्रह की पुष्टि होती थी कि अंतत: मोदी का पूरा जोर सांप्रदायिक और जातिवादी विभाजन पर जाकर टिक जाएगा और अपेक्षाकृत एकीकृत भारत के सच के बजाय इस चुनाव का निर्णायक तत्त्व वही पुराना, अस्मिताओं की राजनीति वाला ही रह जाएगा। 

इसी आधार पर, चुनावी गणित के जोड़-तोड़ से अंत तक हम इसी भ्रम में रहे कि राजग स्पष्ट बहुमत से काफी दूर रहेगा। मीडिया के बिकाऊ चरित्र के बारे में अपनी समझ के चलते उसके जनमत सर्वेक्षणों और मतदानोत्तर सर्वेक्षणों की भविष्यवाणियों को भी हमने भरोसे के लायक नहीं माना। और इस प्रकार, बहुत सारी चीजों को देखते हुए भी हम अनदेखा करते रहे। परिणामत:, इस चुनाव के बारे में हमारे तमाम विश्लेषण वास्तविकता से कोसों दूर हो गए। 

बहरहाल, अब भाजपा को संसद में अकेले पूर्ण बहुमत और राजग को तीन सौ छत्तीस सीटें मिलना निस्संदेह एक ऐतिहासिक घटना है। इसे कुछ मायनों में भारतीय राजनीति के एक नए युग का प्रारंभ भी कहा जा सकता है। मनमोहन सिंह ने नवउदारवादी नीतियों के तहत भारत के आधुनिकीकरण का एक पूरा खाका तैयार किया था


और अपनी शक्ति भर वे उस पर अमल भी कर रहे थे। लेकिन यह काम टुकड़ों-टुकड़ों में हो रहा था। खुद भाजपा और दूसरी कई पार्टियों के रुख के चलते उसे लगातार संसदीय अवरोधों का सामना करना पड़ता था। फलत:, सरकार में एक प्रकार की प्रकट नीतिगत पंगुता दिखाई देने लगी थी। 

अब, संसद के पूरी तरह से बदल चुके गणित में उस नक्शे पर ही बिना किसी बाधा के पूरी ताकत के साथ अमल करना संभव होगा। यही मोदी का गुजरात मॉडल भी है। इसका असर अभी से दिखाई देने लगा है। सेंसेक्स अपूर्व गति से बढ़ रहा है, रुपए की कीमत भी बढ़ रही है। विदेशी निवेशक स्पष्ट तौर पर भारत में अब राजनीतिक-आर्थिक स्थिरता देखेंगे और इसीलिए भारत को निवेश की दृष्टि से एक पसंदीदा गंतव्य के तौर पर माना जाएगा। निवेश बढ़ेगा तो आर्थिक गतिविधियां भी बढेंÞगी, शहरों की चमक बढ़ेगी, थोक-खुदरा सब प्रकार के व्यापार में विदेशी पूंजी के निवेश का मार्ग प्रशस्त होगा और बाजारों का रूप बदलेगा। चीन में लगातार तीन दशकों के सुधारवाद के बाद अब क्रमश: जिस प्रकार उत्पादन-खर्च में कमी का लाभ सिकुड़ता जा रहा है, ऐसी स्थिति में पश्चिमी निवेशकों को भारत विनिर्माण के क्षेत्र में भी एक नए और सस्ते विकल्प के रूप में उपलब्ध होगा। भूमि कानून में संशोधनों के जरिये भूमि के विकास के रास्ते की बाधाएं कम होंगी, शहरीकरण की प्रक्रिया को सीधे बल मिलेगा। 

संसद में भाजपा के पूर्ण बहुमत के कारण एक सकारात्मक संभावना यह भी है कि एक बार के लिए प्रत्यक्ष राजनीतिक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा, जिसने पिछले दिनों इतना विकराल रूप ले लिया था कि नेता का अर्थ ही अनैतिक और भ्रष्ट व्यक्ति माना जाने लगा था। 

कहने का तात्पर्य यह है कि अब नवउदारवादी नीतियों के पूरी तरह से खुल कर खेलने का नया दौर शुरू होगा। इसमें आम जनता को खैरात के तौर पर दी जाने वाली तमाम राहतों में कटौती होगी। सरकार नहीं, हर किसी को खुद अपनी सुध लेनी होगी। बलशाली का अस्तित्व रहेगा और निर्बल रहेगा भाग्य-भरोसे। 

यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्टों में नवउदारतावाद की नीतियों के तहत होने वाले इस विकास को ‘रोजगार-विहीन, वाणी-विहीन, जड़-विहीन, निष्ठुर विकास’ बताया जाता है। 

यह आज के अत्याधुनिक तकनीकी युग की बीमारी का परिणाम है। न्यूनतम श्रम-शक्ति के प्रयोग से अधिकतम उत्पादन की संभावनाओं का सामाजिक परिणाम। एक शक्तिशाली राजसत्ता की दमन की बेइंतहा ताकत का परिणाम। विदेशी निवेशकों द्वारा आरोपित नीतियों का परिणाम। पूंजी के हितों से जुड़ी मानवीय संवेदनशून्यता का परिणाम। 

यह भावी तस्वीर का एक पहलू है। दूसरा पहलू, आरएसएस से जुड़ा हुआ है। अब पहली बार आरएसएस वास्तव में भारत की राजसत्ता पर पहुंचा है। भारतीय समाज के बारे में उसका अपना एक अलग कार्यक्रम है जिसे वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर चलाता है- हिंदुत्व का कार्यक्रम, हिंदू राष्ट्र के निर्माण का कार्यक्रम। यह भारत के वर्तमान धर्मनिरपेक्ष संविधान को बदल कर उसकी जगह धर्म-आधारित राज्य के निर्माण का कार्यक्रम है। यह 2002 के गुजरात वाला कार्यक्रम है। आज मोदी भारत के संविधान के प्रति निष्ठा की कितनी भी बातें क्यों न कहें, आरएसएस का प्रचारक होने के नाते वे भी आरएसएस के इस कार्यक्रम से प्रतिबद्ध हैं। 

नवउदारवाद के आर्थिक कार्यक्रम को छोड़ कर मोदी अगर आरएसएस के कार्यक्रम पर अमल की दिशा में बढ़ते हैं, तो ऊपर हमने आर्थिक क्षेत्र के संदर्भ में जो तमाम बातें कही हैं, उनके बिल्कुल विपरीत दिशा में परिस्थितियों के मुड़ जाने में थोड़ा भी समय नहीं लगेगा। वह भारतीय समाज को फिर से कबीलाई समाज की ओर ले जाने का रास्ता होगा। उसकी अंतिम परिणति कुछ वैसी ही होगी, जैसी हिटलर और मुसोलिनी ने जर्मनी और इटली की कर दी थी। हाल के लिए हम यह उम्मीद करते हैं कि मोदी सरकार इस आत्मघाती पथ पर कदम नहीं बढ़ाएगी। 

इसीलिए हम इन चुनाव परिणामों को भारत के आधुनिकीकरण की दिशा में एक स्पष्ट और दृढ़ दक्षिणपंथी मोड़ के रूप में देख पा रहे हैं। आने वाले भारत में यही वे नई परिस्थितियां होंगी, जिनके अंतर्विरोधों पर आगे की राजनीति की सीमाएं और संभावनाएं तय होंगी। 

इस चुनाव ने भारतीय वामपंथ की लगभग जीवाश्म-सी स्थिति को बेपर्द कर दिया है। पश्चिम बंगाल में चौंतीस वर्षों तक लगातार एकछत्र शासन करने वाली माकपा को यहां सिर्फ दो सीटें मिल पाई हैं। पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव के समय ही माकपा की आंतरिक दुर्दशा के, उसके राजनीतिक खोखलेपन के सारे प्रमाण सामने आ गए थे। इधर के सालों में ज्योति बसु प्रसंग और एटमी करार पर उसकी नीतियों के बचकानेपन के राजनीतिक परिणाम साफ दिखाई दे रहे थे। 

इसके बावजूद माकपा अपने को सुधारने और समयोपयोगी बनाने में कितनी असमर्थ है, वह अब पूरी तरह से सामने आ चुका है। अब भी अगर भारतीय वामपंथ पहले की तरह ही अपने खोल में बंद रह कर कोई सार्थक भूमिका अदा करने का सपना देखता रहेगा तो यह भारत के मेहनतकशों के हितों की लड़ाई की दृष्टि से बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा।


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