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अंधेरे का किस्सा PDF Print E-mail
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Thursday, 15 May 2014 10:52

पृथ्वी

जनसत्ता 15 मई, 2014 : ‘तुम इन बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहो/ तुम इन नजारों के अंधे तमाशबीन नहीं।’ (दुष्यंत कुमार)। अंधेरा कितना भी घना हो, उसका कोई मोल नहीं होता और रोशनी कितनी भी कम हो, अनमोल रहती है। कहानी की शुरुआत कुछ यों है कि एक समाज कई दशकों से अंधेरा ढोने को अभिशप्त था और इस पंक्ति के साथ खत्म हो जाती है कि वह समाज कई और दशकों के बाद भी उसी अंधेरे को ढोने के लिए अभिशप्त रहा। इसलिए वहां रोशनी का कारोबार नहीं चला। इस कहानी के बीच में नुक्तों में, क्षेपकों और टिप्पणियों में सिर्फ अंधेरा है। बस कहानी का शीर्षक ‘उजालों की तलाश’ है।

एक गांव के बाहर वाले बास में एक चौधरी अपने परिवार के साथ बड़े-से घर में रहता है। एक खिली चांदनी रात में चौधरी का परिवार बाहर वाले कमरे, बैठक में किसी गंभीर पारिवारिक मुद्दे पर चर्चा कर रहा था कि अचानक रोशनी चुक गई। मामले को गोपनीय बनाए रखने के लिए सभी नौकरों को छुट्टी दे दी गई थी और परिवार में किसी को रोशनी करनी आती नहीं थी। बैठक में घुप्प अंधेरा, जबकि बाहर गली चांदनी से चमक रही थी। एक सदस्य ने सुझाव दिया कि क्यों न मिल कर अंधेरे को बाहर ढो दिया जाए, ताकि रोशनी अंदर भर सके। परिवार के सभी लोग बट्ठल-बाल्टी लेकर शुरू हो गए। वे अंदर से अंधेरा भर कर लाते और बाहर उलीच देते। उन्हें लगता, अंदर अंधेरा कम और बाहर घना हो रहा है। वास्तविकता कुछ और थी। दिन चढ़ने की आहट के साथ बाहर रोशनी की कोंपल फूटने लगी। तड़के एक बुजुर्ग ने इस परिवार की हरकत देखी तो पूछा कि भाई, तुम लोग क्या कर रहे हो। परिवार वालों ने कहा कि वे अंधेरा बाहर ढो रहे हैं। उसने पूछा कि अंधेरा कहां है? जवाब मिला- ‘भीतर!’ (उनका आशय कमरे में था)। बुजुर्ग मुस्करा कर आगे बढ़ गया।

यह मूल कहानी नहीं है। यह एक बात है जो मूल कहानी के पहले पन्ने पर फुटनोट के रूप में डाली गई है, ताकि समझने में आसानी रहे कि अंधेरा ढोने का मतलब क्या है और हमारे आसपास के लोग या हम रोशनी की तलाश में क्या ढो रहे हैं। दरअसल, इस कहानी के क्षेपक में दर्ज है कि अंधेरों का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता। वे तो


प्रकाश, यानी रोशनी के इलाके में अतिक्रमण भर हैं। विज्ञान के हवाले से कहानी में बताया गया है कि प्रकाश का वेग तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकेंड है और वेग के लिहाज से कोई भी उसके पासंग नहीं है। ध्वनि भी नहीं। लेकिन विज्ञान यह नहीं बताता कि अंधेरा किस गति से हमारे भीतर पैठ जाता है।

अंधेरे के पक्ष में लेखक के अपने तर्क और तीर हैं। सयाने कहते हैं कि अंधेरा मानव स्वभाव है। मिथकों के अनुसार सृजन के समय हमारी धरती आग नहीं, अंधेरे का गोला थी। सृजक को सारा मामला बड़ा विचित्र लगा तो उसने ‘लेट देयर बी लाइट’ कहा और हमारी दुनिया रोशन हो गई। एक पतली लकीर से बंटा आधा हिस्सा रोशन हो गया। अंधेरा समझ में आने लगा। तो कहानी यह बताती हुई चलती है कि अंधेरा हमारी व्यवस्था में पहले से घुला हुआ है। बस वह सुसुप्त या निष्क्रिय बैठा रहता है मौके की तलाश में। अंधेरा हमारा मूल है और रोशनी हमारा मोक्ष। लेखक ने महात्मा बुद्ध की इस सीख का हवाला दिया है- ‘अप्प दीपो भव’। खुद प्रकाश बनो, रोशनी अंदर से आती है।

आप कह सकते हैं कि अंधेरों की यों बात करना लेखक की निराशा को दिखाता है। यह निराशावाद है। अंधेरों का षड्यंत्र है। इस बारे में लेखक ने एक पंक्ति का स्पष्टीकरण लगाया है- ‘अंधेरों का दर्द या सच्चाई जाने बिना हम रोशनी की कद्र नहीं कर सकते।’ उसने सवाल उठाया है कि अगर एक कवि ‘आज की कविता, अंधेरे की व्यथा है’ कह सकता है तो एक कहानीकार अंधेरे की किस्सागोई क्यों नहीं कर सकता?   


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