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चुनाव के नेपथ्य में PDF Print E-mail
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Monday, 05 May 2014 11:36

धर्मेंद्रपाल सिंह

जनसत्ता 5 मई, 2014 : योजना आयोग के अनुसार आज भी देश में 21.9 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं।

शहर में जो आदमी एक महीने में एक हजार रुपए और गांव में आठ सौ सोलह रुपए से कम कमाता है, वह गरीबी रेखा से नीचे है। इसका अर्थ यही हुआ कि जब सवा अरब की आबादी में सत्ताईस करोड़ से ज्यादा ऐसे गरीब हों, जो दो जून की रोटी के जुगाड़ में अपनी जिंदगी होम कर रहे हों, तो उनके चुनाव में खड़े होने की कल्पना करना परिहास ही होगा। अब उस आबादी की बात, जिसे सरकार खुशहाल मानती है। 

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 (2005-2006) के अनुसार, देश में छह से पैंतीस माह आयुवर्ग के 78.9 प्रतिशत बच्चे और पंद्रह से उनचास वर्ष आयुवर्ग की 56.2 फीसद महिलाएं खून की कमी से पीड़ित हैं। ताजा जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि भारत के 53.1 प्रतिशत घरों में शौचालय नहीं हैं और जहां हैं वहां सैंतालीस फीसद में पानी का कोई बंदोबस्त नहीं है। इकहत्तर प्रतिशत घरों की छत कंक्रीट नहीं, मिट्टी-घास या टाइल से बनी है। 52.5 प्रतिशत घरों की दीवारें र्इंट नहीं, पत्थर-मिट्टी या घास से बनी हैं और 37.1 फीसद घर केवल एक कमरे के हैं। सत्तर प्रतिशत से ज्यादा घरों का चूल्हा लकड़ी, गोबर के उपलों या मिट्टी के तेल से जलता है। देश की आधी से ज्यादा आबादी आज भी खुले में नहाने को मजबूर है। 

मामूली समझ रखने वाला व्यक्ति भी जानता है कि अगर कोई संपन्न होगा तो खुले में शौच नहीं जाएगा, आसमान के नीचे नहीं नहाएगा, कच्चे घर में नहीं रहेगा और खाना बनाने के लिए गैस के बजाय उपले या लकड़ी का इस्तेमाल नहीं करेगा। अपने बच्चों और बीवी की खून की कमी या कुपोषण जैसी जानलेवा कमजोरी तो कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। ऐसे करोड़ों लोग अगर चाहें भी तो चुनाव नहीं लड़ सकते। 

ताजा चुनाव में जिस हिसाब से पैसे की नदियां बही हैं, वह देख कर कहा जा सकता है कि इस बार लगभग पचास हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे। यह रकम पिछले (2012) अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से भी ज्यादा है, जिसमें बयालीस हजार करोड़ रुपए खर्च हुए थे। भारतीय लोकतंत्र का यह सबसे महंगा चुनावी दंगल है। इस बार चुनाव आयोग ने खर्च की सीमा बढ़ा कर चौवन से सत्तर लाख रुपए प्रति संसदीय सीट बांधी है, लेकिन जानकारों का दावा है कि बड़े दलों के प्रत्याशी लगभग दस करोड़ रुपए प्रति सीट लगाते हैं। प्रत्येक सीट पर अगर औसत चार दमदार प्रत्याशी जोड़े जाएं तो देश भर की पांच सौ तैंतालीस लोकसभा सीटों पर उम्मीदवारों द्वारा खर्च की जाने वाली रकम ही इक्कीस हजार करोड़ रुपए से ऊपर बैठेगी। पार्टी के बड़े नेताओं की चुनावी रैलियों पर व्यय होने वाला पैसा इससे अलग है। एक उदाहरण से इसका अनुमान लगाया जा सकता है। अकेले तमिलनाडु में पांच सौ से सात सौ के बीच चुनावी सभाएं हुर्इं जिन पर करोड़ों रुपए फूंके गए। 

काले धन पर अंकुश लगाने के लिए चुनाव आयोग प्रत्याशियों पर नजर रखता है, लेकिन उसे इस मुहिम में आंशिक सफलता ही मिल पाती है। फिर भी आयोग ने अरबों रुपया नकद और करोड़ों रुपए का सोना, चांदी और शराब पकड़ी है। इस चुनाव पर आयोग और सरकार के भी सात-आठ करोड़ रुपए खर्च होने का अंदाजा है। कुल मिला कर सोलहवीं लोकसभा के चुनावी महासमर में पिछली बार से तीन गुना अधिक पैसा लगेगा। भारतीय राजनीति में पैसे के बढ़ते दुष्प्रभाव के कारण ही आज अच्छे और ईमानदार लोगों के लिए चुनाव लड़ना और जीतना लगभग असंभव हो गया है। लोकसभा चुनाव में अब कानूनन अधिकतम खर्च की सीमा सत्तर लाख रुपए कर दी गई है। इतना पैसा गरीब तो क्या उच्च मध्यवर्ग का व्यक्ति भी पूरी जिंदगी नौकरी करने के बाद नहीं बचा पाता। ऐसे में वह चुनाव लड़ने की कल्पना भी कैसे कर सकता है? कॉरपोरेट फंडिंग ने रही-सही कसर पूरी कर दी है।  

इस बार आम चुनाव में कॉरपोरेट और औद्योगिक घरानों का खुलेआम नाम लेकर राजनीतिक दलों ने एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए हैं। जो बात पहले कानों में कही जाती थी, इस बार चुनावी भाषणों और प्रेस कॉन्फें्रस में कही गई है। राहुल गांधी ने औरंगाबाद में अपनी एक जनसभा में मोदी के गुजरात के विकास मॉडल की खिल्ली उड़ाते हुए उसे टॉफी-मॉडल बताया। बकौल राहुल, अडानी औद्योगिक समूह को नाजायज लाभ पहुंचाने के लिए मोदी ने टॉफी के मूल्य (एक रुपए प्रति गज) पर पैंतालीस हजार एकड़ जमीन दे दी। टाटा कंपनी को नैनो कार का संयंत्र लगाने के लिए अनुचित मदद की। 

जवाब में सुब्रहमण्यम स्वामी ने मोर्चा खोला। उन्होंने आरोप लगाया कि राबर्ट वडरा ने दिल्ली में राष्ट्रपति भवन के निकट एक बेशकीमती जमीन का ‘लैंड यूज’ बदलवा कर डीएलएफ  को अरबों रुपए का लाभ पहुंचाया। ‘आप’ के नेता प्रशांत भूषण ने आरोप जड़ा कि तेलमंत्री वीरप्पा मोइली पश्चिमी घाट में इक्कीस बरस पहले हुई नीलामी की दर और शर्तों पर एस्सार ग्रुप को तेल और गैस कुएं आबंटित करना चाहते हैं। मंत्रालय के अधिकारियों के विरोध की अनदेखी कर तेलमंत्री उक्त कंपनी को बावन हजार करोड़ रुपए का लाभ पहुंचाना चाहते हैं। 

भाकपा सांसद ने चुनाव आयोग को पत्र लिख कर शिकायत की कि उसने एक अप्रैल से प्रस्तावित गैस मूल्यवृद्धि पर रोक तो लगा दी, लेकिन रिलायंस समूह को लाभ पहुंचाने के लिए तेलमंत्री इस आदेश पर अमल नहीं कर रहे हैं। चुनाव के दौरान यह खबर भी आई कि हवा का रुख भांप कर बड़ी संख्या में औद्योगिक घराने भाजपा और नरेंद्र मोदी का समर्थन कर रहे हैं। यह भी कहा गया कि अकेले मोदी की चुनावी रैलियों पर नौ से दस हजार करोड़ रुपए का खर्च होगा, जो चुनिंदा उद्योगपति दे रहे हैं। 

कांग्रेस खेमे ने खबर उड़ाई कि चुनाव प्रचार के लिए उसके पास धन कम पड़ गया है, जबकि धन्नासेठों की मेहरबानी से भाजपा


पैसा पानी की तरह बहा रही है। इन सारी बयानबाजी से जनता ने यह जान लिया है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में चुनाव लड़ने के लिए बड़ी पार्टियां कहां से पैसा जुटाती हैं और सत्ता में आने पर अपने चहेते उद्योगपतियों को कैसे फायदा पहुंचाती हैं। 

कुछ समय पहले जब दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने गैस घोटाले में मुकेश अंबानी और तेलमंत्री वीरप्पा मोइली के खिलाफ एफआफआर दर्ज करने का आदेश दिया तो पूरे देश में हंगामा मच गया था। कांग्रेस और भाजपा नेताओं ने गैस घोटाले पर आज भी रहस्यमय चुप्पी साध रखी है। इसी प्रकार जब कोयला घोटाले में सीबीआइ ने उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला को दोषी मान उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर जांच की बात कही तो कई केंद्रीय मंत्री, भाजपा नेता और उद्योग जगत बिड़ला के बचाव में उतर आया। उद्योगपतियों के विरुद्ध जांच को देश की आर्थिक सेहत और विकास के लिए हानिकारक बताया गया। जो पार्टियां कुछ माह पहले तक घोटालों में उद्योगपतियों का नाम आने पर उनका बचाव करती थीं, आज चुनावी सभाओं में खुलेआम उनका नाम क्यों घसीट रही हैं?

इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए पिछले दो दशक में देश की आर्थिक नीतियों में आए बदलाव और उसके परिणामों पर नजर डालनी होगी। 1991 में हमने मिश्रित अर्थव्यवस्था की डगर छोड़ खुली अर्थव्यवस्था को अपनाया। कोटा-परमिट राज खत्म हुआ। वैश्वीकरण और बाजार आधारित नीतियां अपनाने से विकास दर में खासा इजाफा हुआ। उद्योग-धंधे फले-फूले, भारी मात्रा में निवेश आया। विकास के साथ-साथ देश में आय का वितरण और असमान हो गया। प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का दौर चला, जिसकी कोख से कई घोटालों का जन्म हुआ। स्पेक्ट्रम, कोयला और गैस के घोटालों में अरबों-खरबों रुपयों की हेराफेरी हुई। 

सरकार ने निजी कंपनियों के लिए बाजार तो खोल दिया, लेकिन भ्रष्टाचार रोकने के लिए न तो नियम-कायदे बनाए और न ही पारदर्शी नीतियां अपनार्इं। रातोंरात मुनाफा कूटने की नीयत से कॉरपोरेट जगत के कुछ सूरमाओं ने राजनीतिक दलों और बड़े नेताओं से नजदीकी रिश्ते बनाए। सत्ता के गलियारों में पैठ बनाने के लिए अनोखी जन-संपर्क नीति गढ़ी गई। राडिया टेप से कॉरपोरेट जगत और सरकार के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के बीच हुई दुरभिसंधियों का पर्दाफाश हुआ। 

मौजूदा राजनीति पर पैसे की काली परछार्इं साफ  देखी जा सकती है। राजनीति सेवा नहीं, पैसा कमाने का जरिया बन गई है। अब हर पार्टी और बड़े नेताओं के अपने चहेते उद्योगपति और कॉरपोरेट घराने हैं, जो उनके लिए चुनावों में खुले हाथ से पैसा फूंकते हैं। हवा का रुख भांप कर कुछ घराने पाला भी बदलते हैं। चंद बरस पहले तक सारा खेल परदे के पीछे होता था, अब खुल्लमखुल्ला होने लगा है। चुनावों पर कॉरपोरेट घरानों की राजनीतिक खेमेबंदी का असर दूर से ही दिखाई पड़ जाता है। अगर कोई घराना किसी एक पार्टी का साथ देता है तो दूसरा दल उसका कच्चा चिट््ठा खोल देता है। यह काम सार्वजनिक मंच से होने लगा है।  

स्वतंत्रता के बाद केंद्र और राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी। 1947 से पहले कांग्रेस से जुड़े धन्नासेठों से सरकार का रिश्ता और प्रगाढ़ हो गया। सेवा के बदले उन्हें मेवा भी खूब मिला, लेकिन इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने और कांग्रेस के दो फाड़ हो जाने से पुराने समीकरण गड़बड़ा गए। अधिकतर उद्योगपति मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली कांग्रेस के साथ खड़े दिखे।

आम आदमी को लुभाने के लिए इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और राजा-महाराजाओं का प्रिवी पर्स खत्म कर दिया। उनकी रणनीति सफल रही। 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया और अपने विरोधियों को करारी शिकस्त दी। इस चुनाव में उन्होंने विपक्षी दलों को उद्योगपतियों का एजेंट कहा, लेकिन सीधे-सीधे किसी का नाम नहीं लिया। 

जनसंघ के जमाने से भाजपा को बनियों और व्यापारियों की पार्टी माना जाता है। शुरू में उसके साथ मझोले उद्योगपति और व्यापारी ही जुड़े थे लेकिन केंद्र में वाजपेयी सरकार बनने के बाद उद्योग जगत में भाजपा ने गहरी पैठ बना ली। आज कांग्रेस के मुकाबले भाजपा का कॉरपोरेट जगत में रुतबा ज्यादा नजर आता है। मुकेश अंबानी, रतन टाटा, राहुल अडानी जैसे उद्योगपति भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी के प्रशंसक हैं। आम चुनाव में भाजपा ने जितना पैसा फूंका है वह कॉरपोरेट घरानों की मदद के बिना संभव नहीं है। 

जिस हिसाब से चुनावी खर्च बढ़ रहा है उसे देख कर लगता है कि भविष्य में क्षेत्रीय और छोटी पार्टियों के लिए अपना अस्तित्व बचाना कठिन हो जाएगा। बड़ी पार्टियां अपने धन के बल पर छोटे दलों को निगल जाएंगी। हमारे यहां भी यूरोपीय देशों और अमेरिका की तरह दो-तीन दल ही बचेंगे। यह व्यवस्था कॉरपोरेट जगत को भाती है। चुनिंदा दलों और नेताओं को साधना उनके लिए आसान होता है। ऐसी स्थिति में वे अपनी मर्जी से सरकार और नेताओं की अदला-बदली करते रहते हैं। अमेरिका और यूरोपीय देशों में पूरा कॉरपोरेट जगत और मीडिया पार्टी लाइन पर बंटा हुआ है। जिसकी पार्टी जीत जाती है उसकी पौ बारह हो जाती है। हमारे देश में भी यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। अगर हालात नहीं बदले तो अगले चुनाव तक कॉरपोरेट खेमेबंदी और तेज हो जाएगी।


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