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लालू को सलाम PDF Print E-mail
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Tuesday, 20 May 2014 11:38

राजकिशोर

जनसत्ता 20 मई, 2014 : लालू प्रसाद मेरे पसंदीदा नेताओं में नहीं रहे हैं। जब मैंने उन्हें पहली बार जाना, तब मुझसे एक बहुत बड़ी भूल हो गई था। मैंने लालू प्रसाद की जगह लल्लू प्रसाद लिख दिया था। वे ‘रविवार’ के दिन थे। संयुक्त संपादक योगेंद्र कुमार लल्ला ने मेरी यह भूल दुरुस्त की थी। उसके बाद मैंने ऐसी भूल कभी नहीं की।

फ्रायड का कहना है कि भूलें यों ही नहीं होतीं। उनके होने में अवचेतन की भूमिका होती है। उदाहरण के लिए, जो व्यक्ति हमें प्रिय न हो, उसके बारे में कोई विवरण लिखते समय गलती होने की संभावना रहती ही रहती है। जहां तक मेरा सवाल है (मैंने ‘इस नाचीज का’ लिख कर काट दिया), अवचेतन तो क्या, अब लगता है कि अपने चेतन पर भी मेरा नियंत्रण नहीं है। कहना चाहता हूं कुछ, कह कुछ और जाता हूं। करना कुछ चाहता हूं, कर जाता हूं कुछ और। फ्रायड की विश्लेषण शैली में, हो सकता है मैं वही कहता या करना चाहता था जो मैंने वास्तव में कहा या किया। यह असंभव नहीं है, क्योंकि जमीन से कुछ ज्यादा ही जुड़े हुए भदेस नेताओं ने वितृष्णा की मेरी क्षमता को बढ़ाया ही है। यह कह कर मैं ग्रामीणता का अपमान नहीं कर रहा हूं- बस यह इशारा करना चाहता हूं कि इसकी कोई एक किस्म नहीं है, जैसे शहरातियों की भी कोई एक किस्म नहीं है।

लेकिन आज मैं लालू प्रसाद को बधाई देना चाहता हूं। बधाई इसलिए कि जहां अन्य सभी नेताओं ने नरेंद्र मोदी को उनकी कद्दावर जीत के लिए बधाई दी है, लालू प्रसाद ने साफ इनकार कर दिया। उन्होंने पूछा, इसमें बधाई देने को है क्या! क्या मैं सांप्रदायिक शक्तियों से समझौता कर लूं? अगर प्रश्नकर्ता ने यह जवाब दिया होता कि शिष्टाचार के नाते ही सही, आप उन्हें बधाई दे सकते थे, तो लालू जरूर यह सुना देते कि यहां देश के भविष्य का सवाल है, तुम्हें शिष्टाचार की सूझी है।

कहते हैं, जब राजा पोरस सिकंदर से हार गया, तो उसे विजेता के दरबार में पेश किया गया। सिकंदर ने पूछा- ‘तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाए?’ पोरस ने जवाब दिया- ‘जैसा व्यवहार एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है।’ यह जवाब सुन कर सिकंदर खुश हो गया। उसने पोरस को न केवल मुक्त कर दिया, बल्कि उसका राजपाट भी लौटा दिया। एक वीर दूसरे वीर का सम्मान इसी तरह करता है। भूतपूर्व राजा हो जाने से पोरस राजा से प्रजा नहीं हो गया था। उसका राजसी स्वाभिमान जरा भी क्षत नहीं हुआ था। वह हारा हुआ राजा था, फिर भी राजा तो था। पद-पदवी हट जाने से कोई स्वाभिमानी आदमी दीन-हीन नहीं हो जाता। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने बताया है कि अर्जुन


की दो प्रतिज्ञाएं थीं- ‘न दैन्यं न पलायनम्’- न दैन्य न पलायन। लालू इस समय अपनी सबसे गिरी हुई हालत में हैं। लोकसभा चुनाव में उनका पूरा परिवार हार गया। फिर भी उनका तेज नहीं घटा है।

शिष्टाचार भी एक अजीब शै है। मेरे खयाल से, यह सभ्यता की विभिन्न धूर्तताओं में एक है। जिस आदमी को आप बिल्कुल पसंद नहीं करते, किसी पार्टी में उससे परिचय कराया जाए, तो शिष्टाचार हुक्म देता है कि आप कहें- ‘आपसे मिल कर खुशी हुई!’ वह भी यही कहता है- ‘आपसे मिल कर खुशी हुई!’ वह जानता है कि खुशी नहीं हुई, आप भी जानते हैं कि खुशी नहीं हुई। लेकिन सत्य और झूठ के बीच शिष्टाचार आकर खड़ा हो गया था। वह अटक कर नहीं, मटक कर कह रहा था- ‘सत्यम् नहीं, प्रियम् ब्रूयात।’ सभ्यता जब शिष्टाचार के आगे सिर झुका दे, तो मानना चाहिए कि वह कुछ कम सभ्य हो गई है।

अपने विरोधी को, खासकर राजनीतिक विरोधी को क्यों बधाई दें? उससे तो यही कहा जा सकता है- ‘ठीक है, आप जीत गए, लेकिन हम हार नहीं गए हैं। पांच वर्ष के बाद हम फिर मिलेंगे और देखेंगे कि तब कौन जीतता हैं।’ लेकिन ऐसा क्या कहा जा सकता है? प्रिय मत बोलिए, मगर अप्रिय भी क्यों बोलें? क्या चुप रहना काफी नहीं है? मौन हमेशा स्वीकृति का लक्षण नहीं होता। वह इनकार का चिह्न भी हो सकता है। अपने से बड़े अधिकारी के सामने हम विरोध न कर अक्सर चुप रहते हैं। कहा जा सकता है कि यह शिष्टाचार की उच्चतम सीमा है। सामने वाला भी अगर इस बिंदु के भीतर है, तो उसे भी चुप्पी का मर्म ताड़ जाना चाहिए।

इस मामले में ग्रामीण शहराती से ज्यादा सत्यवादी हैं। दरअसल, जिसे शिष्टाचार कहा जाता है, वह दरबारी संस्कृति का एक बुनियादी पहलू है। वहां विरोध भी तमीज से किया जाता है। बाहर-बाहर मीठे शब्द कहे जाते हैं, भीतर-भीतर जड़ काटी जाती है। लालू प्रसाद को सलाम कि उन्होंने अपने मुद्दे की बेइज्जती नहीं की।


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