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भ्रम के विज्ञापन PDF Print E-mail
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Wednesday, 14 May 2014 11:46

रोहित कुमार चौधरी

जनसत्ता 14 मई, 2014 : विज्ञापन का एक छोटा-सा अंश है- ‘छतरी मैन... छतरी-छतरी-छतरी मैन...!’ इसमें एक व्यक्ति अपने कपड़ों को कीचड़ से बचाने के लिए छतरी लेकर घूमता है। लेकिन उसके कपड़े फिर भी गंदे हो जाते हैं। इसे देख कर छोटे-छोटे बच्चे उसकी खिल्ली उड़ाते हैं। तभी दिखाया जाता है कि ‘टाइड’ वाशिंग पाउडर के इस्तेमाल से आपके कपड़े सफेद हो जाएंगे। लेकिन जिस तरह और जिस पैमाने की सफेदी दिखाई जाती है, वह क्या लोगों को भ्रमित करने का एक तरीका नहीं है? 

दरअसल, भारत में आज विज्ञापनों का ढंग बदलता जा रहा है और कई विज्ञापनों में सारी हदें पार की जा रही हैं। विज्ञापन का उद्देश्य जनता को अपने उत्पाद के प्रति आकर्षित करना होता है। लेकिन आकर्षित करने के लिए भारतीय विज्ञापन मानक परिषद् के नियमों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया जा रहा है। विज्ञापनों में नस्लभेद, रंगभेद, भ्रम, महिलाओं के प्रतिकूल स्थितियों आदि से संबंधित मामलों को बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसे विज्ञापन भी धड़ल्ले से दिखाए जाते हैं, जिनका बच्चों पर गलत असर पड़ता है। कंडोम, डिआॅडेरेंट, इत्र आदि के विज्ञापनों में महिलाओं को गलत तरीके से दिखाया जाता है। डिऑडेरेंट, अमूल माचो, रूपा फ्रंटलाइन जैसे विज्ञापनों में महिलाओं को गलत तरीके से दिखाने का कोई मतलब नजर नहीं आता। अश्लील फिल्मों की अभिनेत्री रही सनी लियोनी का विज्ञापनों में इस्तेमाल देख कर लगता है कि बाजार में महिलाओं को एक वस्तु की तरह रख दिया गया है! 

भारत में रंगभेद से जुड़े विज्ञापनों को भी खूब बढ़ावा मिल रहा है। मसलन, फेयर ऐंड लवली, डाबर के फेम फेयरनेस नेचुरल ब्लीच का विज्ञापन। फेयर ऐंड लवली के विज्ञापन में गोरा होने का दावा किया जाता है। यह विज्ञापन नस्लभेद और रंगभेद को बढ़ावा देता है। टाइड वाशिंग पाउडर, मेंटोस, रूपा फ्रंटलाइन, ‘अमूल माचो- बड़े आराम से’ जैसे विज्ञापनों में ऐसी बातें दिखाई जाती हैं जो वास्तव में झूठ होती हैं। इस तरह के विज्ञापन ग्राहक के मन में भ्रम पैदा करते हैं। सवाल है कि क्या ये तरीके ग्राहक को आकर्षित करने के लिए सही हैं? ग्राहक को सही और स्पष्ट जानकारी मुहैया कराना उत्पाद तैयार करने वाली


कंपनी का उद्देश्य होता है। लेकिन विज्ञापनों में इसका खयाल नहीं रखा जाता। डिऑडेरेंट या परफ्यूम के विज्ञापनों में दिखाया जाता है कि जब कोई लड़का इसे लगाता है तो लड़कियां उसकी तरफ खिंची चली आती हैं।

आज भारतीय विज्ञापनों की पहचान विश्व में बन रही है। लेकिन भारतीय विज्ञापन मानक परिषद् में अनेक शिकायतें दर्ज होती हैं। शिकायतों के बावजूद समाधान शायद ही किया जाता हो। पेप्सी के नए विज्ञापन- ‘ओह यस अभी’ में दिखाया गया है कि युवा कितनी जल्दबाजी में रहते हैं। इसके विज्ञापन में एक पंक्ति यह है- ‘सब कहते हैं कि सब्र का फल मीठा होता है, लेकिन हम तो पैदाइशी बेसब्र हैं!’ इस गाने में युवाओं को आकर्षित किया गया है। लेकिन युवाओं की हड़बड़ी को भी दिखाने की कोशिश की गई है। 

कुछ विज्ञापनों में न अंग्रेजी का इस्तेमाल ठीक तरह से हो रहा है और न हिंदी का। ‘आइडिया’ के विज्ञापन में कहा जाता है- ‘नो उल्लू बनाविंग।’ इस विज्ञापन में अंग्रेजी और हिंदी का समन्वय बैठाया गया है। आजकल इन विज्ञापनों को धड़ल्ले से दिखाया जा रहा है। विज्ञापनों को ‘ढालिया’ (विज्ञापन एजेंसियों) की सहायता से ‘ढालने’ का काम किया जा रहा है जिसमें न कोई स्पष्ट जानकारी, न कोई संदेश है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि विज्ञापन के इस बाजार को भी अपने मौजूदा चाल-चलन की वजह से एक दिन विश्वसनीयता और फिर अस्तित्व के संकट का सामना करना पड़ सकता है।   


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