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आचार संहिता के बावजूद PDF Print E-mail
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Saturday, 10 May 2014 10:44

अनिल चमड़िया

जनसत्ता 10 मई, 2014 : आचार संहिता का महत्त्व तभी तक है जब तक कोई व्यक्ति या संस्था अपने निजी हितों के विरुद्ध स्थितियों में भी उसका दबाव महसूस करे। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले के कई विधानसभाओं और लोकसभा चुनावों को हम याद न भी करें तो एक सबसे चर्चित शब्द हमारा पीछा नहीं छोड़ता, वह है पेड न्यूज। मीडिया समझता है कि मतदाताओं के बीच किसी तरह का छल करना संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करना है, लेकिन वहां लगातार मतदाताओं को छला जाता रहा। उम्मीदवारों से भारी-भरकम राशि लेकर खबरों की शक्ल में विज्ञापन छापे या दिखाए जाते रहे, ताकि मीडिया को पैसे देने वाले उम्मीदवारों के पक्ष में मतदाताओं को छला जा सके। मतदाताओं ने खबरों के प्रति अटूट विश्वास जाहिर किया है और उस विश्वास को मीडिया संस्थानों ने बाजार में बेचने की हर संभव कोशिश की है। इसे दबाव रहित, निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने के उद्देश्यों को चोट पहुंचाने के प्रयास के रूप में देखा गया। 

इस बार के लोकसभा चुनाव की चार घटनाओं पर नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है। यह मीडिया के आचार संहिता को ही तोड़ने का महज मामला नहीं बनता, बल्कि इसे संसदीय लोकतंत्र पर सीधे-सीधे प्रहार करने के उदाहरणों के रूप में भी देखा जा रहा है। 

सात अप्रैल को असम और त्रिपुरा की छह लोकसभा सीटों पर मतदान हो रहा था और समाचार चैनलों द्वारा भारतीय जनता पार्टी के घोषणा-पत्र जारी करने के समारोह का सीधा प्रसारण किया जा रहा था। टीवी चैनलों पर सीधे प्रसारण के साथ घोषणा-पत्र की मुख्य बातों और वादों को ब्रेकिंग न्यूज के दौरान भी दिखाया जाता रहा। मुरलीमनोहर जोशी ने घोषणा-पत्र पर विस्तार से जानकारी देने के दौरान पूर्वोत्तर राज्यों के बारे में अपने वादों को भी बताया। 

दस अप्रैल को दिल्ली के सभी सात संसदीय क्षेत्रों में मतदान हो रहा था। उस दिन कई मतदान केंद्रों पर मतदाताओं को सहयोग करने के लिए मेज-कुर्सी लगाए कार्यकर्ताओं में अखबार पढ़ने की मानो होड़-सी दिखी। जिसे देखो, पहला पन्ना खोले दिखता था। दरअसल, चुनाव आयोग की चुनाव चिह्न के प्रदर्शन की मनाही के नहले पर अखबार के बहाने दहला था। क्योंकि उस दिन दिल्ली से निकलने वाले प्राय: सभी अखबारों का पहला पन्ना ‘मोदीमय और कमलमय’ था। टोपी-बैनर-पर्चों पर चुनाव चिह्न को रोका जा सकता था, लेकिन अखबार पढ़ने-दिखाने पर पाबंदी कैसे लगे? सो, खूब दिखा ‘कमल’। कई झुग्गी बस्तियों के केंद्रों के पास भी कार्यकर्ता अंग्रेजी अखबारों को घंटों निहारते दिखे। गौरतलब है कि उस दिन देश के कुल बानबे संसदीय क्षेत्रों में मत डाले गए। 

सत्रह अप्रैल को मतदान के छठवें दौर में सबसे ज्यादा एक सौ बाईस संसदीय क्षेत्रों में मतदान से दो दिन पहले एनडीटीवी ने एक ओपिनियन पोल के नतीजे जारी किए। दूसरे दिन द टाइम्स ऑफ इंडिया और अन्य अखबारों ने शीर्ष खबर छापी कि पहली बार किसी ओपिनियन पोल ने भाजपा के नेतृत्व वाले राजग को लोकसभा चुनाव में बहुमत दिया है। सर्वे के नतीजे के अनुसार 543 सीटों में से राजग को 275 सीटें मिलेंगी। अकेले भाजपा को 226 सीटें मिलेंगी। निर्वाचन आयोग ने 14 अप्रैल को इस ओपिनियन पोल के बारे में कहा कि उसमें उन 111 लोकसभा क्षेत्रों के संभावित नतीजे शामिल थे, जहां मतदान हुआ और एक तरह से उक्त निर्वाचन क्षेत्रों के संदर्भ में एग्जिट पोल के नतीजे का प्रसार करता है। यह जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 126 का उल्लंघन है। 

चौबीस अप्रैल को 117 संसदीय क्षेत्रों में वोट डाले जा रहे थे और उसी दिन नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से अपना नामांकन दाखिल करने की योजना बना रखी थी। उनके नामांकन समारोह को दिन भर टीवी चैनलों ने प्रसारित किया। 

दुनिया भर में शायद ही किसी उम्मीदवार के नामांकन दाखिल करने के कार्यक्रम को प्रसारित करने के लिए इतना समय दिया गया हो। क्या ये घटनाएं महज संयोग हैं? आचार संहिता के पालन की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों पर है, क्योंकि वही चुनाव मैदान में हैं और जुलूस, सभा और प्रचार के तरह-तरह के तरीके अपनाते हैं। लेकिन किसी भी आचार संहिता और कानून की व्याख्या सपाट तरीके से नहीं की जाती है। इसमें अंतर्निहित है कि मतदाता बिना किसी दबाव में आए निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से अपने मत का प्रयोग कर सकें। 

लोकतंत्र के तहत सक्रिय तमाम संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे लोकतंत्र के उद्देश्यों के अनुरूप काम करें। ऐसा नहीं माना जा सकता कि कोई एक संस्था तो लोकतंत्र के उद्देश्यों को पूरा करने के इरादे से काम करे और दूसरी संस्थाएं निर्धारित नियम-कायदों को तोड़ने की गुंजाइशों की खोज करें और उन्हें तोड़ने का फैसला करें। मीडिया में यह प्रवृत्ति एक विचार के रूप में स्थापित हो चुकी है कि वह लोकतंत्र को संपूर्णता में देखने के बजाय लोकतंत्र की सुविधाओं का अपने हितों के लिए इस्तेमाल करता है। 

सात अप्रैल मतदान का दिन था और उसी दिन भारतीय जनता पार्टी ने अपना घोषणा-पत्र जारी करने का फैसला किया, तो वह तकनीकी तौर पर यह जाहिर कर सकती है कि वह असम और त्रिपुरा से बहुत दूर स्थित लालकिले वाली राजधानी से मतदाताओं के प्रति अपनी एक जिम्मेदारी पूरी कर रही है। जन-प्रतिनिधित्व कानून और आचार संहिता से वह खुद को सुरक्षित कर लेती है। लेकिन अगर वह इस आचार संहिता और जन-प्रतिनिधित्व कानून से बचने और मतदाताओं के बीच मतदान के दौरान प्रचार करने की रणनीति का हिस्सा मीडिया को बना लेती है, तो


उसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाना चाहिए! 

अगर मीडिया संस्थान यह दावा करते हैं कि उनके पास ऐसी तकनीक नहीं है, जिससे कि वे मतदान वाले क्षेत्रों में सीधे प्रसारण को रोक सकें, तो क्या उनकी यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे तकनीक की मजबूरी, आचार संहिता और कानून की भावनाओं के अनुरूप रास्ता निकालें? अगर वे केवल तकनीकी सीमाओं का बहाना बनाते हैं तो यह उनके व्यवहारों की एक लंबी पृष्ठभूमि का अध्ययन करने के लिए प्रेरित करने लगती है। भारतीय जनता पार्टी जिन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आधारों वाला संगठन है, क्या उससे अलग कोई संगठन अपना इतने ही महत्त्व का कार्यक्रम आयोजित करता तो टीवी चैनल के संपादक आचार संहिता का उल्लंघन करने का फैसला करते? 

यही प्रवृत्ति दस अप्रैल के मतदान के समय भी देखने को मिली। आचार संहिता में उल्लिखित वाक्यों की सरलीकृत व्याख्या भारतीय जनता पार्टी ने मीडिया के समक्ष प्रस्तुत की और मीडिया ने भी उसे उसी तरह ग्रहण करने में अपना हित समझा। मतदान के दौरान अपने संस्थानों के समाचारपत्रों के मतदाताओं के बीच होने का लाभ भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों को पहुंचाने दिया। दस अप्रैल को विज्ञापन महज विज्ञापन नहीं हो सकते थे। लेकिन यह जानते हुए भी कि इन विज्ञापनों का असर मतदाताओं पर पड़ सकता है, समाचारपत्रों ने उसके प्रकाशन को करोड़ों की राशि लेकर स्वीकार कर लिया। 

इसी प्रवृत्ति का दोहराव टेलीविजन चैनल एनडीटीवी द्वारा 14 अप्रैल 2014 को मतदाता सर्वेक्षण के नतीजे प्रसारित करने के रूप में भी दिखता है। जन-प्रतिनिधित्व कानून में 126 बी का प्रावधान कर एक्जिट पोल पर मतदान पूरा होने तक रोक लगाने की व्यवस्था की गई है। लेकिन चैनल ने एक अनजानी रिचर्स कंपनी हंसा द्वारा कराए गए मतदाता सर्वेक्षण का नाम ओपिनियन पोल दिया और उसके परिणाम जारी कर दिए। जबकि 111 क्षेत्रों में मतदान हो चुका था और उन क्षेत्रों को भी इस सर्वे में यह कह कर शामिल बताया गया कि यह एक्जिट पोल नहीं, ओपिनियन पोल है।

समाचारपत्रों ने खुद के फैसले का यह कह कर बचाव तैयार कर लिया कि चैनल द्वारा जारी किए गए मतदाता सर्वेक्षण को उन्होंने प्रकाशित भर किया है। जबकि निर्वाचन आयोग का यह स्पष्ट मानना है कि सर्वेक्षण का प्रसारण कानून का उल्लंघन है। क्या कानून का उल्लंघन करने वाली कार्रवाई में खुद को शामिल करने का फैसला कानून का उल्लंघन नहीं माना जाता है? 

इसी प्रवृत्ति को 24 अप्रैल को भी दोहराते देखा गया। वाराणसी में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नामांकन को दिन भर प्रसारित किया गया और बताया गया कि उनके पक्ष में कैसे सुनामी आ गई है। यह जानते हुए कि नरेंद्र मोदी संसद की किसी एक सीट के उम्मीदवार नहीं हैं। वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं और जिन उम्मीदवारों के समर्थन का इंतजार कर रहे हैं वे 117 क्षेत्रों में चुनाव लड़ रहे हैं।

मतदान का आखिरी चरण बाकी है और उस दौरान मतदान के मौके पर जन-प्रतिनिधित्व कानून और आचार संहिता का उल्लंघन करने के लिए कई तरह की रणनीति अपनाई गई है। 

इसमें प्रमुख रूप से भाजपा के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू मतदान के पूर्व के अड़तालीस घंटों के दौरान प्रसारण और प्रकाशन करने का सिलसिला दिखता है। कंपनियों के उत्पादों के विज्ञापनों में राजनीतिक प्रचार दिख रहा है। लेकिन क्या यह महज संयोग है कि भारतीय जनता पार्टी और मीडिया का पक्षपात एक गहरे रिश्ते का आभास दे रहा है? क्या यह भी महज संयोग है कि संसदीय पार्टियों में केवल भाजपा ऐसा दल है, जो ओपिनियन पोल पर पाबंदी का पक्षधर नहीं है। 

मतदान के लिए तिथियों के एलान से पूर्व चुनाव आयोग ने एक्जिट पोल की तरह ओपिनियन पोल पर पाबंदी लगाने का सुझाव दिया था और भाजपा को छोड़ कर सभी दलों ने उसके पक्ष में सहमति दी थी। लगता है, चुनाव में मीडिया के साथ उन दिनों के लिए भी प्रभावशाली प्रचार करने की योजना बन चुकी थी, जब मतदान से अड़तालीस घंटे पहले चुनाव प्रचार से दूसरी पार्टियां दूर रहेंगी और मतदान के दौरान जब मतदान केंद्रों के बाहर चुनाव चिह्न तक के इस्तेमाल पर पाबंदी की कानूनसम्मत व्यवस्था है। 

संसदीय लोकतंत्र में यह चुनाव तीन बातों के लिए हमेशा याद किया जाएगा। एक, यह देश का पहला चुनाव है, जिसमें कॉरपोरेट मीडिया की सबसे ज्यादा सक्रिय और प्रत्यक्ष हिस्सेदारी है। दो, दुनिया का सबसे महंगा चुनाव है और तीन, यह मीडिया के लिए आचार संहिता और जन-प्रतिनिधित्व कानून को तोड़ने के लिहाज से आदर्श चुनाव है। 

शायद जनता के लिए, जनता द्वारा और जनता के लोकतंत्र में यह महसूस किया जाने लगा है कि मीडिया जनित वोटर (मैन्यूफैक्चरिंग वोटर थ्रू मीडिया क्लास) सिद्धांत पर आधारित चुनाव की तरफ हम बढ़ रहे हैं। वहां निर्वाचन आयोग का कानून निष्क्रिय करने का अपना एक कानून काम करता है। 


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