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मोदी के अच्छे दिन का अर्थ PDF Print E-mail
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Saturday, 17 May 2014 12:11

अरुण कुमार त्रिपाठी

जनसत्ता 17 मई, 2014 : सोलह मई को आए चुनाव नतीजों के दूरगामी अर्थ और असर हैं। इसका सबसे पहला अर्थ तो यह है कि

राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की जो राजनीति 1989 के बाद शुरू हुई थी उसका अंत हो गया है। भारतीय जनता पार्टी को अपने बूते पर पूर्ण बहुमत मिल गया है और अब गठबंधन की राजनीति चलाना उसकी मजबूरी नहीं, उसकी रणनीति है। कहते हैं कि वह रणनीति के तहत इसे चलाना चाहती है ताकि बुरी तरह डूबी कांग्रेस को उबारने के लिए कोई हाथ थामने वाला न बचे। इसकी दूसरी रणनीति यह होगी कि देश में संघीय ढांचे की राजनीति भाजपा के ही कब्जे में रहे और वह विपक्ष की वैसी राजनीति न बन पाए जैसी कांग्रेस के विरुद्ध बन गई थी। 


इन परिणामों का दूसरा अर्थ यह है कि जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 1925 में बना था आज उसका देश की सत्ता पर कब्जा करने का सपना पूरा हो गया। भाजपा पूरी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नहीं है लेकिन वह उससे अलग भी नहीं है। क्रूर शब्दों में उसे भाजपा का रिमोट कहा जाता है और परिष्कृत भाषा में भाजपा के नेता इसे चंद्रगुप्त और चाणक्य के रिश्ते की तरह देखते हैं। अब देखना यह है कि संघ परिवार भारत में हिंदू राष्ट्र स्थापित करने की कोशिश करता है और लाल किले पर भगवा निशान फहराने जैसा कोई काम करता है या भारत के संविधान और उसकी संस्थाओं को ऐसा बना देता है कि वे बिना भगवा पहने ही वही भाषा बोलने लगते हैं। संभावना यह भी है कि नरेंद्र मोदी अपने को बदल कर पंडित नेहरू की तरह कुछ उदार बनने की कोशिश करें लेकिन अब वह उनकी मजबूरी नहीं है। खतरा यह भी है कि अगर वे वैसा करते हैं तो संघ परिवार और उसके तमाम संगठन उन्हें वैसा न होने दें। 

इसका तीसरा अर्थ कांग्रेस जैसी पार्टी का स्मृति-शेष लिखे जाने जैसा है। मोदी ने कांग्रेस-मुक्त भारत से अपने विमर्श की शुरुआत की थी और सचमुच उसका पहला गंभीर कदम उठा लिया है। लेकिन यह कल्पना करना कठिन है कि कांग्रेस और वामपंथ के बिना भारत की लोकतांत्रिक राजनीति और उसकी राजनीतिक और सामाजिक विचारधारा कैसी होगी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब 1984 में देश में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को चार सौ से ज्यादा सीटें मिली थीं तो कहा गया था कि विपक्ष समाप्त हो गया। लेकिन उसी समय समाजवादी विचारक सच्चिदानंद सिंहा ने कहा था कि देश में गठबंधन की राजनीति का दौर शुरू होने वाला है। आखिर वह शुरू हुआ और पच्चीस सालों तक चला। इसलिए यह बात सही है कि जनता ने कांग्रेस के परिवारवाद को भारत के इतिहास का सबसे करारा झटका दिया है और उसने संकेत दिया है कि कम से कम राष्ट्रीय स्तर पर वह नहीं चलेगा। यह संदेश उत्तर प्रदेश की उस सपा सरकार को भी है जिसे नरेंद्र मोदी ने मां-बेटे की दिल्ली की सरकार के बाद बाप-बेटे की सरकार कह कर संबोधित किया था। लेकिन क्या जनता इस संदेश पर कायम रहेगी यह अभी देखा जाना है। 

इस चुनाव का एक अर्थ यह भी है कि देश का मध्यवर्ग और कॉरपोरेट जगत उदारीकरण की विफलता से काफी नाराज था और वह उसके लिए वैश्विक नीतियों के बजाय सरकार और कांग्रेस के परिवारवाद और गठबंधन की राजनीति को दोषी ठहरा रहा था। उसने उसे दंड देने के लिए एक तरफ कांग्रेस को और दूसरी तरफ अधिकतर क्षेत्रीय दलों को नेस्तनाबूद कर दिया है। अब देखना है कि क्षेत्रीय ताकतें और मंडल और आंबेडकरवाद से निकली ताकतें किस तरह अपनी जगह और वजूद कायम रखती हैं। जनता ने यह संदेश दिया है कि देश में मंडल और मंदिर के बाद का दौर शुरू हो चुका है और नव उदारवाद को भी नए प्रकार से लाए जाने की जरूरत है। अगर भाजपा इस संदेश का अर्थ समझती है तो वह लंबे समय तक राज करेगी, वरना जनता उसे भी यूपीए की तरह दंड देने में कसर नहीं छोड़ेगी।

अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस देश की लंबी धर्मनिरपेक्ष विरासत को क्या हो गया? तमाम मंडलवादी और क्षेत्रीय दलों के अल्पसंख्यक समर्थक विमर्श से तैयार वह विचार क्यों इतना कमजोर हो गया। धर्मनिरपेक्षता की लाज बचाने और भाजपा के नेतृत्व और उसके विमर्श को उदार बताने के लिए यह दावा किया जा सकता है कि भाजपा ने चमत्कारिक सफलता कांग्रेस नीत यूपीए के भ्रष्टाचार से पैदा हुए असंतोष और उस बीच अपने विकास मॉडल को विकल्प के तौर पर पेश करके हासिल की। लेकिन छप्पन इंच के सीने से लेकर एके-47 तक फैले इस विमर्श में इतनी चौतरफा आक्रामकता थी जितनी पिछले बीस साल के चुनावों में कभी नहीं देखी गई। 

पर इसमें मोदी के नेतृत्व, हिंदुत्व और नवउदारवादी मॉडल के लिए आक्रामक असहिष्णुता दिखाने वाली पार्टी और संघ परिवार का कोई दोष नहीं है। उसने अपने स्वभाव के मुताबिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए रणनीति बनाई और उसमें सफल रही। उसने यह साबित कर दिया कि देश की वह अकेली पार्टी है जो मंदिर, मंडल और भूमंडल के एजेंडे को एक साथ संभाल सकती है और उसका एक खूबसूरत कॉकटेल बना कर जनता को आकर्षित कर सकती है। यही नहीं, भाजपा ने यह भी दिखा दिया कि वह भारत की क्षेत्रीयता यानी फेडरल ढांचे में यकीन करने वाली पार्टी होने का अहसास भी पैदा कर सकती है। इन सबसे ऊपर उसने यह भी बता दिया कि देश को कड़क और दबंग किस्म का नेता चाहिए, भाषा और व्यवहार की शालीनता से देश नहीं चलने वाला है। 

लेकिन इसमें भाजपा और उसके नेता नरेंद्र मोदी का कोई दोष नहीं है। भारत जैसे विशाल देश की केंद्रीय सत्ता हासिल करने के लिए जितनी कड़ी प्रतिस्पर्धा है उसके लिए कोई भी


राजनीतिक दल अपनी तिकड़म करेगा ही और सफल हो गया तो वही मजबूत सिद्धांत बन जाएगा। दिक्कत उन दलों से है जिन्होंने नरेंद्र मोदी के खिलाफ धर्मनिरपेक्षता का झंडा उठा रखा था और उसे तार-तार कर छोड़ दिया। 

संघ परिवार के हिंदुत्व की बढ़ती चुनौती के आगे इस देश की धर्मनिरपेक्षता चार तरह की उम्मीदों में जीती रही है। एक उम्मीद तो कांग्रेस जैसी पार्टी से रही है कि वह कितनी भी कमजोर और वंशवादी हो गई हो लेकिन आखिरकार इस पुरानी पार्टी का ढांचा देश को बचा ही लेगा। क्योंकि उसके भीतर महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद और स्वाधीनता संग्राम के अन्य नेताओं की एक विरासत पैठी हुई है और वह समय-समय पर खड़ी हो जाती है। दूसरी उम्मीद उन मंडलवादी और क्षेत्रीयतावादी दलों से रहती है जो कांग्रेस के विरोध से पैदा हुए हैं लेकिन समय-समय पर भाजपा के विरोध में भी खडेÞ होते रहे हैं। तीसरी उम्मीद संघ परिवार के अंतर्विरोध से रही है। 

चौथी उम्मीद इस देश की जनता से थी जिसे धर्मनिरपेक्ष कह कर गौरवान्वितकरने का लंबा विमर्श चलता रहता है। उसका जितना फायदा सेक्युलर दल नहीं उठाते उससे ज्यादा हिंदुत्ववादी दल उठाते हैं। इस बीच एक और उम्मीद उस पार्टी से भी उठी, जो राजनीति का नया व्याकरण लिखने का दावा कर रही थी लेकिन किसी विचारधारा के दायरे में बंधने को तैयार नहीं थी। 

कुल मिलाकर धर्मनिरपेक्षता को उम्मीद थी कि इस देश की जातियों, संस्कृतियों और भाषाओं की विविधता हिंदुत्व की सुनामी के विरोध में एक दीवार की तरह काम करेगी और उसका आधार अल्पसंख्यकों की एकजुटता तैयार करेगी। लेकिन धर्मनिरपेक्षता यह भूल गई कि उसका निर्गुण रूप तो लोगों को कठिन लगता ही था और जो सगुण रूप बन रहा था वह भी विद्रूप हो चुका है। इसलिए मंडल और भूमंडल के चक्रव्यूह में धर्मनिरपेक्षता अपने आप ही फंस गई। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश और बिहार की दलित और पिछड़ी जातियों के भरोसे धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई जीतने का दम भरा था। हालांकि इसी के साथ एक प्रकार का नियतिवाद भी था कि ये जातियां सवर्ण जातियों की तरह सांप्रदायिक नहीं स्वाभाविक तौर पर सेक्युलर होती हैं। लेकिन इन जातियों ने इस चुनाव में स्पष्ट तौर पर बता दिया कि ऐसा विश्वास करने का कोई कारण नहीं है। 

डॉ लोहिया ने ‘भारत विभाजन के गुनहगार’ में कहा था अगर इस देश के स्वाधीनता संग्राम में पिछड़ी और दलित जातियों के राष्ट्रवाद का उदय हुआ होता तो देश शायद ही बंटता। यानी उनकी स्वाधीनता संग्राम में भागीदारी न होने और सवर्णों के हाथों में नेतृत्व होने के कारण देश बंट गया। लेकिन उनकी बात आज गलत सिद्ध हो रही है। अब इस देश में सांप्रदायिक राजनीति का जो भी प्रसार हो रहा है उसके पीछे पिछड़ी और दलित जातियों की एकजुटता दिखाई पड़ रही है। इस एकता में आदिवासी भी शामिल हैं। यानी सवर्ण सांप्रदायिकता की बात अब पुरानी हो चुकी है और उसकी ताकत भी सीमित रही है। इसमें पिछड़ी और दलित जातियों की एकजुटता का खास अर्थ बन गया है। 

पर इस चुनाव में जातियों और उनके पार जाने वाली वर्गीय राजनीति ने बड़ा खेल किया है। परेशान मध्यवर्ग और युवाओं ने पहले अरविंद केजरीवाल के आंदोलन का हाथ थामा बाद लेकिन जब वे उनचास दिनों में ही सरकार छोड़ कर भाग निकले तो उसे मजबूत विकल्प के तौर पर मोदी और उनकी व्यापक पार्टी दिखी। पर शहरी मध्यवर्ग के इस सपने से गांव का किसान-मजदूर कैसे जुड़ गया? कहां गया वह आंदोलन और गांव बनाम शहर की खाई का सिद्धांत, जिसके तहत दोनों के हित अलग हैं और उनके मतदान की प्रवृत्ति भी अलग-अलग होती है। अच्छे दिन आने वाले हैं, अबकी बार मोदी सरकार, ये नारे शहरों तक सीमित नहीं रहे, घर-घर के तकियाकलाम बन गए। हंसी-मजाक में और गंभीरता में भी लोग इस नारे को गुनगुनाने लगे। धर्मनिरपेक्षता दीर्घकालिक राजनीतिक विरासत और जनता के हित में बने आर्थिक मॉडल पर खड़ी होती है। यह सही है कि उसमें समाज के विभिन्न अल्पसंख्यकों के लिए बेहतरीन गुंजाइश होती है।

इसके वाबजूद यह देखना दिलचस्प है कि कांग्रेस के लचर धर्मनिरपेक्ष मॉडल का खूब मजाक उड़ाया गया लेकिन उसके नवउदारवादी मॉडल की आलोचना नहीं हुई। उस मॉडल को जिस तरह ज्यों का त्यों ले लिया गया और उसी को बचाने के लिए धर्मनिरपेक्षता की धज्जियां उड़ाई गर्इं उससे बड़े खतरों के संकेत मिलते हैं। अगर हिंदुत्व के निशाने पर धर्मनिरपेक्षता रही तो कुछ वामपंथियों के निशाने पर नवउदारवाद रहा। 

नवउदारवाद का विकास मॉडल पिछले कुछ दिनों से काफी विवादों में रहा है। इसके बावजूद कम्युनिस्ट पार्टियों के घोषणापत्रों को छोड़ कर उस मॉडल से अलग चलने की बेचैनी किसी दल में नहीं देखी गई। जाहिर है कि अपने आर्थिक मॉडल के अभाव में धर्मनिरपेक्षता एक लुंजपुंज निराकार अवधारणा बनती चली गई है जिसकी नई पीढ़ी को जरूरत नहीं है और यही कारण है कि उसे गांधी और नेहरू के नाम पर भी बचाया नहीं जा सकता। अगर धर्मनिरपेक्षता को अपने को बचाना है तो आर्थिक विकास का कोई मॉडल प्रस्तुत करना होगा जो टिकाऊ हो।


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