मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
इस चुनाव के सबक PDF Print E-mail
User Rating: / 6
PoorBest 
Wednesday, 14 May 2014 11:51

लाल्टू

जनसत्ता 14 मई, 2014 : लोकसभा के चुनाव हो गए। देशी और विदेशी स्रोतों से मिले बेइंतहा सरमाया की मदद से,

मीडिया के बड़े हिस्से को खरीद कर, तमाम किस्म के ऊलजलूल झूठ बोल कर, कहीं विकास का झांसा, कहीं मुसलमानों को भरोसा तो कहीं डर दिखा कर, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा और उसके सहयोगी दलों के गठबंधन (राजग) ने सबसे अधिक सीटें जीत लेने का शोर मचाया हुआ है। काफी शोर मचा है कि लड़ाई विकास बनाम भ्रष्टाचार की है। जल्दी ही स्पष्ट हो जाएगा कि न तो भ्रष्टाचार कम होने वाला है और न ही सही मायने में कोई विकास होने वाला है। जो विकास के दावेदार हैं उन्होंने दस हजार करोड़ जिनके फुंकवाए हैं, वे कौन-सा दूध के धुले हैं, या यों कहें कि वे दूध ही से नहाते हैं; उन्हें तो मय सूद अपनी पूंजी वापस चाहिए। उन्हें अपने धंधों में अधिक से अधिक मुनाफा चाहिए, इसलिए शेयर बाजार भी चुनावपरिणामों की ओर ताक लगाए बैठा है। विकास के हल्ले के साथ सांप्रदायिक और पोंगापंथी ताकतें एक कदम आगे बढ़ आई हैं। 

क्या आम लोग सचमुच इतने भोले हैं कि वे एक भेड़चाल में आकर इस तरह अपना ही सत्यानाश कर बैठें। क्या सूचना क्रांति के तमाम पहलुओं के बावजूद देश की स्त्रियों को पता नहीं कि उनके प्रति संघ परिवार का नजरिया क्या है? गौरतलब है कि अपूर्व सरमाया लगाने के बावजूद संघ परिवार को आज तक दक्षिणी प्रांतों में कोई खास सफलता नहीं मिली है। शिक्षा, गरीबी-उन्मूलन और मानव विकास के तमाम आंकड़ों में हिंदी क्षेत्र दक्षिणी प्रांतों से बहुत पीछे है। मीडिया में शोर-शराबे का जो प्रभाव हिंदी प्रदेशों में दिखता है, उतना दक्षिण में नहीं दिखता। मीडिया पढ़े-लिखे लोगों तक को मानसिक गुलाम बना देता है। मीडिया और सूचना उद्योग से जुड़ी कंपनियां अरबों रुपए संज्ञान के नियंत्रण पर शोध के लिए खर्च करती हैं। प्रबंधन में प्रशिक्षण का बड़ा हिस्सा इसी दिशा का है। कम पढ़े-लिखे लोगों की क्या बिसात कि ऐसे तूफान के सामने वे टिकें। 

इसमें अचंभित होने की कोई बात नहीं कि उत्तर भारत के बड़े हिस्से में संघ परिवार का प्रभाव बढ़ा है। गुजरात और महाराष्ट्र में उनकी जड़ें पहले से ही गहरी हैं और कहीं हिंसा तो कहीं राजनीतिक दांवपेच से विरोध की जमीन को उखाड़ने में वे सफल रहे हैं। पर बात सिर्फ इतनी नहीं है। विकास के झांसे और सांप्रदायिकता के हो-हल्ले का प्रभाव गरीब अनपढ़ जनता पर ही नहीं; कहने को महान संस्कृति वाले हमारे देश के संपन्न और मध्य-वर्गों के कई लोग वास्तव में क्रूर और संवेदनाहीन होकर बहुसंख्यक लोगों के खिलाफ षड्यंत्र में शामिल हैं। उन्होंने तय कर लिया कि अब इन गरीब-गुरबा को खत्म करो; इनसे पानी, हवा, मिट््टी सब छीन लो।

शोर मचा कि वाम दल तो ऐसे दलों के साथ हाथ मिला रहे हैं जिनमें भ्रष्ट नेता भरे हुए हैं। बूर्जुआ लोकतंत्र और संसदीय चुनावी खेल की मजबूरी में गठबंधन की राजनीति करने पर भी वाम को लताड़ मिलती है कि वाम तो अब खत्म हो गया। जैसे कि भारतीय वाम के नेतृत्व में पिछले सौ वर्षों का जमीनी आंदोलन का इतिहास, जनांदोलनों का इतिहास, सब कुछ कपोल-कल्पना थे। सच यह है कि आज भी सड़क से संसद तक और जमीन, जंगल की नैतिक लड़ाई में वाम के रूप में ही एकमात्र उम्मीद बची रह गई है।

ऐसे में लोकतांत्रिक ताकतों के लिए सबक क्या हैं? कइयों का पहला सवाल यह होगा कि कौन-से लोकतांत्रिक? मैं अपने जैसे उन लोगों की तरफ से लिख रहा हूं, जिन्हें अपनी सारी कमजोरियों के बावजूद बेहतर भविष्य के सपने देखने की बीमारी है। लोकतांत्रिक परंपरा का एक सीधा नतीजा वैचारिक विविधता है। हमें आपसी मतों की विविधता का सम्मान करना सीखना होगा। दूसरों को चोट पहुंचाए बिना, अपनी बात कह पाने के तरीके ईजाद करने होंगे। 

अपनी ऊर्जा एक-दूसरे के साथ बहस और विरोध में नहीं, उनके खिलाफ लड़ने में लगानी होगी जो लोकतंत्र का नाश चाहते हैं। हमें अपने छोटे-छोटे समझौतों को नजरअंदाज करते हुए एक साझी लड़ाई का मंच तैयार करना होगा। हमारी पहली प्रतिबद्धता उन सब जुझारू साथियों के प्रति है जो जनांदोलनों से लेकर पूंजीवाद के सामने घुटने टेक चुके राज्य के खिलाफ तरह-तरह के जनयुद्ध में जुटे हैं।

बड़े सामाजिक-राजनीतिक संघर्षों में कौन-सा सूक्ष्म विचार सफल होता है और कौन विफल, यह पहले से तय नहीं होता। एक मंच पर आने की कोशिशें होती रही हैं; ऐसी बड़ी कोशिशें हाल में लेखक संगठनों की साझा सभाओं और मंचों से आए बयानों में दिखती हैं।

यह विडंबना है कि मुक्तिकामी परंपरा के विचार, जो सारी मानवता से जुड़े हैं, उसकी समझ पुख्ता करने के लिए हम ऐसी भाषा में विमर्श करते हैं जो वंचितों की भाषा नहीं है, और अधिकतर ऐसे मुहावरों में तर्क रखते हैं जो हमारी जमीन से नहीं आए। 

दूसरी तरफ संकीर्ण और सांप्रदायिक राष्ट्रवाद का विचार, जो यूरोप की विशेष परिस्थितियों में जनमा और जिसे यूरोप के लोग काफी हद तक खारिज कर चुके हैं, उसका प्रचार-प्रसार करने के लिए संघ परिवार पूरी तरह देशी भाषाओं और देशी मुहावरों का इस्तेमाल करता है। यानी फासीवाद के उभार और लोकतंत्र की विफलता का एक भाषाई पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

हमें अपने बड़े सपने को साकार करने के लिए मौजूदा सभी जनपक्षधर विचारों का इस्तेमाल करना होगा। मार्क्स स्वयं अपने जीवनकाल में वैचारिक सीमाओं से निकल कर लगातार नए सवाल-जवाब से जूझते रहे। बीसवीं सदी के प्रबुद्ध चिंतक और नेता आंबेडकर और शांतिपूर्ण विरोध की रणनीति के पुरोधा गांधी, जिनको बदकिस्मती से तकरीबन एक उद्योग का नाम बना दिया गया है, और मानवेंद्र नाथ रॉय


और लोहिया जैसे चिंतकों से हमें लगातार प्रेरणा लेनी होगी। हमें यह देखना होगा कि सांप्रदायिकता के खिलाफ नोआखाली और कोलकाता में गांधी कैसे निडर होकर लड़े। अंतत: सांप्रदायिकता से लड़ते हुए उनकी जान गई। उनकी आधुनिकता की आलोचना मुख्यत: पूंजीवाद की आलोचना है।

मतलब यह नहीं कि हम इन सभी विचारकों के अंधभक्त बन जाएं, पर हम ऐसे हर प्रतिबद्ध विचारक से सीखें, जिसने भी जनता की मुक्ति के संघर्ष की सफलता के लिए काम किया है। एक ऐसा बड़ा मंच हो, जिसमें गांधीवादियों और लोहियावादियों से लेकर कम्युनिस्ट तक इकट्ठा हो सकें। अस्सी के दशक के आखिरी सालों में ऐसा ही एक मंच बनाने निकले नागभूषण पटनायक हर जगह जाकर कहते थे कि हम इस बात को मान लें कि हममें से हर कोई देशभक्त है। जाहिर है, देशभक्ति से उनका मतलब संघी किस्म की संकीर्णता से कतई नहीं था।

दूसरे मुल्कों से मिसाल ढूंढें तो वेनेजुएला के ऊगो चावेज कोई बड़े विचारक नहीं थे, पर लोगों को अपने साथ लेने में न केवल वे अपने देश में कामयाब हुए, बल्कि समूचे लातिन अमेरिका और दुनिया के और दीगर देशों में भी मुक्तिकामी जनता के लिए प्रेरणा के स्रोत बने। यही बात क्यूबा के बारे में भी कुछ हद तक कही जा सकती है- कास्त्रो का नाम कम्युनिस्ट इतिहास में विचारक नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक और रणनीतिज्ञ की तरह ही जाना जाता है। चे गेवारा को लोग उनकी रोमांटिक क्रांतिकारी की छवि के लिए ही जानते हैं। 

इन सबके विपरीत जहां भी वैचारिक शुद्धता पर जोर ज्यादा रहा है, वहां लोगों के साथ नेतृत्व का संबंध टूटा है और वहां साम्राज्यवादी ताकतों को घुसपैठ करने का मौका मिला है। ग्रेनाडा और अफगानिस्तान इसके अच्छे उदाहरण हैं। इसके बरक्स वेनेजुएला में सैद्धांतिक विचारकों ने अपनी सीमाओं को और चावेज की लोकप्रियता को पहचानते हुए उन्हें सत्ता की बागडोर संभालने दी। उनकी मौत के बाद वैसे ही करिश्मे के किसी नेता के न होने से वहां जनवादी ताकतों में विभाजन हो रहा है और इसका फायदा अमेरिकी साम्राज्यवाद को मिल रहा है।

प्रगतिशील आंदोलन ने आंबेडकर को क्रांतिकारी नेता मान कर अपनी गलती सुधार ली है। सवाल मुहावरे, लहजे और आत्मीयता का भी है। क्या वाम नेतृत्व समय के साथ बदलते सही मुहावरे ढूंढ़ने में विफल हुआ है? जो लोग मीडिया के झांसे में आ गए हैं वे ऐसा ही कहेंगे। सच यह है कि देश में चल रहे तकरीबन सभी जनांदोलन किसी न किसी तरह के वाम प्रभाव में हैं। समस्या यह है कि वाम के पास चुनावी तंत्र में बेहद सरमाया का इस्तेमाल और मीडिया के पक्षपात से टक्कर लेने की क्षमता नहीं है। दूसरा खेल गठबंधनों का है। ऐसे दलों के साथ गठबंधन करते हुए जिनकी छवि बिगड़ चुकी है, जवाबदेह तो होना पड़ेगा। जहां जितना मौका मिलता है, बुनियादी मुद्दों पर वापस जाना होगा और भावनात्मक पक्षों का ध्यान रखते हुए सांगठनिक प्रक्रियाओं को मजबूत कर जनचेतना के लिए संघर्ष करना होगा। 

अक्सर साथ-साथ काम करते हुए विभिन्न संगठन इस वजह से अलग हो जाते हैं कि उन्हें एक दूसरे पर शक रहता है कि वे अपना प्रभाव बढ़ा कर दूसरे को हाशिए पर धकेलना चाहते हैं। इस प्रवृत्ति का एक ही हल है कि हम इससे होते नुकसान को समझें। आखिर में लोग अपने आप सही रास्ता ढूंढेंगे। शक-शुबहे में फंस कर आंदोलन को बिखरने न दें। अपने बड़े उद्देश्य को सामने रखें। छोटे-छोटे गुटों में प्रभाव बढ़ा कर सामयिक संतोष तो मिल सकता है, पर लंबी अवधि में यह खुद को भी और जनता को भी नुकसान पहुंचाता है। इसलिए बदलती परिस्थिति में पहली शर्त यह होनी चाहिए कि किसी भी तरह से साझी लड़ाई को बिखरने न देंगे। अच्छे प्रार्थियों के साथ गठबंधन हर चुनाव क्षेत्र में हो सकता है, पर जब राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन करना हो तो साफ तौर पर यह बताना जरूरी है कि यह केवल एक रणनीति है और गठबंधन में शामिल दलों की हर नीति को हमारा समर्थन नहीं है।

अब यह साफ हो गया है कि जनपक्षधर बहुत सारी ऊर्जा आपस की लड़ाई में ही खर्च हो जाती है और संघ परिवार को इसका पूरा फायदा मिला। यह उसी तरह है जैसे 1930 के दशक में जर्मनी में केपीडी और एसपीडी जैसी पार्टियां इसी बहस में उलझी हुई थीं कि जर्मन समाज का सही वर्गीय चरित्र क्या है और हिटलर ने सत्ता हथिया ली। जनपक्षीय ताकतों में अब भी अगर बिखराव नहीं रुका और हम आपसी बहस में ही सारी ऊर्जा खत्म करते रहे तो यह आम लोगों के साथ विश्वासघात होगा। सामाजिक बदलाव के लिए जो कुर्बानियां आंदोलनों के साथ जुड़े कार्यकर्ताओं ने दी हैं, वे व्यर्थ न जाएं यह देखना है। सारी दुनिया में पूंजीवाद का संकट गहरा रहा है। देखना है कि हम हाल के इतिहास से सही सबक ले पाते हैं या नहीं।


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta  



आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?