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भय और प्रीति का खेल PDF Print E-mail
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Thursday, 15 May 2014 10:54

पुष्परंजन

जनसत्ता 15 मई, 2014 : जून 2003 में पोलैंड यात्रा का हमारा आखिरी पड़ाव था, ‘आउसवित्ज यातना शिविर’।

यहां पहुंचने से पहले, सुना था कि आउसवित्ज, बर्लिन स्थित जाकसेनहाउजेन यातना शिविर से भी वीभत्स है। वायस ऑफ जर्मनी (डॉयचे वेले) से पंद्रह दिनों के लिए पोलैंड गए हम जैसे कोई पच्चीस पत्रकार वारसा, क्राकोव, गेदांस्क जैसे शहरों में जितने आनंदित और अभिभूत थे, आउसवित्ज यातना कैंप को देखने के बाद खामोश हो गए। आउसवित्ज में कोई ग्यारह लाख यहूदियों को तड़पा-तड़पा कर मारा गया था। इंसान को जिंदा जलाने वाली भट्ठियां, गैस चेंबर, आउसवित्ज में ही देखीं। एक कतार में पांच सौ मर्द-औरत, एक-दूसरे से सट कर सामूहिक शौच कर सकते हैं, उसकी कल्पना हममें से किसी ने नहीं की थी। क्या किसी कौम से बदला लेने की वहशत में इंसानियत सचमुच मर जाती है?

अब यूरोप वाले कह रहे हैं कि जलियांवाला बाग में 379 लोगों की हत्या पर जब ‘मेमोरियल’ बन सकता है, तो गुजरात दंगों में मारे गए दो हजार लोगों की याद में स्मारक क्यों नहीं बन सकता? सरदार पटेल की सबसे ऊंची मूर्ति का संकल्प करने वालों को शायद यह बात अच्छी न लगे। उन्नीस सौ चौरासी में सिखों का कत्लेआम कराने वालों को भी यह बात बुरी लग सकती है। ऐसे लोगों का सोच है कि जिन्हें ‘जलते टायर की माला’ पहना कर मार दिया गया, उनकी याद में स्मारक बनाने की क्या जरूरत है? 

सबसे अधिक सिख, दिल्ली के त्रिलोकपुरी में मारे गए थे। तीस साल गुजर चुके। अभी आप त्रिलोकपुरी के गली-कूचों में घूम आइए, दंगे का एक भी निशान नहीं मिलेगा। पश्चिमी रेलवे के पीआरओ ने बताया कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के जले हुए डिब्बे, कब के हटाए जा चुके हैं। अमदाबाद की गुलबर्गा सोसाइटी के खंडहर दंगे की हौलनाक दास्तान कहते हैं। लेकिन चमनपुरा, नानवाडा, नरोदा पाटिया, नरोदाग्राम, सदरपुरा, हिम्मतनगर, सिंधी बाजार, रेवड़ी बाजार बस यह बयान करने भर को रह गए हैं कि बारह साल पहले यहां दंगा हुआ था। दंगे के निशान शायद ही इन जगहों पर दिखें। गुजरात दंगे पर बनी फिल्म ‘परजानियां’ जरूर हमारी रूह को हिला देती है कि अगर यही हमारे परिवार के साथ हो जाता, तो हम कहीं के नहीं रहते!

यूरोप वाले दंगे, नरसंहार, इंसानी अत्याचार को क्यों पर्यटन का हिस्सा बना देते हैं? क्यों आउसवित्ज देखने के लिए हमें कम से कम दस यूरो (लगभग आठ सौ रुपए) खर्च करने पड़ते हैं? क्यों न्यूयार्क में ‘9/11 म्यूजियम व मेमोरियल’ देखने के लिए आपको चौबीस डॉलर (लगभग साढ़े चौदह सौ रुपए) खर्च करने होते हैं? अजब अर्थशास्त्र है। आतंकी विध्वंस, जनसंहार के विनाशकारी नतीजे को देखना है, तो पैसे खर्च कीजिए। अमेरिका और यूरोप की सरकारों ने ‘नरसंहार मेमोरियल’ बना रखा है। बाजारवाद ने विध्वंस, इंसानियत की समाप्ति से भी पैसे उगाहने का गुर सिखा दिया है। ‘आउसवित्ज यातना शिविर’ यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल है। क्या पश्चिम वाले गुजरात में भी दंगे का ‘विश्व स्मारक’ बना हुआ देखना चाहते हैं? यूरोप वाले जख्म भरना चाहते हैं, या जख्म का टांका खोलना चाहते हैं?

लेकिन पिछले साल भर से नई सरकार के दावेदार नरेंद्र मोदी से जो संवाद यूरोप का चल रहा है, उससे यही लग रहा है कि 2002 दंगे की भयावह तस्वीर एक टाइम कैप्सूल (बीजकोष) में डाल दी गई है। जब बात बिगड़ेगी तब उस विषैले ‘बीजकोष’ को खोला जाएगा। फिलहाल के लिए तो मोदी को क्षीर पाक विधि से शुद्ध करने का काम यूरोपीय संघ ने किया है। पिछले साल मार्च में यूरोपीय संघ ने मोदी का बहिष्कार समाप्त करने की घोषणा की। उसके लिए माहौल ब्रिटेन ने बनाया। अमेरिका ने भी अपने यूरोपीय मित्रों की बात मान ली, और वहां मोदी चाय की चुस्कियां लोग लेने लगे। 

मगर इससे यह भ्रम नहीं पाल लेना चाहिए कि मानवाधिकार रक्षा का मुद््दा यूरोपीय संघ के चार्टर से गायब हो गया है। न ही 2002 दंगों के सवाल को उन्होंने हाशिये पर रख दिया है। इसकी पटकथा श्रीलंका की जमीन पर लिखी जा रही है। श्रीलंका के थिंक टैंक ने सवाल उठाया है कि जब तमिलों के संहार के लिए महिंदा राजपक्षे को कठघरे में खड़ा किया जा सकता है, तो मोदी को क्यों नहीं? इस्लामाबाद भी, कोलंबो के इस सवाल से इत्तिफाक  रख रहा है। श्रीलंका में अभी यह मामला थिंक टैंक, टीवी, अखबारों में बहस के स्तर पर है। इसे सरकार के स्तर पर नहीं उठाया गया है। ‘एशियन ह्यूमन राइट्स वाच’ और ‘वर्ल्ड ह्यूमन राइट्स वाच’ जैसी संस्थाएं क्यों इस सवाल को उठाने में योगदान दे रही हैं, जबकि उन्हें संस्था चलाने के लिए पैसा यूरोप से मिलता है। खैर, किसी का कंधा तो चाहिए ही।

यूरोप वाले इस समय भावी सरकार से भय और प्रीत का कूटनीतिक कार्ड खेल रहे हैं। पिछले तीन महीनों में यूरोप के व्यापारिक और कूटनीतिक समूहों ने सबसे अधिक भारत की यात्रा की है। 

दो मई को ही पांचवें ‘इयू-इंडिया फोरम’ की दो दिवसीय बैठक नई दिल्ली में हुई, उसमें भावी सरकार से रणनीतिक भागीदारी पर चर्चा हुई। इसके हफ्ते भर के भीतर, ब्रसेल्स स्थित इयू-इंडिया चेंबर आॅफ कॉमर्स (इआइसीसी) और यूरोपियन बिजनेस ऐंड टेक्नोलॉजी सेंटर (इबीटीसी) ने नई दिल्ली में एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें यूरोपीय कंपनियों की भारत में सक्रियता पर विस्तार से चर्चा की गई। 

इन दो बड़े आयोजनों के वक्त को लेकर सवाल तो बनता है कि आखिर यूरोप वालों को भारत में निवेश को लेकर इतनी बेचैनी क्यों है। इस मंच पर भारत के खुदरा व्यापार में विदेशी कंपनियों की भागीदारी की पुरजोर वकालत करते हुए उद्योगपति संजय डालमिया ने कहा कि विदेशी पूंजी निवेश से अगर रोजगार के अवसर बढ़े


हैं, तो खुदरा व्यापार में निवेशकों को प्राथमिकता देने में हर्ज क्या है। 

इसी मंच पर इआइसीसी के महासचिव सुनील प्रसाद ने यूरोप-भारत के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) व ब्राड बेस्ट ट्रेड एंड इंवेस्टमेंट एग्रीमेंट (बिटिया) पर हस्ताक्षर नहीं किए जाने को लेकर सवाल उठाया। सुनील प्रसाद ने कहा कि 2007 से बातचीत चल रही है, पर अब तक ‘बिटिया’ की ‘शादी’ नहीं हुई। ‘एफटीए और बिटिया’ एक ऐसा उदाहरण है, जो यूरोपीय लालफीताशाही और उसकी धीमी गति को रेखांकित करता है। 

भारत और यूरोपीय संघ, इस समय कई बातों में एक दूसरे को करीब पाते हैं। यूरोपीय संघ अट्ठाईस देशों का संगठन है, और भारत में भी अट्ठाईस राज्य हैं। भारत में चुनाव के साथ-साथ, यूरोपीय संसद का चुनाव इस माह हो रहा है। सोलह मई को भारत में चुनाव परिणाम आ जाएगा, उसके दस दिन बाद 751 सदस्यीय यूरोपीय संसद के चुनाव के नतीजे सामने होंगे। 2009 में यूरोपीय संसद के चुनाव में तैंतालीस प्रतिशत से भी कम मतदाताओं ने वोट डाले थे। अब भारतीय मतदाताओं की हिस्सेदारी को उदाहरण के तौर पर यूरोप में पेश किया जा रहा है। भारत में इस समय ‘सेंटर-राइट’ (दक्षिणपंथी मध्यमार्गी) राजनीति के सत्ता में आने की हवा बन रही है, यही हाल यूरोप का है। 

यूरोपीय संसद में सेंटर राइट वाले सत्ता में आ जाएं, इसके लिए पूरा माहौल बनाया गया है। इयू चुनाव में लक्जमबर्ग के पूर्व प्रधानमंत्री और सेंटर राइट के नेता ज्यों क्लाउडे यूंकर, ‘पैन यूरोपियन पार्टी ग्रुप’ के कारण आगे चल रहे हैं। क्या सेंटर राइट नेता यूंकर, जर्मनी के मार्टिन शुल्ज जो ईयू के मौजूदा प्रेसिडेंट अध्यक्ष हैं, की कुर्सी छीन पाएंगे? यह कौन बनेगा करोड़पति जैसा सवाल है। शुल्ज, यूरोपीय संसद में सेंटर लेफ्ट (मध्य-वाम) का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत की तरह यूरोपीय राजनीति में भी, एक पल में हवा का रुख बदलने की स्थिति बनी हुई है। 

लक्जमबर्ग स्थित सांख्यिकी जानकारी देने वाली संस्था ‘यूरोस्टाट’ के ब्योरे पर भरोसा करें तो यूरोपीय संघ, सन दो हजार से अब तक 48.7 अरब यूरो का निवेश भारत में कर चुका है। 

यूरोपीय संघ भारत में सबसे अधिक निवेश करने वाला समूह है, फिर भी मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए या बिटिया) नहीं हो पा रहा है। क्या लिस्बन करार की वजह से ऐसा हो रहा है? 1 दिसंबर 2009 से लागू लिस्बन समझौते की शर्तें इतनी कड़ी हैं कि सात वर्षों से एफटीए का समाधान नहीं हो पा रहा है। फिर भी ‘एफटीए‘ और ‘बिटिया’ के बगैर भारत-यूरोप के बीच व्यापार हो रहा है। 2012 में भारत-यूरोपीय संघ के बीच तिरसठ सौदे हुए थे, लेकिन 2013 में सिर्फ इकतालीस सौदे हो पाए। ईयू-इंडिया चेंबर आॅफ कॉमर्स (इआइसीसी) और यूरोपियन बिजनेस ऐंड टेक्नोलॉजी सेंटर (इबीटीसी) के प्रतिनिधियों ने नई दिल्ली में रिपोर्ट जारी करते वक्त इस पर चिंता व्यक्त की, और कहा कि उसके लिए खुदरा व्यापार में निवेश को रोकने, और यहां की लालफीताशाही दोषी है। 

‘एफडीआइ इंटेलीजेंस’ के सूत्र बताते हैं कि 2004 से 2013 तक यूरोप की 2566 परियोजनाएं भारत में कार्यरत रही हैं, जिनसे करीब पांच लाख बासठ हजार रोजगार के अवसर मिले हैं। इतने रोजगार देने में ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की बड़ी भूमिका रही है। 

इन तीन देशों की रोजगार सृजन में इक्यावन प्रतिशत हिस्सेदारी रही है। पर अकेले अमेरिका ने पिछले दस वर्षों की अवधि में यूरोप से कहीं अधिक, पांच लाख, पिचहत्तर हजार सात सौ ग्यारह नए रोजगार भारत में दिए, और जापान ने करीब दो लाख पच्चीस हजार काम के अवसर यहां पर दिए। क्या यूरोपीय संघ, अमेरिका और जापान जैसे देश, भारत में रोजगार देने का सवाल उठा कर नई सरकार पर खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए दबाव बनाएंगे? 

भारत में शिक्षा का एक बड़ा उद्योग बन चुका है। यूरोपीय-अमेरिकी कंपनियां भारत में निजी विश्वविद्यालयों की बाढ़ लाने को लालायित हैं। 2012 में आइआइएम (अमदाबाद) के एक शोध में पता चला कि विदेश जाकर पढ़ने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में 256 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। एसोचैम का आकलन है कि इससे तेरह अरब डॉलर का सालाना नुकसान भारत को हो रहा है, इसलिए 2020 तक भारत में साढ़े चार करोड़ छात्रों को उच्च शिक्षा देने के लिए आठ सौ विश्वविद्यालय और चाहिए। आॅटोमोबाइल, संरचना, रियल इस्टेट, खाद्य प्रस्संकरण, ऊर्जा, सैन्य साजो- सामान, तकनीक-मीडिया-टेलीकम्युनिकेशन (टीएमटी) में निवेश के लिए यूरोप नई सरकार से सुविधाएं चाहता है। पिछले तीन महीने से यूरोप वाले जिस तरह से रणनीतिक बातचीत कर रहे हैं, उससे इसकी झलक मिलती है। 

राजनीतिक नारों से पक चुकी जनता के लिए सोलह मई के बाद महत्त्वपूर्ण यह नहीं रह जाएगा कि सरकार किसने बना ली है। महत्त्वपूर्ण यह होगा कि नई सरकार के सरोकार क्या हैं। और जो निवेश करने वाले बाहरी देश हैं, अगर उनकी बातें अनसुनी होती हैं, तो यहां पूंजी लगाने वाले देशों की सरकारें कम से कम ‘दंगा स्मारक’ बनाने की पहल तो करेंगी ही!


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