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डरे हुए लोग PDF Print E-mail
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Tuesday, 13 May 2014 11:22

प्रेमपाल शर्मा

जनसत्ता 13 मई, 2014 : पुरी के मंदिर में दूसरी बार आया हूं, पर पुरानी एक भी स्मृति साथ नहीं दे रही। बीस बरस पहले आया था। बस इतनी याद बाकी है कि इतनी ही भीड़ थी। एक तरफ से घुसती दूसरी तरफ निकलती। कहीं कुछ छूट न जाने वाले अंदाज में हर मूर्ति के आगे सिर झुकाती, मंत्र-सा कुछ बुदबुदाती या टुकुर-टुकुर देखती, मुंह बंद किए नकल करती। 2014 में मुलाकात उसी भीड़ के दृश्य से थी। और भी ज्यादा, क्योंकि गुरुवार था। हर पांच-सात के झुंड के बीच एक चोटीधारी पंडा होता है। तरह-तरह की बातें बनाता, बताता; कुछ-कुछ करने के लिए कहता। यहां घी, बत्ती जलाओ और यहां दंडवत! यहां पानी का आचमन और यहां देवी दर्शन! इस देश का कोई देवता नहीं बचा, जिसे पुरी के मंदिर में जगह न मिली हो।

मेरे खुराफाती मन में इस मंदिर में भी ओडिशा की गरीबी के आंकड़े आ-जा रहे हैं। हाल ही में उड़िया भाषा को ‘क्लासिक’ का दरजा मिल गया है, लेकिन भूख से मुक्ति नहीं मिली। बाढ़ और तूफान से भी नहीं। भूख से बचने के लिए दिल्ली, मुंबई, कोलकाता की तरफ भागते लोग। ओडिशा के ज्यादातर लोग पानी के नल ठीक करने वाले, यानी प्लम्बर्स के रूप में जाने जाते हैं। आखिर कितनों को यहां पंडा बनने का लाइसेंस मिल सकता है! नए-नए नौजवान चेहरों को पंडई के धंधे में देख कोफ्त भी होती है। क्या ये पिता, दादा की गद्दी के वारिस हैं या इन्हें भी रेल के कुलियों की तरह लाइसेंस मिलते हैं!

जब संस्कृत में चंद धर्म-वाक्यों को उछाल कर जिंदगी में इतना खाने-पीने को मिल जाए तो क्या जरूरत है हाड़-तोड़ किसान, मजदूर, सफाई का काम करने की! ऊपर से मान-सम्मान भी पंडे-पंडितजी का। मेहनतकशों की छाया से भी डरते। लोकतंत्र के बाद भी जकड़न इतनी बरकरार, कि डर लगता है। डर की बात जरूरी है। साथ आया कल्याण निरीक्षक कह रहा था कि आप पंडों से कुछ मत कहिएगा, यानी उलझना नहीं। नाराज होकर हमला भी कर देते हैं। यहां इन्हीं की चलती है।

यहां केवल हिंदू धर्म वालों को प्रवेश मिलता है। कोई विधर्मी अगर पकड़ा जाए तो सजा है। इन्होंने एक बार इंदिरा गांधी को भी रोक दिया था। क्यों इंदिरा गांधी चुप लगा गर्इं? मुख्यमंत्री विदेश में रहे, पढ़े हैं। वे आखिर क्यों चुप हैं? लोकतंत्र क्या ऐसी मूर्खताओं को परंपरा के नाम पर बनाए रख कर सत्ता पर काबिज होने का नाम है? मैं मंदिर के प्रांगण में ही एक कोने पर बैठ गया। लो! प्रसाद वाला यहां भी आ टपका। मैंने अपने कागजों में निगाह


गड़ा ली, लेकिन वह नहीं माना। मुझे बड़ा डर लगता है प्रसाद से। बीमारी के चलते-फिरते नारद। न हाथ धुले, न बर्तन। कभी-कभी दक्षिण के प्रसाद में उत्तर भारत पहुंचते-पहुंचते बदबू आने लगती है। खाएं तो मुश्किल, बीमारी को न्योता, फेंकने या मना करने पर डर अंदर से!

मंदिर के पूरे अहाते में भीड़ से मुक्ति कहीं नहीं। जहां जगह खाली है, वहां बंदर कूद कर आ जाते हैं। प्रसाद चाटते, हाथों से कुछ छीनने की जुर्रत करते। पंडों की तरह इनकी भी कई पीढियां यहीं पैदा और ‘स्वर्ग’ जाती रही होंगी! बीच में न जाने कैसे पीपल का पेड़ ऐसा बड़ा आकार ले पाया है, जिस पर तुरंत ये पंडे और उसके डंडे की आवाज से भाग कर चढ़ बैठते हैं। कम से कम ये पंडों से तो ज्यादा मलूक लगते हैं!  न जाने कितने दरवाजे और कोने हैं पूरे मंदिर में और हर जगह एक से एक नए कारनामों की शृंखला। कई जगह कुछ छोटी-सी संटियां (टहनी) लेकर पंडा सिर या कंधों पर छुआता है आशीर्वाद देने की मुद्रा में। लेकिन खाली हाथ न जाने का आग्रह-सा करता हर जजमान से। हर आदमी अपनी मुद्रा से कुछ चढ़ावा वहां डाल कर आगे बढ़ जाता है। इन्हें छड़ीमार कहें या चिड़ीमार!

मैंने पत्नी को एक जगह एकत्रित भयानक भीड़ से बचने की सलाह दी तो उनका तपाक से जवाब था- ‘मैं जरूर जाऊंगी। ‘वन्स इन लाइफ टाइम’ में ही तो आना होता है यहां, और वे भीड़ में घुस गर्इं। अगर ये इसे ‘वन्स इन लाइफ टाइम’ मानती हैं तो ये बेचारे गरीब तो पूरी उम्र में एक बार ही निकलते हैं राधा-माधव के दर्शन करने। इन सबसे बेखबर इस मंदिर में कुछ देवत्व है तो वह जो मंदिर के पुनरुद्धार में या सफाई के लिए मंदिर के ऊपर बांसों पर चढ़ा  सफाई या मरम्मत में लीन है। पंडों, पुजारी, भक्तों के सारे दंद-फंद, डर, श्रद्धा लूट की जमीन से वाकई ऊपर।


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