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संघर्ष का शिल्पकार PDF Print E-mail
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Thursday, 15 May 2014 10:50

सीरज सक्सेना

जनसत्ता 15 मई, 2014 : भोपाल स्थित भारत भवन (बहु कला केंद्र) में एकल प्रदर्शनी होना हर कलाकार के लिए सम्मान और गर्व की बात तो है ही, यह अवसर एक पुरस्कार से कम नहीं। ‘प्रत्यय’, यही शीर्षक है शैलेंद्र कुमार के शिल्पों की प्रदर्शनी का, जो भारत भवन की आधुनिक कला दीर्घा में इन दिनों देखी जा सकती है। अपनी प्रदर्शनी के शुरू होने के दिन शैलेंद्र शाम को बहुत खुश दिखे थे। इस प्रदर्शनी में उनके सिरेमिक और धातु में बने शिल्पों को दिखाया गया है। दीर्घा की दीवारों पर कैनवास पर स्याही से बने रेखांकन भी प्रदर्शित हैं। रेखांकनों को देख कर एक शिल्पकार की त्रिज्यामितीय छुअन के प्रयास को देखा और महसूस किया जा सकता है। यह वही दीर्घा है, जहां देश-विदेश के दिग्गज कलाकारों ने अपने-अपने कामों से इसका मान बढ़ाया है। फिलहाल यह प्रदर्शनी लगभग एक माह के लिए खुली है, जहां कला प्रेमी जा सकते हैं।

लेकिन अभी मेरे यह सब लिखने का संदर्भ शैलेंद्र हैं, जिन्होंने प्रदर्शनी के एक हफ्ते के भीतर ही इस मायावी कैनवास पर बसे यथार्थ जीवन से विश्राम ले लिया। वे अभी सिर्फ बयालीस वर्ष के थे। शैलेंद्र से मेरी दोस्ती उनके खैरागढ़ से भोपाल आने के बाद हुई थी। मूल रूप से बिहार के इस मूर्तिकार ने इंदिरा कला और संगीत महाविद्यालय, खैरागढ़ से अपनी कला शिक्षा ग्रहण की थी। फिर भारत भवन के सिरेमिक स्टूडियो में अपनी कला की यात्रा शुरू की। हर कलाकार की तरह शैलेंद्र की भी कला यात्रा संघर्ष से भरी थी। लेकिन इस शिल्पकार के चेहरे पर मुझे कभी कोई शिकन नहीं दिखी। भिन्न-भिन्न माध्यमों में वे लगातार अपने शिल्प गढ़ते रहे। इस हिम्मती कलाकार को हिम्मती साथी भी मिला।

खैरागढ़ में जो आदिवासी कला को निकट से देखने-समझने और खुद के काम में बरतने का अनुभव रहा, वह भोपाल के नवनिर्मित जनजातीय कला संग्रहालय में काम करते हुए शैलेंद्र के उत्साह को मेरे अलावा कई कलाकारों ने अनुभव किया है। इस संग्रहालय में पिछले कुछ बरसों से शैलेंद्र बतौर कलाकार काम कर रहे थे। आदिवासी कलाकारों के साथ मिल कर उन्होंने कुछ बड़े और रोचक शिल्पों की रचना प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। दिन-रात वे अपना काम लगन, उत्साह और ईमानदारी से करते रहे। उनकी पत्नी अर्चना ने मुझे बताया कि संग्रहालय एक तरह से उनके लिए दूसरा घर था। हमेशा वे अपने काम में ही लीन रहा करते थे। कुछ बड़े शिल्प भी तैयार करने की उनकी योजना थी। उनमें एक बड़े कलाकार के सभी गुण थे और धीरे-धीरे अपने काम से उन्होंने अपनी


एक पहचान बनानी शुरू की ही थी।

खास बात यह थी कि उनके शिल्प एक होते हुए भी युगल या एकाधिक आकारों का भ्रम रचते थे। उनके शिल्प कभी किसी पशु की आकृति का भान कराते हैं तो कभी ज्यामिति का खेल रचते दिखते हैं। चीनी मिट्टी में शैलेंद्र ने छह फुट ऊंचे शिल्प भी गढ़े हैं। इस माध्यम में इतनी ऊंचाई के शिल्प की रचना करना आसान काम नहीं है। लेकिन शैलेंद्र उन कलाकारों में से थे जो जोखिम लेने से नहीं डरते थे। कला के साथ-साथ जीवन के संघर्ष को वे हंसते हुए जीते रहे। इसी साल जनवरी में उन्हें अपने फेफड़ों में कैंसर का पता चला और कुछ ही महीनों में वे एकदम अशक्त हो गए। फेसबुक पर अपनी प्रदर्शनी में उन्हें वीलचेयर पर देख कर बहुत आश्चर्य हुआ था। मुझे उनकी बीमारी की खबर मेरे चित्रकार मित्र राजेश पाटील से मिली जब वे कुछ दिनों पहले मुझसे मिलने आए थे। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि अब उनसे मुलाकात न हो सकेगी और इतनी जल्दी यह दुखद घड़ी मेरे सामने आ खड़ी होगी।

पिछले कुछ बरसों से देश में शिल्प विधा में काम करने वाले युवा कलाकारों की संख्या में तेजी से बहुत कमी आई है। ऐसी स्थिति में एक शिल्पकार का इस तरह आकस्मिक चले जाना बहुत दुखद है। सिरेमिक में काम करने वाले कलाकारों की संख्या तो और भी कम है। शैलेंद्र जैसे कलाकारों ने इस माध्यम को अपनी रचनाशीलता से एक नया आयाम और संभावना देने की कोशिश की है। इसका साकार और मूर्त रूप हम उनके शिल्पों को देख कर महसूस कर सकते हैं। दरअसल, शैलेंद्र ने एक मूर्तिकार के रूप में इस माध्यम को अपनाया था, न कि एक पोटर की तरह। भारत भवन का आभार कि उसने उससे जुडे एक कलाकार को कलामयी विदाई दी।


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