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नियंता की नीयत PDF Print E-mail
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Thursday, 08 May 2014 11:39

रिम्मी

जनसत्ता 8 मई, 2014 : हालांकि दुनिया के ज्यादातर हिस्सों के सामाजिक ढांचे में बराबरी के पैमाने पर स्त्री की स्थिति को अभी पूरी तरह संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। लेकिन भारत में अगर आप पुरुष हैं तो आपको पूरा ‘अधिकार’ है कि आप महिलाओं को अपने ज्ञान बांटें, उन्हें हर छोटी या बड़ी बात पर न्याय, नैतिकता और संस्कृति का पाठ पढ़ाएं। इतना ही नहीं, अगर आप महिला सशक्तीकरण के समर्थक दिखना चाहते हैं तो महिलाओं को विद्रोह, ‘आजाद’ जिंदगी जीने के लिए भी ‘प्रोत्साहित’ कर सकते हैं। ये खयाल भारतीय पुरुषों के संदर्भ में हैं, क्योंकि किसी अन्य देश के पुरुष से मिलने और उनके विचारों से रूबरू होने का सुअवसर मुझे अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। लेकिन हमारे यहां के पुरुषों को एक अजीब तरह की आजादी मिली हुई है। वे चाहें तो महिला के पक्ष में बोले, चाहें तो विपक्ष में। साथ ही महिलाओं को भी यह ‘आजादी’ मिली हुई है कि पुरुष उनके सामने अगर उल्टियां भी करे, वे उसे सुनें, बर्दाश्त करें और स्वीकार करें।

अगर आप गलती से महिला हैं और महिला सशक्तीकरण, स्वतंत्रता, स्वाभिमान और आत्मसम्मान की बात करें तो आपके ‘शुभचिंतक’ पुरुष, वे चाहे पिता हों, भाई, दोस्त या फिर जीवनसाथी, पहले तो आपको ‘नारीवादी’ होने के तंज से नवाजेंगे, फिर अपनी ‘बौद्धिकता’ का परिचय देते हुए आपको प्रवचन सुनाएंगे कि लड़कियों के लिए इतना आक्रामक या उग्र होना अच्छा नहीं होता । थोड़ा ‘सौम्य’ बनो। तुम तो पूरी ‘नारीवादी’ हो गई हो! अगर वही पुरुष किसी महिला के लिए अपने ‘सुसंस्कृत’ सोच का बखान करे तो वह ‘बौद्धिकता’ कहलाती है, जो जमाने के ‘गहन विश्लेषण’ के बाद उन्हें प्राप्त होती है। उनके इस ‘उच्च विचार’ के मुताबिक जिस तरह ‘सूरज पूर्व में उगता है’, उसी तरह महिलाओं में दिमाग, ज्ञान और आत्मविश्वास की कमी होती है! पुरुषों के ‘खुले विचार’ और महिलाओं के ‘कुंठित’ सोच में जमीन-आसमान का अंतर होता है। यह तथाकथित ‘सार्वभौमिक’ सत्य एक सत्ता के रूप में पुरुषों ने स्थापित किया है।

ऐसे खयालों में यह भी है कि जो भी महिला अपनी आजादी और आत्मसम्मान की बात करती है, वह या तो ‘एडवांस’ होती है या


फिर कुंठा की शिकार होती है और उसे मनोचिकित्सक के पास जाना चाहिए। अगर लड़की छोटी स्कर्ट पहने तो ‘हॉट’ या ‘बिगड़ी’ हुई होती है, लेकिन अगर पुरुष अपने अंत:वस्त्रों में घूमे तो ‘माचोमैन’ होता है! अगर कोई लड़की सिगरेट या शराब पिए, देर रात पार्टी में जाए तो समाज का माहौल खराब होता है, पर कोई पुरुष अपनी पत्नी का बलात्कार भी करे तो वह मर्दानगी है। आमतौर पर हर लड़की का ऐसे ‘लिबरल’ पुरुषों से सामना जरूर होता है। पर जब उनकी कारस्तानियों के चिट्ठे पर गौर किया जाए तो सच सामने आ जाता है। हालांकि मुझे बड़ा सुकून मिलता है, जब किसी को दोहरा व्यवहार करते देखती हूं। उसके खोखला होने का अहसास मेरे भीतर के आत्मविश्वास में इजाफा करता है।

समाज और सोच को बदलने का ठेका जब तक केवल पुरुषों के हाथ में रहेगा, ऐसा ही होता रहेगा। सवाल यह है कि स्त्री के जीवन और अस्तित्व के बारे में सब कुछ तय करने का अधिकार केवल पुरुषों को किसने दिया? क्यों ऐसा हुआ कि स्त्री ने खुद को इतनी निरीह और दूसरों पर निर्भर मान लिया कि अपनी पहचान खो बैठी और इनकी नियति पुरुष तय करने लगे। जाहिर है, अगर हम अपने बरक्स खड़े पुरुष के सोचने-समझने का तरीका या पूर्वग्रह बदलना चाहते हैं पहले खुद को बदलना होगा। अपनेलिए खुद खडेÞ हों और अपनी पहचान बनाएं, क्योंकि मांगने से तो भीख मिलती है, हक के लिए लड़ना पड़ता है।  


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