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शहर में सपना PDF Print E-mail
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Tuesday, 20 May 2014 11:40

अलका मनराल

जनसत्ता 20 मई, 2014 : सपने, सपनों जितना ही प्यारा शब्द! जिसे हर कोई देखता है, पर ये पूरे कम ही लोगों के होते हैं। ये निष्ठुर सपने देखने में जितने सुहाने लगते हैं, सच बनने में उतना ही परिश्रम और कीमत भी मांगते हैं। मैंने भी सपने देखे, जिन्हें पूरा करने के लिए आ गई, अपनों से दूर एक बड़े शहर (लोग यही कहते है) में। इस बड़े शहर ने मुझे कई बड़े-छोटे और खास अनुभव दिए। दिल्ली में छोटे शहरों से आए लोगों के लिए देखने को बहुत कुछ है। इसका आभास मुझे मेट्रो में हो गया था। हर इंसान अपनी धुन में मस्त, कान में ईयरफोन लगाए या फोन में खोया था। आसपास के लोगों और माहौल से एक स्तर पर मतलब होते हुए भी कोई मतलब नहीं था। कमरे तक पहुंचने के बीच रास्ते में सिगरेट पीती हुई लड़कियां देखीं। यह अब तक अपने शहर में नहीं देख सकी थी। यह विवाद मेरा विषय नहीं है कि लड़कियां सिगरेट का सेवन करें या नहीं! जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में परीक्षाओं की तैयारी में लगी रही, लेकिन इस बीच दिल्ली की चमक-दमक ने मुझे कभी आकर्षित नहीं किया। या यों भी कह सकते हैं कि इस मसले पर सोचने का वक्त भी नहीं मिला। इसके बावजूद, परीक्षा में आखिरकार मैं फेल हो गई। सपना तो सपना ही बना रह गया।

खैर, फिर कुछ चीजों का सहारा लेकर मैं दोबारा खड़ी हो गई। लेकिन मैं ही जानती हूं कि आज भी जेएनयू का नाम सुन कर मेरी आंखों में उस छोटे बच्चे के तरह चमक कैसे आ जाती है, जिससे उसकी पसंद का खिलौना दिखाया जाए, लेकिन मांगने पर छिपा लिया जाए! दूसरे कॉलेज में दाखिला लिया। कॉलेज जाने के लिए बस में भागने की आदत डाली। घंटों एक ही शहर में इधर-उधर जाने के लिए सफर करना सीखा। मुझे लगता है कि इस शहर में रहने के लिए दो चीजें बहुत जरूरी है। आपको बसों के पीछे भागना आना चाहिए, नहीं तो सीख लेना चाहिए और बस में सफर करने से ज्यादा बस स्टैंड पर बसों का इंतजार करने की आदत! यह समय के साथ हर इंसान को पहले या बाद में आ ही जाता है। यह लोगों की मजबूरी है और शायद सरकारी


व्यवस्था की ‘खासियत’!

एक चीज सब जगह दिखी। यहां का इंसान बहुत हड़बड़ी में है। चलते-फिरते, कुछ खरीदते और यहां तक कि बात करते हुए भी जल्दी में है। कई बार मुझे यहां का इंसान परोक्ष रूप से अकेला भी लगता है, जो फेसबुक, ट्विटर और वाट्स-एप में दोस्तों के साथ तो है, लेकिन अपने आसपास बैठे-खड़े मौजूद लोगों के साथ नहीं है। यानी तकनीकी ने आदमी को ऐसा आभासी मशीन बना दिया है जो सिर्फ मशीनी आदमी से ही बात करता है।

अब तक के अनुभवों के दौरान मैंने बसों की कूचम-कूच, बहसें, लड़ाई-झगड़े या बहुत कुछ नकारात्मक ही नहीं, बल्कि इसके साथ-साथ महिलाओं और बुजुर्गों को सीट देने जैसा सम्मान भी देखा। सड़क पार करते हुए अपने साथ दूसरे को भी सड़क पार कराने की फिक्र देखी। यहां की भागती जिंदगी में हमलोग चिड़चिड़े हो गए हैं जो जरा-सा कुछ कहने पर दूसरे को काट खाने को दौड़ते हैं, लेकिन कई बार मदद के समय आगे भी आते हैं। मैं यह नहीं कह सकती कि दिल्ली अच्छी है या बुरी, क्योंकि यहां दोनों ही चीजें मैंने देखीं। यह स्थिति शायद हम सबने ही मिल कर बनाई है, जो अपने सपनों को पूरा करने यहां आए हैं। कोई पहले तो कोई बाद में! इस बड़े शहर में लोग अपने बड़े-बड़े सपनों के साथ इस बड़े शहर की भीड़ में कब खो जाते हैं, पता ही नहीं चलता और हमेशा के लिए यहां के ही होकर रह जाते हैं।        


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