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निजता का अतिक्रमण PDF Print E-mail
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Friday, 16 May 2014 10:57

देवयानी भारद्वाज

जनसत्ता 16 मई, 2014 : तुर्की में औरतों ने मर्दों के खिलाफ अभियान चलाया है कि सार्वजनिक वाहनों का उपयोग करते समय वे अपने पैर समेट कर बैठें। पहली बार इस खबर को पढ़ते ही हल्की-सी हंसी आती है और फिर शुरू होता है यादों का सैलाब। पिछले कुछ सालों से तो शायद उम्र बढ़ने के साथ कुछ ऐसा आत्मविश्वास आ गया है कि बगल की सीट पर बैठा व्यक्ति अगर कोहनी अड़ाए तो मैं भी मजबूती से अपने हाथ को वहीं टिका कर बैठ जाती हूं। लेकिन बात सिर्फ कुर्सी के हत्थे पर कोहनी टिकाने भर की नहीं है।

कुछ ही दिन पहले दिल्ली की मेट्रो में यात्रा के दौरान भीड़ कुछ ज्यादा थी। सभी लोग खड़े थे और सबके शरीर आपस में रगड़ भी रहे थे। लेकिन अचानक मैंने महसूस किया कि मेरे ठीक पीछे एक व्यक्ति इस तरह सट कर खड़ा था कि उसने अंदर तक एक लिजलिजे अहसास से भर दिया। इसके बाद मैं अपनी पूरी कोहनी उसके सीने में गड़ा कर खड़ी रही। लेकिन व्यक्ति अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। आप प्रतिरोध भी करना चाहें तो कहा जाएगा कि क्या करें, भीड़ है, सभी लोग एक-दूसरे से सटे खड़े हैं, आपको ही एक व्यक्ति के सट कर खड़े होने पर एतराज क्यों...! दरअसल, यह व्यक्ति के अपने और अन्य के निजी स्पेस की इतनी परिष्कृत समझ की अपेक्षा रखता है जो हमारे समाज में खोजने पर भी बहुत मुश्किल से मिलती है।

ऐसा नहीं है कि निजता का यह अतिक्रमण सिर्फ अनजान लोग करते हों। मुझे याद आता है कि एक सहकर्मी को मेरे साथ यात्रा पर जाना था। हम लोगों को एक के बाद एक कई शहरों में जाना था और इस क्रम में कहीं बस और कहीं ट्रेन बदलते हुए हम यात्रा कर रहे थे। मैंने एकाधिक बार यह महसूस किया कि बस में साथ बैठने के दौरान कभी उनका पैर तो कभी उनका कंधा मेरे साथ टकरा जाता था। लोकल बसों में दो-चार बार मैंने इन स्थितियों को नजरअंदाज किया, खुद थोड़ा दूर हट कर बैठ गई या अपने हाथ-पैर समेट लिए। आखिर ऐसी स्थिति आई जब आसपास की सीट पर हम पूरी रात बस की यात्रा पर थे। दिन भर की थकान के कारण मेरी आंख लग जाती और फिर वही! कभी उनका घुटना और कभी कोहनी रगड़ खाते रहे। मुझे उन्हें कहना ही पड़ा- ‘महाशय, आप अपने हाथ-पैर समेट कर बैठें। मुझे इससे असुविधा हो रही है।’

मेरे लिए यह कहना पर्याप्त असुविधाजनक था, क्योंकि आप अपने परिचित के इरादे पर संदेह व्यक्त कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह था कि क्या उन्हें यह अहसास नहीं होना चाहिए कि वे अपनी सहकर्मी के निजी स्पेस की अवहेलना


कर रहे हैं? यह जो निजी और पारस्परिक जगह है, यह लोगों की आपसी बनावट पर भी निर्भर करती है। मुझे याद है कि बहुत साल पहले यात्रा के ही दौरान एक मित्र ने पूछा था कि क्या मैं तुम्हारे कंधे पर सिर टिका सकता हूं? इस पूछने में पारस्परिक स्पेस का सम्मान था। एक लंबी मित्रता और सघन संवाद के बाद यह पूछा जाना दो व्यक्तियों के बीच जिस अंतरंगता को व्यक्त करता है, उसकी परिणति अनिवार्य रूप से दैहिक संबंधों में हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन दुर्भाग्य से न इस निजता का सम्मान होता है और न उस निजी स्पेस का, जिसकी बात हम ऊपर कर आए हैं।

बस, रेल, हवाई जहाज और अन्य सार्वजनिक जगहों पर पैर फैला कर बैठने वाले मर्दों को इस बात का अहसास तक नहीं होता कि वे दूसरे के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण कर रहे हैं। कई बार तो प्रतिरोध करने पर काफी भोंडे जवाब भी सुनने को मिलते हैं। दरअसल, यह पैर फैलाना तो सांकेतिक अभिव्यक्ति है इस बात की कि वे अपने और अपनी साथी महिलाओं के स्पेस को कैसे परिभाषित करते हैं। इसकी शुरुआत भी कहीं घर से ही होती है। जब हम अपनी छोटी-छोटी लड़कियों को बैठने का सलीका सिखा रहे होते हैं, तभी हम अपने लड़कों को भी यह नहीं सिखा पाते। इस सिखाने के पीछे हमारा सोच क्या है? अक्सर लड़कियों को सलीका इसलिए सिखाया जाता है कि और लोग देखेंगे तो भद्दा लगेगा और लड़की के साथ अश्लील हरकत हो सकती है। लेकिन लड़कों को जो सीखना है, वह यह कि वे भी शालीनता का खयाल रखें, क्योंकि ऐसा नहीं करके वे अपने आसपास मौजूद महिलाओं का अपमान कर रहे हैं। इस शालीनता की बात हमें उस समाज में करनी है, जिसमें पुरुष कहीं भी सड़क किनारे पेशाब करने खड़े हो जाते हैं और उस वक्त भी शर्म उन्हें नहीं आती, बल्कि पास से गुजरने वाली औरतों को ही शर्मिंदा होना होता है!


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