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वक्त का पासा PDF Print E-mail
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Wednesday, 14 May 2014 11:44

संदीप जोशी

जनसत्ता 14 मई, 2014 : क्या सामाजिकता समय से परे चल सकती है? राजनीति कैसे समय को नजरअंदाज कर सकती है! राजनीतिक महोत्सव का महादंगल पराकाष्ठा से परिणाम पर पहुंच रहा है। क्या लोकतांत्रिक चुनावों के परिणाम संवैधानिक तानाशाही ला सकते हैं? सबसे विशाल लोकतंत्र को ताकतवर निर्णायक प्रधानमंत्री और भ्रष्टाचार मुक्त, नीतियुक्त राजनीतिक दल की दरकार है। आखिर देश का प्रधानमंत्री कैसा हो?  पिछले दिनों कानपुर और इलाहाबाद में पान की दुकानों पर चली राजनीतिक बहसों में पड़ने का मौका मिला। यहां किसको जिता रहे हो, पूछने पर जवाब मिला ‘मोदी को’। कानपुर और इलाहाबाद से नरेंद्र मोदी बेशक प्रत्याशी न रहे हों, लेकिन वहां जनता की आस केवल मोदी पर टिकी नजर आई। यानी जनता चाहे-अनचाहे वयोवृद्ध मुरली मनोहर जोशी और श्यामाचरण गुप्त को भी मोदी के नाम पर जिता सकती है। अगर मान लें तो जनता ही लोकतंत्र में राजनीतिक ध्रुवीकरण करती है। आज भाजपा मोदी की पिछलग्गू दिख रही है और मोदी ही भाजपा लग रहे हैं। 

यह तो सभी समझ गए हैं। देश के राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के भ्रष्टाचार से जनता प्रताड़ित रही है। इसलिए दलों की राजनीति से अलग जनता एक मजबूत, निर्णय क्षमता वाला प्रधानमंत्री चुनना चाहती है। मनमोहन सिंह की पिछले पांच सालों की नाकामी को इसका मुख्य कारण मानना चाहिए। उनके निर्णयविहीन प्रधानमंत्रित्व काल का ही असर है कि लोकतंत्र में भी जनता एक स्वेच्छाचारी तानाशाह को मौका दे सकती है। क्योंकि मनमोहन सिंह न मन की कर पाए, न जनता को मोह में ही रख पाए। 

नरेंद्र मोदी से पहले भाजपा का भी कांग्रेसीकरण हो चुका था। कांग्रेस के साथ भाजपा भी नेतृत्वविहीन और भ्रष्टाचार में लिप्त दिख रही थी। इसलिए कांग्रेस और कुछ हद तक भाजपा को भी नरेंद्र मोदी ने ही ललकारा। जनता को भी मोदी के चुनौतीपूर्ण फैसले से चुनावी आशा जगी। जनता समय के मुताबिक निर्णय करना अच्छी तरह जानती है। भारतीय मीडिया ने इस आम चुनाव को अमेरिकी चुनावों की तरह मोड़ने की कोशिश की। जनता ने उसी तर्ज पर अपना नेता चुना और सारे व्यावहारिक मानदंडों को अलग सरका दिया। कांग्रेस और भाजपा तक के पुराने घाघ नेताओं को कोने में ढकेल दिया गया है। यही नई राजनीति का असर भी रहा है। देश की जनता अपना राजनीतिक विकल्प निकालने में सक्षम है। 

अण्णा हजारे का आंदोलन और अरविंद केजरीवाल की ‘आप’ के उदय का असर भारतीय राजनीति में साफ देखा जा सकता है। बदलाव की बयार तो जरूर बह रही है। अब बेशक भाजपा और संघ वाले इसको मोदी लहर मान कर इस पर सवार हो सकते हैं। कांग्रेस के प्रति विरोध और कमजोर प्रधानमंत्री ने ही इस मोदी


लहर को फूंक मार कर उठाया है। कांग्रेस की नेतृत्वविहीनता अब उनके द्वारा प्रचारित पंथनिरपेक्षता को भी पचा नहीं पा रही है। जनता ने ठान लिया है कि अगर हिंदू-मुसलिम ध्रुवीकरण होता है तो होता रहे। देश को साफ-सुथरी नीतियों से चलाने वाला राजनीतिक दल और एक निर्णायक प्रधानमंत्री चाहिए। जिस आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था से देश जूझ रहा है उसका समझौता अब नहीं हो सकेगा। फिर चाहे जिस किसी के वादे उम्मीद जगाएं। 

जनता ने इतिहास के भटकाव को भी दूर रखा है। इतिहास के भूलने को भी बदलाव माना जा सकता है। बदलाव अच्छे दिनों के लिए भी होता है और बुरे दिन भी बदलाव लाते हैं। जनता चाहे तो 2002 गुजरात को भी भुला कर सार्वभौम आर्थिक सामाजिक विकास को मौका दे सकती है। सन 1990 में आडवाणी की हिंदुत्ववादी रथयात्रा भी भाजपा को बहुमत नहीं दिला पाई थी। बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद भी भाजपा हिंदू जनता को भरमा नहीं पाई। सन 1989 से 1999 के दस सालों में देश ने पांच आम चुनाव देखे और जनता स्थायी सरकार और सार्वभौम विकास को तरसती रही। लेकिन मतों का ध्रुवीकरण कर कांग्रेस और भाजपा दोनों सत्ता के लिए जीभ लपलपाती रहीं।  

लोकतांत्रिक व्यवस्था के बावजूद समाज ही समय को देखते हुए एक स्वेच्छाचारी शासक चुन सकता है। लोकतंत्र में भी बदलाव के तौर पर तानाशाही चलाई जा सकती है। इसलिए जनता नरेंद्र मोदी के बदले या बनावटी सत्ता व्यवहार पर सवार भाजपा को सरकार बनाने का मौका दे सकती है। लेकिन जनता अपने किए पर पछताना भी जानती है। हिंदुत्ववादी और भाजपाइयों को समझना होगा कि वे मोदी के विकास रथ पर सवार हैं। मोदी के आकलन का समय अब है। राजनीति को देश की जनता ही चलाती है। बेशक जनता ने पंडिताई न पढ़ी हो, लेकिन अपने पंडे को पक्का पहचानती है। और पंडिताई अपूर्ण रहने पर उसको पानी पिलाना भी जानती है। क्योंकि जनता ही जनार्दन है। 


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