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आलोचना के बरक्स PDF Print E-mail
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Friday, 09 May 2014 10:34

भव्य भारद्वाज

जनसत्ता 9 मई, 2014 : लोकतंत्र में सभी को अपने अनुसार किसी का भी समर्थन करने या न करने का अधिकार होता है और इसकी इज्जत की जानी चाहिए। लेकिन जहां आलोचना जरूरी है, वहां किसी भी तरह की कोताही भी नहीं बरती जानी चाहिए। आज के आक्रामक चुनावी माहौल में अक्सर किसी पार्टी या उम्मीदवार विशेष के समर्थक अपनी पसंदीदा पार्टी या उम्मीदवार की आलोचना सुनने को तैयार नहीं होते। लेकिन व्यावहारिक तौर पर एक बात समझी जानी चाहिए कि अगर एक उम्मीदवार सामने वाले पर अंगुली उठाता है और उसे उसकी कमी से अवगत कराता है तो खुद इसी तरह के व्यवहार के लिए तैयार क्यों नहीं रहता, बशर्ते आलोचना तार्किक हो। ऐसा ही वाकया हाल में देखने को मिला। आसनसोल में एक चुनावी सभा में नरेंद्र मोदी चुनाव आयोग पर बरसे और उसकी कार्यप्रणाली से खफा नजर आए। यही नहीं, अपने भाषण में चुनाव आयोग को कई सुझाव-रूपक धमकियां उन्होंने दीं। एक बार को अगर इसे नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव आयोग द्वारा प्राथमिकी दर्ज करने के बाद पैदा भड़ास से उपजे सुझाव के रूप में भी देखने की कोशिश की जाए तो नरेंद्र मोदी अपनी ही कसौटी पर कई जगह मात खा जाते हैं।

आसनसोल में नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और कहा कि आयोग के पास प्रधानमंत्री से भी ज्यादा शक्तियां होती हैं तो उसे उचित कदम उठाने चाहिए। मोदी के राजनीतिक सफर को देखते हुए यह भी नहीं कहा जा सकता कि वह किसी नई पार्टी के कार्यकर्ताओं की तरह नौसिखिए हैं। यह बात अब न जाने कितनी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है कि चुनाव आयोग के पास मात्र आदर्श आचार संहिता नाम की चुनावी नियमावली का पालने कराने के अधिकार के अलावा और कुछ नहीं है। ज्यादा समय से न सही तो इन लोकसभा चुनावों के दौरान पत्र या पत्रिका पढ़ने वाला एक साधारण पाठक भी आज जनता है कि चुनाव आयोग किसी उम्मीदवार द्वारा आचार संहिता के उल्लंघन पर नोटिस जारी करने और भविष्य में वह गलती न दोहराने की चेतावनी देने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। अब अगर इसकी


सफाई में भाजपा यह कहे कि चुनावों के चलते मोदी पत्र-पत्रिकाएं नहीं पढ़ पा रहे तो यह हास्यास्पद होगा। वे गुजरात में लंबे समय से एक मजबूत सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं और यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि उन्हें प्रशासन सहित चुनावों के दौरान संबंधित महकमों के कार्यक्षेत्र और उनके अधिकारों की जानकारी होगी।

बहरहाल, आसनसोल में जो आक्रामकता नरेंद्र मोदी चुनाव आयोग के खिलाफ दिखाते नजर आए, वह अमित शाह के सांप्रदायिक भाषण के समय कहां गायब थी? और तो और, क्या मोदी इस बात को झुठला पाएंगे कि पिछले दो दशक से दर्जन भर से भी ज्यादा सुझाव चुनाव आयोग केंद्र सरकार को दे चुका है और यह काम वह भाजपा सरकार के शासन में भी एड़ी-चोटी का जोर लगा कर करता रहा। मैं यहां किसी पार्टी की नुमाइंदगी या विरोध नहीं कर रहा। नरेंद्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री के तौर पर पेश किया गया है, इसलिए यह अपेक्षा स्वाभाविक है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री पद के योग्य किसी उम्मीदवार को उस समय भी विरोध दर्ज कराना चाहिए था, जब सभी दल सूचना आयोग के उस निर्णय के खिलाफ एकजुट हो गए थे, जिसमें सभी दलों को सूचना के अधिकार के तहत लाने की बात की गई थी या जब उच्च न्यायालय ने दागी सांसदों की सदस्यता रद्द करने का आदेश दिया तो सभी दल एक अध्यादेश के पक्ष में खड़े हो गए थे। खैर, आगे किस तरह के अच्छे दिन आएंगे, पता नहीं!  


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