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Monday, 19 May 2014 10:37

अशोक लाल

जनसत्ता 19 मई, 2014 : सोलह मई को लगभग सभी टीवी चैनलों के उद्घोषकों ने नवजोत सिंह सिद्धू की याद दिलाई। सिद्धू वाला ‘वो मारा पापड़ वाले को’ जैसी टिप्पणियां आम रहीं। बहुत सारे लोग भगवा रंग के झंडे फहराते लगे। कहा जाता है कि अगर आपके खुशनुमा सपने पूरे नहीं होते तो क्या, आपके बदनुमा सपने भी तो सच नहीं होते! काश, इस बार भी मीडिया के प्रचार और मेरे दिमाग में उपजी बदगुमानियों के सिलसिले में यह बात खरी उतरे। मगर सच यह है कि अबकी बार संघ परिवार और मोदी की सरकार को लेकर चिंताओं के बादल कुछ ज्यादा ही गहरे हैं। किसी संदर्भ में मैंने ये दो पंक्तियां लिखी थीं- ‘भयानक से भयानक आदमी को गौर से देखो/ कभी मासूम लगता है, कभी बेचारा लगता है!’

पता नहीं क्यों, आज अपना ही शेर दिलासा ज्यादा लग रहा है, सच्चाई कम। चुनाव के आखिरी पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते सारे नकाब उतर चुके थे और उसके बाद ‘जीत’ के नशे में की गई बयानबाजियों ने कई ताजा घाव किए हैं और पुराने जख्मों को कुरेदा है। चुनाव के दौरान प्रवीण तोगड़िया और गिरिराज सिंह जैसे लोगों के जहरीले बयान अपने आशंकित दिमाग की उपज लगते, अगर संघ तोगड़िया के बयान पर सहमति नहीं जताता और सिंह के बयान से भाजपा सिर्फ दूरी नहीं दिखाती। गिरिराज सिंह ने हाल ही में फिर से जहर उगला है। संघ को मालूम है कि गिरिराज सिंह ने जैसी असंवैधानिक और जहरीली बातें कहीं हैं, उन्हें धीरे-धीरे एक वाजिब नजरिया माना जाना लगेगा, जैसे बाबरी मस्जिद को ढहाने वालों को जेल नहीं, बल्कि सत्ता मिल गई!

मोदी का दाहिना हाथ माने जाने वाले अमित शाह ने अपने बदला लेने वाले बयान पर पहले तो माफी मांग ली, क्योंकि चुनाव के दिनों में संघ और उसके ‘साहेब’ को उसकी जरूरत थी, मगर कुछ दिनों बाद कह दिया कि जो कहा, वह ठीक था। वाराणसी में मोदी ने धमकी देते हुए चुनाव आयोग पर ‘पूरी जिम्मेदारी’ से ‘पक्षपात’ का आरोप लगाया और उस शाम टीवी पर पार्टी के एक बड़े ओहदे वाले प्रवक्ता का चेहरा आयोग के खिलाफ गुस्से में तमतमा रहा था और जबान लड़खड़ा रही थी। मजाक की बात यह कि बीच-बीच में प्रवक्ता यह भी दोहरा रहा था कि उनकी पार्टी संवैधानिक पदों का सम्मान करती है। अमित शाह और मोदी के एक महिला पर जासूसी करने के मामले को जब यूपीए ने बचकाने ढंग से किसी जज के हवाले करने की बात की, तो जेटली ने कहा कि कोई जज इस बात के लिए राजी नहीं होगा। यह बात उन्होंने कुछ इस अंदाज से कही कि उसमें थोड़ी धमकी भी शामिल हो गई!

यह सब कुछ डरावना है, मगर संघ और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के सार्वजनिक मंच से बांग्लादेशी शरणार्थियों के सिलसिले में असम और बंगाल में दिए गए बयानों की तुलना में कम। दूसरे युद्ध के बाद शरणार्थियों के मानव अधिकारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जितनी


चर्चा हुई है, शायद ही किसी और विषय पर हुई हो। मोदी की निगाह में हिंदुओं को शरणार्थी माना जाएगा और मुसलामानों को घुसपैठिया। भाजपा की प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी ने एक टीवी बहस में कहा कि सीमाओं की रक्षा करने के लिए इस तरह की राय सही है। बीच में बिना किसी हवाले के वे कश्मीरी पंडितों के वादी से बेघर हो जाने का जिक्र ले आर्इं, कुछ ऐसे कि वह एक मजहब विशेष को मानने वालों पर तोहमत लगा।

मेरी पीढ़ी के स्कूल-कॉलेज के दिनों में और छोटे शहरों में, जहां मैं रहा हूं, ‘खाकी नेकर’ वालों से ऐसी बातें सुनने को अक्सर मिलती थीं। हम यह समझ बैठे थे कि ऐसे लोग हाशिये पर हैं और वहीं रहेंगे। आज जब उनका बोलबाला हो रहा है तो मुझे अपने कई हमउम्रों की बातों से ऐसा लगता है कि उन्हें भी संघ परिवार और आजादी की लड़ाई के दौरान गोलवलकर जैसे उनके पूर्वजों और अखंड भारत, हिंदू राज और मुसलमानों के खिलाफ रवैए के फलसफे के बारे में कोई जानकारी नहीं है। मोदी के ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ होने के ऐलान में उन्हें वतनपरस्ती नजर आती है। उन्होंने शायद इस पर ध्यान नहीं दिया कि संघ ने नतीजों के दो-तीन दिन पहले कह दिया कि मोदी के राज में राम मंदिर, समान नागरिक संहिता और धारा 370 के मुद्दों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

मुझे कांग्रेस से यह शिकायत रही है कि उसके आदर्शों और आचरण के बीच बहुत गहरी खाई है। भाजपा को लेकर मेरा डर यह है कि वह संघ के आदर्शों को ही आचरण में ढालेगी। एक टीवी चैनल ने सवाल उठाया कि क्या ‘ब्रांड मोदी’ अब ‘ब्रांड गांधी’ से बड़ा है! मार्केटिंग वालों ने अपने अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों से हमें यही बता रखा है कि हिंदुस्तान की सबसे जाने-माने ‘ब्रांड’ हमेशा महात्मा गांधी रहे हैं। चैनल का आशय शायद ‘इंदिरा गांधी ब्रांड’ से रहा हो। मगर मार्केटिंग और चीयर-लीडर्स के दौर में मुझे हैरानी नहीं होगी कि वे ‘महात्मा गांधी ब्रांड’ का ही जिक्र कर रहे हों। अब आगे क्या होगा, पता नहीं! काश भयानक से भयानक चेहरे में मासूमियत देख पाने की मेरी सलाहियत बनी रहे! काश, मेरे बदनुमा सपने भी सच्चे न हों!


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