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मोदी के समय में माफी PDF Print E-mail
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Friday, 02 May 2014 12:08

विकास नारायण राय

जनसत्ता 2 मई, 2014 : मोदी के गुजरात मॉडल का एक घोर असहज करने वाला सामाजिक पक्ष विहिप के तोगड़िया ने मौजूदा चुनावी दौर में दिखाया।

एक वीडिओ में वह मोहल्ले में नए बसे मुसलिम परिवार को अपमानित कर बाहर खदेड़ने के गुर मध्यवर्गीय हिंदू स्त्री-पुरुषों के समूह के साथ चटखारे लेकर साझा करता है। सांप्रदायिक दंगों की आंकड़ेबाजी में इस पक्ष की प्राय: अनदेखी हो जाती है कि गुजरात में सांप्रदायिक आधार पर समाज विभाजन का आक्रामक दौर थमा नहीं है। गोधरा कांड के बाद वहां के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के साथ कामकाजी भोजन की एक दोपहर मुझे आज तक याद है, जिसमें स्थानीय पुलिस इंस्पेक्टर ने बिना पूछे बार-बार हमें आश्वस्त करना जरूरी समझा था कि चिकन-करी किसी मुसलिम स्रोत से नहीं है और, लिहाजा, ‘सुरक्षित’ है।   2013 के मुजफ्फरनगर दंगे जैसे प्रकरण मुसलिम समाज को चुनाव में विकास के मुकाबले सुरक्षा को प्राथमिकता देते रहने पर विवश करते हैं। 


बिहार में विकास-विरोधी लालू यादव शासन की बेहद अक्षम और भ्रष्ट पारी मुसलिम मतों के दम पर इसीलिए चलती रही। अक्तूबर 1990 में आडवाणी की अयोध्या रथयात्रा, जो देश भर में मुसलमानों के लिए आतंक का पर्याय बन चुकी थी, को रोक कर लालू ने सांप्रदायिक सुरक्षा का जो सिक्का जमाया वह अगले पंद्रह वर्ष तक कायम भी रखा। संघी मोदी के लिए, लाख संविधान के शासन का दावा करने के बावजूद, लालू बनना तो संभव नहीं। हां, भाजपा इस पहेली को तोड़ना चाहेगी कि 1984 के सिख दंगे कांग्रेस और गांधी परिवार के लिए उसी तरह चुनावी जवाबदेही का बायस नहीं बनते जैसे 2002 के गुजरात दंगे भाजपा और मोदी के लिए बनते हैं। 

आखिरकार दोनों अवसरों पर अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाने वाली हिंसा की प्रकृति और बर्बरता एक जैसी ही तो थी। दोनों ही अवसरों पर सत्ताधारी दल के लोगों ने सरकार के साए तले खूनी तांडव किया था। यहां तक कि 1984 में हिंसा को रोकने में राज्य की निष्क्रियता को, 2002 में राज्य की हिंसा में सक्रिय भागीदारी का रिहर्सल भी कहा जा सकता है। दोनों में कानून भी अपना काम कर ही रहा है। फिर क्यों न भाजपा को भी चुनाव-दर-चुनाव दंगे की जवाबदेही से मुक्ति मिले, जैसे कांग्रेस को मिल चुकी है। 

तो भी, हिंदुत्व की विचारधारा में कैद भाजपा और मोदी के लिए गुजरात ‘प्रोग्राम’ को लेकर माफी मांगना संगत नहीं हो सका है। लोकप्रिय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चाहने पर भी भाजपा की अंदरूनी राजनीति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बड़े नहीं हो सके थे। संघ की भाजपा पर पकड़ का असर था कि 2004 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की अप्रत्याशित हार के कारणों पर वाजपेयी आधा सच ही बोल पाए, कि गुजरात दंगों की खासी भूमिका रही पार्टी को हराने में। 

पूरा सच बोलना संभव होता तो वे यह भी जोड़ते कि प्रधानमंत्री के नाते अगर उन्होंने राजधर्म न निभाने वाली मोदी सरकार को बर्खास्त कर दिया होता तो मुसलिम मतों का कांग्रेस के पक्ष में व्यापक ध्रुवीकरण न होता और भाजपा शर्तिया जीतती। आज, 2014 की मोदी मुहिम में भाजपा जिस मुसलिम स्वीकार्यता की जोड़-तोड़ में लगी है, दस वर्ष पूर्व वह वाजपेयी की झोली में गिरने के कगार पर थी। 

इसे विडंबना भी कह सकते हैं कि विहिप के घृणा-दूत तोगड़िया ने सांप्रदायिक विष-वमन से मोदी को निर्णय के ऐन वाजपेयी वाले दोराहे पर ही लाकर खड़ा कर दिया है। चुनाव आयोग के निर्देश पर तोगड़िया के विरुद्ध गुजरात पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर ली है। अब गेंद, संकुचित सांप्रदायिक छवि से बाहर आने को लालायित मोदी के पाले में है। लेकिन संघ, हिंदुत्व और चुनावी संभावनाओं के बीच संतुलन बैठाने का जो जटिल खेल वाजपेयी नहीं खेल सके थे, क्या मोदी खेल पाएंगे? परिस्थितियां इस लिहाज से भी समान हैं कि आज के मोदी के पास तोगड़िया को नकारने की उसी तरह की चुनावी वजहें हैं, जो तब के मोदी को नापसंद करने वाले वाजपेयी के पास हुआ करती थीं। 

कहना होगा कि जान-बूझ कर नरेंद्रभाई ने गुजरात दंगों को लेकर माफी मांगने के विकल्प से दो टूक किनारा कर लिया है। प्रधानमंत्री पद की दावेदारी में उतरने के बाद से यह विकल्प उन्हें घूर रहा होगा। इसके बजाय उन्होंने चुनौती दे डाली कि दंगों के लिए कसूरवार पाए जाने पर बेशक चौराहे पर उन्हें फांसी दे दी जाए। यह मुसोलिनी जैसा हश्र उनके हाथ में नहीं है, इतिहास के भी हाथ में नहीं है। पर वे कांग्रेस से अलग जरूर दिखना चाहते हैं, जिसके नेताओं ने वर्षों तक चुप्पी के बाद अंतत: 1984 के सिख दंगों के लिए माफी मांग ली थी, कानूनी उलझाव को न्योता देने के अलावा, मोदी के माफी मांगने से हिंदुत्व के कट्टर समर्थकों का उनसे उखड़ने का भी खतरा रहेगा, जो फिलहाल उनकी चुनावी राजनीति को गंवारा नहीं हो सकता। चुनावी दौर में ‘माफी’ को देश का मुसलिम नेतृत्व पचा पाएगा, यह भी अनिश्चित है।

गुजरात के नियोजित मुसलिम संहार पर मोदी की अपनी भूमिका को लेकर पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ कहा गया है। बेशक, दंगों से निपटने में राज्य का पुलिस-प्रशासन, छिटपुट अपवादों को छोड़ कर, पूरी तरह विफल सिद्ध हुआ था। पर खुद मोदी की नीयत क्या थी, यह कैसे तय करें? उनके दाहिने हाथ अमित शाह ने अब तर्क दिया है कि गोधरा ट्रेन कांड से भावनाएं इस कदर भड़की हुई थीं कि प्रशासन के लिए स्थिति पर एकदम नियंत्रण पाना संभव नहीं था। निश्चित ही दंगों में हिंसा की व्यापकता अभूतपूर्व थी। कागजों में सेना और पड़ोसी राज्यों से मदद भी मांगी गई। लेकिन स्थिति से निपटने में न राज्य का प्रशासन उतावला दिखा और न राजनीतिक नेतृत्व ने कानून-व्यवस्था की मशीनरी पर जवाबदेही का अंकुश कसने की अधीरता दिखाई। 

राज्य के जिन चंद पुलिस अधिकारियों ने दंगाइयों के विरुद्ध कार्रवाई का


साहस दिखाया उन्हें तबादलों और जांचों से प्रताड़ित किया गया। दूसरी ओर जिनके अधिकारक्षेत्र में सार्वजनिक तौर पर बर्बरतम हिंसक घटनाएं भी हुर्इं, उन्हें मोदी शासन ने अभयदान देकर पूर्ववत कानून-व्यवस्था के पदों पर बनाए रखा। इनमें से कई स्थानों पर पुलिस ने दंगाइयों पर अंतत: गोलियां भी चलार्इं, पर दो-तीन दिन तक हिंसा निर्बाध चलने के बाद। 

दंगा-स्थलों से पुलिस का नदारद रहना या वहां समय पर न पहुंचना, मुकदमे दर्ज न करना, गिरफ्तारियां न करना, अनुसंधान बंद कर देना, अपराधियों का जमानत पर छूटना, पीड़ितों और गवाहों को डरा-धमका कर या प्रलोभन से तोड़ना, शासन के आम हथकंडे रहे। वर्षों बाद जब नागरिक समूहों की पहल पर सर्वोच्च न्यायालय ने मोदी सरकार से हिसाब-किताब मांगना शुरू किया, तब जाकर अनुसंधानों ने गति पकड़ी, गिरफ्तारियां हुर्इं और अदालतों में सुनवाई आगे बढ़ सकी। 

प्रधानमंत्री वाजपेयी की तत्कालीन गोधरा/ गुजरात यात्राओं में विशेष सुरक्षा दल की ओर से समन्वय करने के दौरान मैंने पाया कि राज्य के नौसिखिया मुख्यमंत्री ने सांप्रदायिक आधार पर पुलिस में तैनाती की बाकायदा मुहिम चला रखी थी। गोधरा में कारसेवकों की ट्रेन के दो डिब्बों को अचानक जलाने से हुई हृदयविदारक मौतों को लेकर राज्यव्यापी हिंसा फूटने पर गुजरात पुलिस में कानून-व्यवस्था का एक भी पद ऐसा नहीं था, जिस पर कोई मुसलमान तैनात रहने दिया गया हो। स्पष्ट ही यह कवायद 2002 के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव की सामरिक तैयारी का हिस्सा थी। उस समय तक मोदी और तोगड़िया एक ही थैली के चट्टे-बट्टे होते थे। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के साए में हुए चुनाव ने मोदी का मुख्यमंत्रित्व पक्का कर दिया। अमित शाह को गृह राज्यमंत्री बना कर गुजरात पुलिस के मोदीकरण, दंगों पर नियोजित लीपापोती और राजनीतिक मुठभेड़ों/ निगरानियों की मुहिम को शह दी गई। 

मोदी के आक्रामक सांप्रदायिक एजेंडे से वाजपेयी की समन्वयकारी राजनीतिक छवि का तालमेल संभव नहीं था। वे व्यक्तिगत स्तर पर भी मोदी से दूर दिखना चाहते थे। हिमाचल के दौरों में, जहां वाजपेयी छुट्टियां मनाने के शौकीन थे, हिदायत होती कि प्रदेश का प्रभारी महासचिव होने के बावजूद मोदी को प्रधानमंत्री की कार या हेलीकॉप्टर में जगह न दी जाए। स्वाभाविक था कि वाजपेयी चाहते कि मोदी के पूर्ववर्ती केशूभाई पटेल ही, जो दुर्भाग्य से एक वर्ष पहले के भयानक तबाही वाले भुज भूकंप में अपनी साख खो चुके थे, गुजरात सरकार के मुखिया बने रहें। 

पर सामान्य तौर पर कयास था कि पटेल के ढीले नेतृत्व में भाजपा दिसंबर 2002 में आ रहे राज्य विधानसभा के चुनाव शायद ही जीत सके। इससे, अक्तूबर 2001 में, गुजरात से वर्षों से दूर रखे गए महत्त्वाकांक्षी मोदी की ताजपोशी की राह खुल गई। संघ का सोच था कि चुनाव से पहले केशूभाई सरकार की कमजोर प्रशासनिक छवि को सांगठनिक पहलों से मजबूत किया जाए। 

गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पूर्व मोदी ने शासन में कभी किसी पद पर कार्य नहीं किया था। संघ और पार्टी के दायित्वों से लंबे समय से जुड़ाव के चलते सांगठनिक क्षमता जरूर उनकी जमा-पूंजी रही होगी, हालांकि इससे उनके प्रशासनिक अभाव की भरपाई नहीं हो सकती थी। दरअसल, चार माह पुराने मुख्यमंत्री की गोधरा कांड के समय की स्थिति, इंदिरा गांधी की 1984 में हत्या से भड़की हिंसा के समय, प्रशासनिक पकड़ में कोरे प्रधानमंत्री राजीव गांधी जैसी ही थी।

राजीव की तो बल्कि सांगठनिक समझ भी अभी अधकचरी थी। उनके राजधर्म में निजी भावुकताएं हावी हो गर्इं- ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है।’ धरती हिलाने के लिए उत्तेजित भीड़ आयोजित की गई, आगजनी-लूटपाट-कत्ल-बलात्कार हुए। 2002 में, मोदी ने सांगठनिक तर्क- ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ को आगे बढ़ाया। प्रशासनिक रूप से यह शैतानी बचकानापन ही सिद्ध हुआ। न ‘प्रतिक्रिया’ को सांगठनिक क्षमता से नियंत्रित करना संभव रहा और न दो-तीन दिन की ‘निर्धारित’ अवधि में समेटना। 

दरअसल, दोनों अवसरों पर राज्यसम्मत हिंसा का तोड़ देने में भारतीय तंत्र असमर्थ रहा। मंत्रिमंडल की सलाह से बंधे राष्ट्रपति और दलगत राजनीति से बंधी संसद जैसे 1984 में दर्शक बने रहे वैसे ही 2002 में भी। सर्वोच्च न्यायालय के पास, कम से कम गुजरात के संदर्भ में, संविधान की धारा 356 के अंतर्गत यह व्यवस्था देने का विकल्प था कि राज्य की तत्कालीन परिस्थितियों में संवैधानिक तरीके से सरकार नहीं चलाई जा सकती। उस हालत में केंद्र के लिए मोदी सरकार को बर्खास्त कर गुजरात में राष्ट्रपति शासन लगाना अनिवार्य हो जाता। पर ‘जलते रोम में बांसुरी बजाते नीरो’ को बस वे जबानी खरी-खोटी सुनाते रहे। मीडिया ने मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा तो रखा, पर वह प्रशासन का न हाथ पकड़ सकती थी और न सजा दे सकती थी।    

2014 के चुनावी दौर में भाजपा के लिए लाभदायक मानी जा रही मोदी की दबंग विकास-पुरुष की छवि दस साल पहले वाजपेयी के ‘इंडिया शाइनिंग’ अभियान के समय शैतानी विनाश-पुरुष वाली मानी जाती थी। यह परिवर्तन संभव है? बहुत से लोग मानते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी भाजपा में अपने विरोधियों की छुट्टी कर देंगे। पर जिस पाए का इन्क्लूसिव राष्ट्रीय नेतृत्व मोदी धड़ा परोस रहा है, उसके लिए तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी छुट्टी पर भेजना होगा! मोदी के समय में माफी इसीलिए जटिल है। 


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