मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
सियासत की ढलान PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Friday, 16 May 2014 10:59

मोनिका शर्मा

जनसत्ता 16 मई, 2014 : शब्द जिसके मुख से निकलते होते हैं, उस व्यक्ति विशेष के लिए हमारे मन में गरिमा और विश्वसनीयता के मापदंड तय करते हैं। इस विषय में एक मान्यता यह भी होती है कि बोलने वाले व्यक्ति ने विचार करने के बाद ही अपनी बात कही होगी। चर्चित चेहरों के विषय में बात ज्यादा लागू होती है, क्योंकि समाज में उन्हें एक आदर्श व्यक्तित्व के रूप में देखा जाता है। शायद इसीलिए कहा गया है कि प्रसिद्धि अपने साथ उत्तरदायित्व भी लाती है। इसे निभाने के लिए सबसे पहला कदम तो यही है कि विचार सामने रखने से पहले ठीक से सोचा-समझा जाए। 2014 के आम चुनाव के आखिरी चरण तक पहुंचने के साथ ही भारतीय राजनीति का गरिमाहीन चेहरा भी जन सामान्य के सामने था। इन चुनावों में भी विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच एक दूसरे के मान-मर्दन का खेल चरम पर रहा। ‘डीएनए टेस्ट’ से लेकर ‘कौमार्य परीक्षण’ जैसे गरिमाहीन शब्द का प्रयोग किया गया।

बिना सोचे-विचारे दिए गए ऐसे वक्तव्यों को लेकर जैसे ही विवाद मचता है तो यह सफाई देने का खेल शुरू कर दिया जाता है कि हमने ये नहीं कहा था, हमने वो कहा था। सवाल यह है कि हमारे माननीय नेतागण यह क्यों नहीं समझते कि शब्द जब तक अकथित हैं, विचारों के रूप में केवल हमारी अपनी थाती हैं, भले ही वे कितने ही अच्छे या फिर इसके उलट विकृत क्यों न हों! लेकिन मुखरित होने के बाद शब्द हमारे नहीं रहते। इसीलिए जो कहा जाए, वह सधा और सटीक हो, यह आवश्यक है। यों भी, शब्दों के प्रयोग को लेकर विचारशीलता बहुत मायने रखती है। अगर वे इस वैचारिक भाव को ही अपने साथ नहीं रखते तो इस देश का प्रतिनिधित्व वे क्या करेंगे! उनकी अभिव्यक्ति मर्यादित है या नहीं, यह सोचने की भी फुर्सत नहीं तो वैश्विक स्तर पर इस देश की गरिमा को कितना सहेज पाएंगे? देश के कर्णधारों को समझना चाहिए कि चाहे जिन परिस्थितियों में उन्होंने जो कह डाला, उसे बदलने या अपने कहे की जिम्मेदारी न लेने से उनके अपने ही विचार और व्यवहार की विश्वसनीयता संदेह


के घेरे में आती है।

गौरतलब है कि राजधानी दिल्ली और देश भर में भ्रष्टाचार के नाम पर आंदोलन और जागरूकता फैलाने के तमाम अभियान पिछले दो साल के दौरान खूब और प्रभावी तरीके से चलाए गए थे। लेकिन दिलचस्प यह है कि बयानबाजी के इस खेल में भ्रष्टाचार, विकास और देश के नागरिकों की सुरक्षा जैसे मुद्दे तो चुनावी पटल से ही नदारद हो गए। व्यक्तित्वों और वक्तव्यों की जितनी छीछालेदर इन चुनावों में हुई, इससे पहले कभी नहीं हुई। सत्ता के समीकरणों को मन-मुताबिक बनाने के खेल में न कोई अपने पद की गरिमा समझ रहा है, न ही जिम्मेदारी। आए दिन किसी न किसी राजनीतिक चेहरे की ओर से कोई न कोई आपत्तिजनक बयान देकर मीडिया और टीवी चैनलों पर अपने नाम सुर्खियां बटोरने का काम किया जा रहा है।

यह केवल चुनावों तक सीमित नहीं रहा। ऐसा लगता है कि देश में गरिमाहीन राजनीतिक बयानों की बयार बह रही है। सार्वजनिक जीवन में भी हमारे देश के कर्णधारों को न तो सोच-समझ कर बोलना आ रहा है न विपक्षी पार्टियों से आए बयानों का उत्तर देना। इस जुबानी जंग में मानवीय मर्यादा और स्वाभिमान दोनों ही सिद्धांतहीन राजनीति की भेंट चढ़ गए हैं। सवाल यह है कि आखिर इस देश के नेतागण इस बात को क्यों नहीं समझते कि ये गरिमाहीन वक्तव्य वैश्विक स्तर पर भी भारत और भारतीयता की साख गिराने वाले हैं!   


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta 


आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?