मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
बनारस क्या बदलेगा PDF Print E-mail
User Rating: / 2
PoorBest 
Thursday, 01 May 2014 11:49

अशोक कुमार कौल

सुशील कुमार


जनसत्ता 1 मई, 2014 : विश्व के सर्वाधिक प्राचीन जीवंत नगर के रूप में बनारस की ख्याति पर भी काल का पहिया अपने प्रभाव दिखाता रहा है।

भगवान शंकर के त्रिशूल पर टिकी काशी की सनातनी मान्यता वाला यह शहर ‘अविमुक्त क्षेत्र’ के रूप में भी प्रसिद्ध रहा है और आस्थावानों के लिए ‘सर्वोत्तम मृत्यु’ और ‘मोक्ष’ के नगर के रूप में भी। महात्मा बुद्ध की उपदेश-स्थली, गुरुरामदास का मानव-अध्यात्म स्थल, कबीर के लिए उलटबांसियों वाला नगर, संत रैदास, मिर्ज़ा ग़ालिब का ‘चिराग़-ए-दहर’, पंडित मदन मोहन मालवीय की ‘सर्वविद्या की राजधानी’, डियाना एक्कके लिए ‘सिटी आॅफ लाइट’, नज़ीर बनारसी का ‘गंगो-जमुन’ का शहर बनारस काल के प्रभाव से अछूता माना जाता है। कुछ-कुछ आत्मा की अनश्वरता सदृश छवि लिए यह शहर समय के थपेड़ों से जूझता हुआ एक ऐसे दौर में आ पहुंचा है जिसमें इसके अतीत को भविष्य से जोड़ने वाला वर्तमान किसी उद्धारक की बाट जोहता प्रतीत होता है। 


प्रदूषित गंगा, गंदी गलियां, पानी-बिजली-सड़क की अंतहीन समस्या, चरमराती कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और बेतरतीब फैलाव बनारस के वर्तमान के कुछ ऐसे पहलू हैं जो इसके भविष्य के संदर्भ में एक निराशाजनक परिदृश्य निर्मित करते हैं और आसानी से दिख जाते हैं। साथ ही, ये बनारस के वे पहलू हैं जो किसी भी सामान्य समस्याग्रस्त नगर के हो सकते हैं और जिन्हें प्रशासनिक प्रयासों के सहारे ठीक किया जा सकता है। 

पर इसका एक अर्ध-दृश्य वर्तमान भी है जिसमें बुनकरों और परंपरागत हिंदू कर्मकांडियों और धर्मजीवियों की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बदहाली, यहां जीवंत रहे लघु-भारत के स्वरूप का क्रमश: सिमटते-संकुचित होते जाना, ‘अतिथि देवो भव’ के भाव का ‘अर्थ देवो भव’ में परिवर्तित होते जाना, गंगाजी के किनारे यहां की शताब्दियों पुरानी बहुसांस्कृतिक बसावट में से बांग्ला-भाषियों के निष्कासन और पलायन, मंदिरों में दुर्व्यवस्था और उनकी उपेक्षा, धर्म के आधार पर बस्तियों का विशेषीकरण और विदेशी पर्यटकों के प्रभाव में देशी पर्यटकों की अघोषित, अलिखित उपेक्षा के तत्त्व भी सम्मिलित हैं। ये तत्त्व उन परिस्थितियों से जनमे हैं और उन प्रक्रियाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं जो बनारस की आगे की यात्रा को बाधित करती रहेंगी, अगर समय रहते नियंत्रित नहीं की जा सकीं तो! 

एक विशिष्ट क्षेत्र की छवि रखने वाले बनारस की यह विडंबना रही है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और वोट के आंकड़ों के खेल में कुछ दशकों से इसे नए सिरे से बस्तियों, वर्गों और समूहों में बांट दिया गया है। इसका यह विभाजन राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों द्वारा चुनावों के समय आंकड़ों की बिसात पर लोगों को दिखा-दिखा कर सम्मोहित या भयभीत करके और भी स्पष्ट कर दिया जाता रहा है, इस सीमा तक कि चुनाव-दर-चुनाव इसकी साख दांव पर लगती प्रतीत होने लगी है।

मगर जैसा कि हर चरम स्थिति के बाद होता है, 2014 के आम चुनावों में बनारस संसदीय क्षेत्र का चुनाव भी एक ‘घोर-चुनाव’ के रूप में उभरा है जो हमेशा जीवंत रहने वाले इस शहर के राजनीतिक भाग्य-विधाताओं और ठेकेदारों से उनकी भांग के नशे के समान नींद का हिसाब मांगता दिख रहा है। यह चुनाव इस नगर की राजनीतिक विरासत पर एक गंभीर प्रश्न बन कर भी उभरा है कि वैश्विक स्तर पर मानव सभ्यता, संस्कृति और अध्यात्म को राह दिखाने वाला बनारस आज अपने ही अस्तित्व और छवि के संदर्भ में छटपटाता और संघर्ष करता क्यों दिख रहा है? 

स्थिति चाहे जो हो, बनारस को 2014 के आम चुनावों की प्रक्रिया में एक विशिष्ट राजनीतिक पहचान मिल रही है और इस संदर्भ में इस पर केंद्रित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं के प्रभाव में इसकी प्रतिष्ठा बढ़ी है। इसे मनाने के लिए कई ऐसे प्रयास प्रारंभ कर दिए हैं जो इसके पहले कभी नहीं देखे गए। 

ऐसे प्रयासों में पारंपरिक चुनावी वायदों के साथ भारतीय जनता पार्टी द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर अपूर्व ढंग से उछाला गया ‘ब्रांड इंडिया’ का एक नारा है, जो विकास के मुद्दों को चुनावी मंच पर रखते हुए भविष्य को समृद्ध बनाते हुए अतीत के गौरव की वापसी के सपने दिखा रहा है। 

कैलाश चौरसिया और विजय जायसवाल के साथ नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल, अजय राय जैसे उम्मीदवारों की उपस्थिति ने बनारस में आम मतदाताओं के समक्ष वैचारिक ऊहापोह और भ्रम की स्थिति निर्मित कर दी है। 

साथ ही, नरेंद्र मोदी के बनारस के साथ-साथ वडोदरा से भी चुनाव लड़ने के कारण मतदाताओं के समक्ष रह-रह कर विवाह के पूर्व ही एक संभावित रूमानी विवाह के बाद विवाह-विच्छेद की आशंकाएं उभर जा रही हैं। हालांकि मुख्तार अंसारी के चुनावी मैदान से हट जाने और अफजाल अंसारी द्वारा हाल ही में की गई नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की रणनीतिक पृष्ठभूमि यह भी संकेत करती है कि राजनीति के गलियारे में अवसरवादिता अब स्पष्ट तौर पर प्रभावी और स्वीकार्य हो चुकी है। 

मोदी के विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हाल ही में आए साक्षात्कारों में दिए गए संकतों से भी इस संभावना की पुष्टि होती दिखती है कि अगर वे वडोदरा और बनारस दोनों ही जगहों से विजयी होते हैं तो बनारस को ही अपना संसदीय क्षेत्र बनाएंगे। यहां यह देखना भी महत्त्वपूर्ण है कि उनके साक्षात्कारी संकेतों ने ‘ब्रांड इंडिया’ की तर्ज पर ‘ब्रांड बनारस’ की संभावनाओं को विचार-विमर्श के लिए उछाल दिया है।  

ऐसे में एक स्वाभाविक प्रश्न यह बनता है कि क्या चुनाव परिणाम के बाद बनारस भी एक ब्रांड के रूप में विकसित किया जा सकेगा? अगर हां, तो किस प्रकार? और साथ ही


यह भी कि इसका स्वरूप क्या होगा- ढांचागत विकास पर केंद्रित, आजीविका और रोजगार पर केंद्रित, पर्यटन पर केंद्रित, सांस्कृतिक विरासत और अतीत के गौरव पर केंद्रित या इन सबको समेटे एक ‘समावेशी बनारस’ पर केंद्रित? ‘ब्रांड बनारस’ की उक्त सभी संकल्पनाओं को राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के सहारे स्थापित किया जा सकता है, सिवाय अंत में उल्लिखित ‘समावेशी बनारस’ प्रारूप के। ‘ब्रांड बनारस’ के ‘समावेशी बनारस’ प्रारूप के निर्माण के लिए यहां की पुरपेच गलियों में बना दी गर्इं धार्मिक और सांस्कृतिक दरारों को पाटना प्राथमिक और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य होगा। 

इन दरारों में फंस कर जहां इसकी सनातनी परंपरा विद्रूपित हो रही है वहीं परंपराओं और सामाजिक-सांस्कृतिक विशिष्टताओं की ‘द्वितीयो नास्ति’ की थाती लिए पूरे विश्व में भारत की एक अलग पहचान बनाने वाले बनारस के वस्ति-स्थल पर भौतिकता की मार ने इसके बहुधार्मिक-बहुसांस्कृतिक समूहों को एक दूसरे के प्रति एक सीमा तक अविश्वसनीय और असहिष्णु बना दिया है। ‘लघु भारत’ की भी संज्ञा से विभूषित इस शहर में शताब्दियों से देश के अधिकतर प्रांतों के लोगों की उपस्थिति रही है। उनके यहां आकर बसने के उद््देश्य चाहे जो रहे हों, पर उन्होंने धर्म, संस्कृति, ज्ञान, अध्यात्म, दर्शन, जीवन-मूल्यों और प्रगतिशीलता के स्तर पर एक-दूसरे को अपनाया और सराहा है, संकटकाल में एक-दूसरे का संबल और प्रतिपूरक बन कर भी उभरे हैं। 

पर सनातनता का अलख जगाने में निरंतर जगते रहने वाले बनारस में पिछले कुछ दशकों से ‘इन्स्टैन्ट मोक्ष’, ‘इन्स्टैन्ट योगा’, ‘गिरस्तागीरी’ और ‘माफिया संस्कृति’ ने इसके समावेशी ताने-बाने को जिस तरह से, और जहां-जहां से कुतरा है उसकी मरम्मत चाणक्य और अरस्तू की आदर्श प्रशासकों की कल्पना के चरितार्थ हुए बिना संभव नहीं दिखती है। अपनी मस्ती को भूल कर, अपने बिंदासपन को खोकर अकबकाया यह शहर गंगाजी के घाटों पर, मंदिरों, मस्जिदों, गुरद्वारों, गिरजाघरों, समाधियों, मजारों की खाक  छानते हुए, गली-गली भटकते हुए किसी दीवाने-सा कुछ ढूंढ़ रहा है, किसी मलंग-सा कुछ कह रहा है, किसी फकीर, किसी जोगी-सा कुछ गा रहा है, आह्वान करता प्रतीत हो रहा है। 

यह देखना ऐसे में दिलचस्प होगा कि नरेंद्र मोदी, या कोई और, या स्वयं बनारस अपनी अस्मिता को परिवर्तित परिस्थितियों में किस प्रकार विश्लेषित करता है और उस आधार पर अपने अस्तित्व के संदर्भ में कैसी आकांक्षाएं और अपेक्षाएं इन पहरुओं के समक्ष प्रस्तुत करता है। एक बार अस्तित्व में आ गए शब्द सदैव बने रहते हैं क्योंकि शब्द कभी मरते नहीं।  

कांग्रेस के बहुप्रचारित भ्रष्टाचार, ‘आप’ द्वारा अपने बारे में स्वयं निर्मित अनिश्चितता के वातावरण, समाजवादी पार्टी से बनारस के अल्पसंख्यकों के मोह-भंग की स्थिति, और बनारस को सांस्कृतिक राजधानी के रूप में पुनर्प्रतिष्ठित करने के वादे के साथ यहां के चुनावी मैदान में अपने नामांकन के दिन धमक दिखा चुके नरेंद्र दामोदर भाई मोदी अगर चुनाव जीत जाते हैं तो यह उनके समक्ष एक अपूर्व अवसर प्रदान करेगा। 

यह वह अवसर होगा जिसके सार्थक और सफल उपयोग से वे गुजरात मॉडल की अपनी क्षेत्रीय और विपक्षियों के निशाने पर रही छवि से आगे निकल कर बनारस की राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय छवि के सदृश अपनी एक सर्वथा नवीन और पहले की तुलना में अधिक स्वीकार्य छवि निर्मित कर सकते हैं। 

ब्रांड बनारस’ की संकल्पना पर कार्य करना उनके लिए यहां की राजनीति और वैचारिकियों से उभरी अनिश्चितताओं, आशंकाओं, भय, भेदभाव की विद्यमान स्थितियों से भी पार पाने का अवसर देगा। संभवत: वे भी इस बात को समझ रहे हैं कि चुनाव में व्यक्तिगत और राजग के स्तर पर जीत उनके सामने इस अवसर के साथ-साथ गंभीर चुनौतियां भी प्रस्तुत करेगी। 

इन अवसरों और चुनौतियों का जो अक्स बनारस के विशिष्ट स्वरूप में प्रतिबिंबित होता है वह किसी भी नीति-निर्माता और प्रशासक के लिए एक आदर्श स्थिति है। हमारा आकलन है कि मोदी प्रयोगधर्मिता और निर्माण के इस आदर्श से किसी भी हाल में वंचित होना नहीं चाहेंगे। ‘ब्रांड बनारस’ की दिशा में आगे बढ़ना एक समय के बाद उनके राजनीतिक कायाकल्प के अवसर भी निर्मित कर सकता है। ‘ब्रांड बनारस’ की संकल्पना समावेशी प्रारूप में अगर फलीभूत हो जाती है तो इसके आश्चर्यजनक वैश्विक परिणाम भी होंगे, क्योंकि विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक, जातीय, धार्मिक, वैयक्तिक, राजनीतिक, आर्थिक और मानसिक समस्याओं के समाधान के लिए पूरा विश्व बनारस के बहाने भारतीय विरासतों को जानने-समझने और इनके सूत्रों और कूटों को अपने संदर्भों में विश्लेषित करने के प्रयास में लगा हुआ है। 

ब्रांड बनारस की संकल्पना के समावेशी प्रारूप में धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और क्षेत्रीय एकांगीपन के लिए कोई स्थान नहीं है। इसमें सबको समाहित कर, सबको साथ लेकर चलने की सैद्धांतिक और व्यावहारिक संभावनाएं हैं। यह भारत में अंतर्निहित वैश्विक संभावनाओं और सक्षमताओं का द्योतक है और इसे बनारस की समावेशी संकल्पना में सहजता से देखा-पाया जा सकता है।


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta


आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?