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पहाड़ में बारिश PDF Print E-mail
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Monday, 12 May 2014 11:57

राजेंद्र उपाध्याय

जनसत्ता 12 मई, 2014 : पहाड़ की बारिश अक्सर मुझे लुभाती रही है। पहाड़ सब एक जैसे होते हैं, पर उनकी बारिश अलग-अलग होती है। कोदाईकनाल, श्रीनगर, लेह, शिमला या रानीखेत- सबकी बारिश अलग होती है। उस दिन सुबह से शिमला में बारिश हो रही थी। उसकी आवाज धीमी-धीमी किसी जलतरंग की तरह सुन रहा था। ऊपर से कहीं से धारा की तरह भी गिर रही थी। बारिश और पेड़ों की पत्तियां रह-रह कर बूंदों के हमले से झुक जा रही थीं।

शिमला में बंदर बहुत हैं। तरह-तरह के लंगूर भी हैं। सब झुंड में रहते हैं। सघन बस्तियों में भी उनकी बेरोकटोक आवाजाही है। मैं टैक्सी लेने के लिए खड़ा था, तो देखा कि एक बंदर चुपके-से आया और एक थैली ले उड़ा। थैली के मालिक को उसको ले जाने का जरा भी अफसोस नहीं हुआ। उलटे वह और उसके साथी कौतूहल से उन बंदरों की लीला देखने लगे कि देखें अब ये इसके साथ क्या करता है। उस बंदर के पास थैली देख कर दूसरे बंदर उसके पास लपके कि खाने का कुछ होगा। वह बंदर थैली को लेकर एक पेड़ से दूसरे पेड़, एक तार से दूसरे तार झूलने लगा। शायद सबके साथ वह अपना लूटा हुआ माल साझा नहीं करना चाहता होगा। उलटी-सीधी हरकतें करने के बाद वह एक घर की छत पर जा बैठा। थैली को उसने उलटा-सीधा किया। पहले एक जूता निकला और बाद में दूसरा जूता नीचे गिरा। अक्सर बंदरों को जो चीज नहीं चाहिए होती, वे उसके टुकड़े कर देते हैं। पर इस बंदर ने इन जूतों पर अपना श्रम व्यर्थ गंवाना उचित नहीं समझा और एक-एक कर उन जूतों को विपरीत दिशाओं में फेंक दिया। मालिक उनको बटोर लाया। देखा तो सही सलामत हैं।

बात बारिश से शुरू हुई थी। मन कड़ा कर जैसे-तैसे नहा कर मैं नाश्ता करने पहुंचा। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के अतिथि गृह में ठहरा था। पता नहीं क्यों इसे ‘फैकल्टी हाउस’ कहा जाता है। इसका सात नंबर का कमरा अन्य विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के लिए आरक्षित रहता है। मैं उसकी बगल में आठ नंबर में था। नाश्ता करके हाथ धो रहा था कि देखा, खिड़की पर एक छोटा बंदर बारिश से बचने के लिए दुबका है। बारिश के कारण ठंड हो गई है। वह बंदर ठंड से बचने के लिए अपना मुंह शीशे की ओर कर ले रहा था, फ्रेम के एक कोने में चिपका हुआ। उसके बाल उसकी ठंड कम नहीं कर पा रहे थे। बारिश की ओर पीठ करके दुबक रहा था। चेहरा भी छिपा लिया था। उसके हाथ-पैर मिल कर एक हो गए थे। थोड़ी देर में ही उसे ठंड लगती देख कर उसकी मां


ही होगी वह बंदरिया, उसके पास आई और उसे अपने आगोश में छिपा लिया। अब दोनों एक हो गए थे। छोटा बंदर उस बंदरिया के आगोश में सुरक्षित महसूस कर रहा था। वह बंदरिया जाने कहां से उसे ठिठुरता देख रही होगी, जो आ गई एकदम। वह उसे थोड़ी-थोड़ी देर में चूम भी लेती थी। प्यार कर लेती थी।

यह सब देख कर मैं हैरान था! पशुओं में भी इतनी मानवता, इतनी ममता, इतना अपनापन। क्या बंदर के बड़ा होने पर भी यह रहेगा? मुझे भी अपना बचपन याद आ गया और मां की याद आ गई। इसी तरह हम सब बड़े हुए हैं। इसी तरह जीवन जगत का यह संसार चलता है। हाथियों में भी यह ममता मैंने देखी है। जिम कार्बेट पार्क में हथिनी अपने छोटे बच्चे को नहलाती है। उसके साथ जल क्रीड़ा करती है। बिल्लियों और चिड़ियों में भी यह ममता होती है। शिमला की जनसंख्या की आधी तो बंदरों की ही होगी। यहां जाखू पर्वत पर भी ‘कपिश’ विराजते हैं। हनुमानजी की गुलाबी विशालकाय प्रतिमा लगी है, जो दूर से ही दिखती है।

फैकल्टी हाउस के परिसर में कल से एक शामियाना लगा हुआ था। वह धुल गया था। गैस चूल्हा, बर्तन-भांडे, बड़े-बड़े प्रेशर कुकर-भगौने आदि तरह-तरह के रसोई में काम आने वाले बर्तनों में पानी भर गया था। महीने की आखिरी तारीख थी। कोई सेवानिवृत्त हो रहा था। उसकी पार्टी रखी गई थी। इंद्रदेवता ने रंग में भंग कर दिया।

फैकल्टी हाउस विश्वविद्यालय के एकदम अंत में जाकर निर्जन जगह में है। यहां छह बजे शाम तक लौट आता था, क्योंकि उसके बाद अंधेरा, ठंड और सुनसान। कमरे की कांच की दीवार के पार से खूबसूरत शिमला दिखता है। रंग-बिरंगी रोशनियां पहाड़ी मकानों की जगमग-जगमग। ढेरों जुगनू जैसे बैठे हों। एकाध किसी गाड़ी के सरकने की आवाज। अंधेरे में चलती हुई रोशनी। रात अधिक होने पर जब नींद खुली, तो रजाई से देखा कि बत्तियां बुझ गई हैं। शहर सो गया है।


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