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चुनाव के समाचार न पढ़े न देखे PDF Print E-mail
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Tuesday, 13 May 2014 11:26

राजकिशोर

जनसत्ता 13 मई, 2014 : कहते हैं, किसी भी लोकतंत्र में चुनाव के दिन सबसे ज्यादा अहम होते हैं। इन्हीं दिनों सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण राजनीतिक फैसला लिया जाता है।

सभी दल, सभी नेता मतदाता के सामने परीक्षार्थी के तौर पर खड़े होते हैं। मतदाता को जांच करनी पड़ती है कि पिछले पांच वर्ष कैसे बीते और अगले पांच वर्षों के लिए गद््दी पर बैठने की योग्यता किसमें है। किसी में भी न हो, तब भी उम्मीदवारों में से किसी न किसी को चुनना ही पड़ता है। जीवन के अन्य क्षेत्रों में तो शून्य चल सकता है- बल्कि अधिकतर जिंदगियों में शून्य के अलावा और होता क्या है, पर शासन में शून्य नहीं चल सकता। राज्यविहीन समाज सबसे बेहतर है- यह मान्यता गांधी की भी थी और मार्क्स की भी, इस मामले में दोनों अराजकतावादी थे, पर जब तक मानवता का यह उच्चतम स्तर हासिल नहीं कर लिया जाता, तब तक राज्य की जरूरत है और उसे चलाने वालों की भी। मतदाता नाम का अतिरिक्त प्राणी भी तब तक बना रहेगा, और उसे मतदान भी करना होगा।

चुनाव की बहुत सारी परिभाषाएं हैं। मेरे खयाल से, इसकी सर्वश्रेष्ठ परिभाषा यह है कि यह वह मौका है जब जनता अपना खसम चुनती है। विवाह में हनीमून विवाह के बाद होता है, लोकतंत्र की इस रस्म में हनीमून विवाह के पहले ही हो जाता है। नेता लोग राज्यों की राजधानियों से चुनाव क्षेत्रों में जाते हैं और मतदाताओं से लाड़-प्यार दिखाने के लिए स्थानीय उम्मीदवार भी उठ खड़ा होता है। जब किसी गरीब लड़की के साथ शहर के सबसे बड़े सेठ का बेटा हनीमून मनाता है, तो लड़की धन्य हो जाती है। 

इसी तरह मतदाता भी एक दिन का राजा बन कर फूला नहीं समाता। उसके फूलेहुएपन को और चढ़ाने के लिए उसे तरह-तरह के उपहार दिए जाते हैं और भविष्य के हसीन सपने दिखाए जाते हैं। जब मतदाता अपनी बार्इं तर्जनी पर एक छोटा-सा दाग लगवा कर मतदाता केंद्र से लौटता है, और आराम से सोकर अगले दिन सुबह उठता है, तो पाता है कि भोर भइल तो बिसर गर्इं बतियां। लेकिन उसकी जेब में प्रतिनिधि वापसी का अधिकार न होने से वह पांच वर्षों के लिए अपने हाथ कटा चुका होता है। 

इसीलिए पिछले दो-तीन चुनावों से चुनाव समाचारों में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है। लोकसभा का प्रत्येक चुनाव एक आभासी गर्भधारण होता है जिसकी पोल नई सरकार द्वारा शपथ ग्रहण करने के बाद खुल जाती है। चुनाव में मैंने आखिरी दिलचस्पी तब ली थी जब विश्वनाथ प्रताप सिंह उच्च स्थानों पर भ्रष्टाचार के खिलाफ राज पताका लिए हुए देश भर में घूम रहे थे। एनटी रामराव उनके उपनायक थे, जिनके बारे में प्रसिद्ध था कि अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए वे बकरों की जान लेकर उनके खून में नहाते थे।  

प्रधानमंत्री बनने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह ने ऐसा कोई कानून नहीं बनाया न कोई तंत्र स्थापित किया जिससे उच्च स्थानों पर भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके। क्या इसलिए कि वे और उनके साथी मंत्री खुद उच्च स्थानों पर थे? क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि वे भ्रष्टाचार को खत्म करने का वादा करते हुए आए और आरक्षण का झंडा बुलंद करते हुए चले गए। आरक्षण से सिर्फ एक वर्ग का लाभ हुआ- यह लाभ जायज है, पर भ्रष्टाचार खत्म होने से सभी वर्गों का फायदा होगा। वह आखिरी चुनाव था, जिसमें कुछ रुचि पैदा हुई थी। फिर उसके बाद चिरागों में रोशनी न रही।

प्राय: सभी ने लिखा है कि लोकसभा का इस बार का चुनाव निर्णायक है- इससे तय हो जाएगा कि देश में लोकतंत्र रहेगा या तानाशाही आएगी। हम एक बार तानाशाही का झटका झेल चुके हैं। जिसे वास्तव में तानाशाही कहते हैं, इमरजेंसी उसका सौम्य रूप थी। जिन्हें तानाशाही का असली सुख लेना हो, उन्हें स्टालिन के रूस और आज के चीन के बारे में जानकारी इकट्ठा करनी चाहिए। अंधी आंखें भी देखने लगेंगी। ऐसा लगता है कि वैसे ही अंधेरे दिन, जब कोई भी चीज पारदर्शी नहीं रह जाती है, भारत में आने वाले हैं। 

फिर भी इस चुनाव के ब्योरों को देखने-सुनने का कतई मन नहीं करता था, क्योंकि इस भीषण अहसास को मैंने कुछ कोनों-अंतरों में दुबका हुआ या आंसू बहाते पाया। याद कीजिए कि इमरजेंसी के समर्थन में पढ़े-लिखे लोग भी थे और अपनी जिंदगी में सुबह-शाम किसी न किसी की तानाशाही झेलने वाली जनता भी। फासीवाद का अनुभव यही है कि वह किसी की गरदन रेतते हुए नहीं आता, लोकतांत्रिक चुनाव के माध्यम से ही आता है। तानाशाही में किसी भी चीज की गुंजाइश नहीं होती, पर लोकतंत्र में हर चीज की गुंजाइश होती है। 

चुनाव प्रक्रिया शुरू होते ही यह स्पष्ट हो गया था कि यह देश का सबसे गया-गुजरा चुनाव साबित होने जा रहा है। प्राय: सभी दलों ने बिना किसी लाग-लपेट के यह कहा कि नरेंद्र मोदी सचमुच प्रधानमंत्री बन जाते हैं, तो देश में तानाशाही आ जाएगी- लोकतंत्र खत्म हो जाएगा। सोनिया गांधी मौत का सौदागर कह ही चुकी थीं, ममता बनर्जी ने कहा कि यह शख्स देश और समाज को तोड़ने वाला है, समाज के एक वर्ग का खून बहाने वाला है, इसे तुरंत गिरफ्तार कर लेना चाहिए। जब आडवाणी अपने राम-रथ पर, जो वास्तव में एक टोयटा गाड़ी थी, ‘हम मंदिर


वहीं बनाएगे’ का दर्पनाक नाद करते हुए देश भर में घूम रहे थे, तब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने चेतावनी दी थी कि खबरदार जो वे बिहार में घुसे- उन्हें तत्काल गिरफ्तार कर लिया जाएगा, और अपने इस वचन को निभाया भी। 

मोदी चुनाव प्रचार करने दो बार पश्चिम बंगाल गए, पर ममता बनर्जी ने उन्हें तो क्या, उनके किसी चेले को भी गिरफ्तार नहीं किया। जहां बोली और चाल में इतनी भयावह खाई हो, वहां यह कैसे संभव था कि सभी कथित लोकतंत्रवादी दल एकजुट होकर उभरते हुए तानाशाह का प्रतिरोध करें? सच यह है कि बड़ी तानाशाही का विरोध कर रहे इन छोटे-छोटे दलों- कांग्रेस को शामिल करते हुए- के नेता खुद छोटे-छोटे तानाशाह हैं। इन्हें डर यह है कि जब बड़ी तानाशाही आएगी, तब छोटी-छोटी तानाशाहियां खत्म हो जाएंगी। दस मुरदे मिल कर भी एक जीवित व्यक्ति को हरा नहीं सकते। यहां तो मुरदों में मामूली एकता तक न थी।

वितृष्णा का दूसरा बड़ा कारण यह था कि चारों तरफ मोदी ही मोदी गूंज रहे थे- उनकी पृष्ठभूमि में उनकी पार्टी का सिर्फ चुनाव चिह्न कमल था। मैं यहां इस मजाक का मजा लेना नहीं चाहता कि कमल हमेशा कीचड़ में ही खिलता है, क्योंकि मुद््दा बहुत बड़ा है- हंसी का नहीं। लेकिन एक पार्टी, जो गर्व से दावा करती रही है कि वह अन्य पार्टियों की तरह व्यक्ति-प्रधान पार्टी नहीं, बल्कि सिद्धांतनिष्ठ संगठन है, किस तरह ढीली होकर अपने को कल के एक नेता को सौंप देती है, यह देखना अपने आप में अश्लील है। 

भाजपा के किसी भी नेता या कार्यकर्ता में भाजपा की सरकार बनाने की चाहत नहीं है, सभी मोदी की सरकार बनाने पर आमादा दिखाई पड़ते हैं। देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी का यह आत्मसमर्पण भारत के लोकतंत्र में एक दर्ज करने लायक घटना है। अगर मोदी जीतते हैं, तो भाजपा भी वैसी ही शीर्षवादी पार्टी हो जाएगी जैसी सोनिया गांधी की सरकार है। या, देश की दूसरी पार्टियां हैं।

यह दर्दनाक स्थिति भी देखने को मिली कि जहां नरेंद्र मोदी अपने आने को देश की सभी समस्याओं का हल बता रहे थे, वहीं अन्य दलों को सिर्फ सेक्युलरवाद की चिंता थी। उनसे पूछने को मन होता है कि गोधरा का लाभ वे कब तक उठाना चाहते हैं? एक आदमी पेट भर अनाज से लेकर उच्च शिक्षा तक देने का वादा कर रहा है और दूसरे लोग एक स्वर से सांप्रदायिक, सांप्रदायिक चिल्ला रहे हैं। ऐसे सेक्युलरवाद पर कौन मर-मिटेगा, जिसके पास किसी के लिए न रोटी हो न किसी के लिए नौकरी, जिसे न बढ़ती हुई कीमतों की फिक्र है न जल, जंगल, जमीन की चिंता। किसी भी देश को चलाने के लिए सेक्युलरवाद काफी नहीं है- जन-जीवन को खुशहाल करने वाली नीतियां भी चाहिए। सेक्युलरवाद ऐसी धोती नहीं है जिसे पहन लेने के बाद सारे पाप कट जाते हैं न ऐसा अस्त्र है जिससे किसी को भी बेसिर किया जा सकता है। यह उस सैनिक की वरदी है जो अपने देश को प्यार करता है और उसके दुखों को दूर करने के लिए हमेशा रणक्षेत्र में ही रहता है।

राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को छोड़िए, उनकी आंखें बहुत दूर तो क्या, दूर तक भी नहीं देख पातीं, लेकिन लेखक और विद्वान अगर लालटेन की रोशनी से आगे न देख पाएं, तो वे अपने पेशे के साथ बेवफाई करते हैं। अनेक बेवफाइयां देख चुके अशोक वाजपेयी अगर इस बेवफाई से भी विचलित हैं, तो यह स्वाभाविक ही है। भारतीय अंग्रेजी के लेखकों को छोड़िए, जो जरूरत से ज्यादा मजावादी (हिडोनिस्ट) हैं, पर हिंदी के तमाम लेखकों ने फासीवाद का विरोध किया है। यह विरोध उनके हृदय से निकला है, इसमें संदेह नहीं है। 

अफसोस यह है कि जब धरती जल रही है, तब हिमालय पर लोटा भर-भर के जल उड़ेला जा रहा है। मैं यह नहीं कहता कि लेखकों का यह विरोध अर्थहीन है, पर यह जरूर कहता हूं कि हमारे देश में बुद्धिजीवियों और आम जनता का रिश्ता जितना कमजोर है उससे कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता। जब तक इस रिश्ते को मजबूत और जीवंत नहीं बनाया जाता- इसकी पहल बुद्धिजीवियों को ही करनी चाहिए, क्योंकि प्यासा ही कुएं के पास जाता है, कुआं प्यासे के पास नहीं आता- तब तक लेखक क्या करते हैं क्या नहीं, इसकी कोई राजनीतिक या सामाजिक भूमिका नहीं है। घरों के तहखानों में बजने वाली शहनाइयां उत्सव का रूप नहीं ले सकतीं।

ऐसे चुनाव के बारे में, कम से कम मेरे लिए, मोटी-मोटी बातें जान लेना ही काफी है- क्योंकि ब्योरे न केवल बोर करने वाले हैं, बल्कि हृदयगति बढ़ाने वाले भी हैं।


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