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गंभीरता में गोलमाल PDF Print E-mail
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Saturday, 10 May 2014 10:42

प्रीति तिवारी

जनसत्ता 10 मई, 2014 : मुझे नहीं पता कि यह कोई गंभीर बात है या नहीं। लेकिन मेरे लिए यह एक सवाल के रूप में तब खड़ा होता है, जब मेरे कानों में गहन सोच-विचार के बाद कही गई किसी बड़े विद्वान की गंभीर बात के आखिर में यह सुनाई पड़ता है कि ‘चलिए, बहुत हुई गंभीर बातें, अब थोड़ा माहौल को हल्का किया जाए!’ आजकल गोष्ठियों, आयोजनों, अखबारों, समाचार चैनलों में बात को ‘हल्का’ करने की कोशिश साफ नजर आती है।

ऐसा क्यों है कि हमने सोच-विचार की परतों में जिम्मेदार और गैर-जिम्मेदार, दो खांचे बना दिए हैं, बातचीत के बीच ही ‘गंभीर’ और ‘हल्की’, अलग-अलग श्रेणियां बना दी गई हैं? क्या सहज बातचीत में दिखाई देने वाली दो ‘श्रेणियां’ जिम्मेदारियों से एक खास तरह की दूरी बनाए रखने की रणनीति की ओर इशारा नहीं करतीं? क्या ऐसा नहीं है कि बौद्धिकता का झूठा अहम पाले हुए हम एक ओर गंभीरता का रिवाज भी पूरा कर लेना चाहते हैं और साथ ही उसके परिणामस्वरूप पैदा होने वाले तनाव से भी मुक्त रहना चाहते हैं? यहां दायित्व-बोध जितने तेवर के साथ आता है, उतनी ही तेजी से वह दूसरे रास्ते से चला भी जाता है। चौंकाने वाली बात यह है कि बात को हल्का करने वाला व्यक्तिइस बात का श्रेय भी बढ़-चढ कर लेता है कि वह ‘माहौल’ की गरिमा को बनाए रखने की कोशिश कर रहा है और केवल उसी के कारण कोई ‘अनहोनी’ (जो शायद अस्तित्वहीन होती है!) टल जाती है!

दरअसल, बात को हल्का करके मुस्करा लेना केवल व्यक्तिगत दोहरेपन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बहुत दूर तक जाने वाला सवाल है। मेरी नजर में यह अनजाने में होने वाली क्रिया बिल्कुल नहीं है। इसे जानबूझ कर और बेहद चालाकी से किया जाता है। वाग्जाल को हथियार बना कर मुद्दे को गुमराह करना शायद इस प्रवृत्ति के मुकाबले बहुत छोटी चीज है। वाग्जाल में गुमराह हुआ मुद्दा सूझ-बूझ की बदौलत वापस केंद्र में लाया जा सकता है। पर गंभीर विमर्श को हल्का कर देने वाली स्थिति इतनी सहज नहीं जान पड़ती। दरअसल, इस स्थिति में गंभीर विषय को हल्का कर देने के साथ केवल माहौल को हल्का नहीं किया जाता, बल्कि बहुत बारीकी से उसकी गंभीरता को भी खत्म


कर दिया जाता है। यहां प्रश्न किसी विषय या विचार के संपूर्ण अस्तित्व का है। अगर विषय अपने स्वभाव में गंभीर है तो उसका ‘ट्रीटमेंट’ उसी स्तर पर किया जाना उसके साथ न्याय होगा। यहां न उसे अति गंभीर बनाना है और न ही गंभीर होने से बचाना है।

सवाल यह भी है कि आखिर यह ‘माहौल’ क्या है, जिसे हल्का किया जा रहा है? इस ‘माहौल’ को हल्का बनाए रखने की जरूरत क्यों है? दरअसल, माहौल को गंभीर बना कर उसे हल्का करना एक खास तरह की आदत बनती जा रही है, जिसके जरिए न केवल एक विषय या विचार के स्तर पर गंभीरता को खत्म किया जा रहा है, बल्कि गंभीर चिंतन की पूरी प्रणाली को ही जड़ से उखाड़ा जा रहा है। शायद गंभीरता से दूरी बनाने वाला वर्ग निश्चिंतता का पक्षधर है। वह कतई यह नहीं चाहता कि गंभीरता उसके चेहरे पर तनिक भी शिकन लाए। वह नहीं जानता कि जिसे वह निश्चिंत होना कहता है, उसे वास्तव में स्थितियों से अनजान बने रहना कहा जाता है। इसके उलट, गंभीरता को समाज से दूर रखने वाला वर्ग यह नहीं चाहता कि व्यक्ति या व्यक्ति-समूह की चिंतनशक्ति उसे समस्याओं के समाधान तक पहुंचाने में सफल हो। एक बड़ा बाजार और राजनीति सामान्य व्यक्ति को सामान्य बनाए रखना चाहते हैं, ताकि उन पर आसानी से अपना सोच, अपना सामान और अपने सुझाव थोपे जा सकें। इसलिए माहौल को हल्का बनाए रखना उसकी जरूरत है, क्योंकि वह जानता है कि गंभीर माहौल के गंभीर बने रहने में ही उसकी सफलता और समाधान छिपे होते हैं।  


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