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रिश्तों के उलझे धागे PDF Print E-mail
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Monday, 28 April 2014 11:33

प्रेमलता

जनसत्ता 28 अप्रैल, 2014 : पिछले कुछ वर्षों से हमारे समाज में रूढ़ियों को तोड़ने और कुछ क्रांतिकारी करने की एक विचित्र-सी बेचैनी दिखाई देने लगी है,

जिसमें प्रगतिशीलता कम और प्रयोगधर्मिता के लक्षण अधिक दिखाई देते हैं। यह प्रयोगधर्मिता कई नए प्रश्न खडेÞ कर देती है, जिनके समाधान हमारे पास नहीं होते। लेकिन उनकी उपेक्षा भी नहीं की जा सकती, क्योंकि वे हमारे सामाजिक निर्वाह से जुड़े होते हैं। 


इस प्रयोगधर्मिता से हमारे भावनात्मक संबंध सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं, चाहे वह लिव-इन रिलेशनशिप यानी सहजीवन की स्वीकृति हो या इंटरनेट पर शादी करने आदि की। हम नई स्थिति के प्रति आकर्षित होकर उसे लपक तो लेते हैं, पर जब उस बदली स्थिति के परिणाम सामने आने लगते हैं तो दर्द से चिल्लाने लगते हैं। 

भावनात्मक संबंधों की जब कानूनी व्याख्या की जाने लगती है तो यही समझ में आता है कि विज्ञान, गणित और कंप्यूटर के इस युग में संबंधों के महीन रेशे अब टाइप होकर मेमोरी में स्टोर होने लगेंगे और जब हम चाहेंगे, उन्हें मेमोरी से बाहर निकाल कर अपने सामने रखेंगे, प्रेमालाप करने लगेंगे और जब वक्त अपना स्विच बंद कर देगा तो अलादीन के दूत की तरह उसे लौट जाने को कह देंगे और खुद संवेदन शून्य होकर अपने काम में मशगूल हो जाएंगे। संबंधों को जीना समय सापेक्ष हो ही गया है। अब यह तय करना पड़ता है कब प्रेम करें, कब विवाह करें और कब संतानोत्पत्ति की सोचें। समय न हो तो कोख भी किराए पर खरीद लें, क्योंकि सब बिकता है। 

जीवन एक वफादार रोबोट की तरह चलने लगा है। बच्चे आवश्यकता के लिए नहीं, अभ्यासवश दूध पी लेते हैं, क्योंकि किसी के पास समय नहीं कि भूख का इंतजार करे। अधिकार भावना स्नेह और सौहार्द से उत्पन्न न होकर कानूनी व्याख्या के नतीजे के तौर पर सामने आए तो अब आश्चर्य क्यों। 

इसमें कोई संदेह नहीं कि ढेर सारी सुख-सुविधाएं एक साथ पा लेने की हवस में पूरा समाज गोते खाने लगा है, पर हम कहां जा रहे हैं, यह तो हमें ही सोचना है। कोई हमें रोकेगा नहीं, पूछेगा नहीं, हमने ऐसा वातावरण तो बना ही दिया है, पर जब परिणाम भूत की तरह आपके सामने प्रस्तुत होगा, तो उसे झेलना आपको ही है। स्वच्छंदता सभी को अच्छी लगती है, उन्मुक्तता की पैरवी करते-करते हमारे ही बच्चे अब विवाह करने को मना करने लगे हैं। आज के माता-पिता का सबसे बड़ा दुख और सबसे बड़ी प्रवंचना है कि वे अपने बच्चों पर नियंत्रण खो बैठे हैं। माता-पिता की अपने बच्चों को लेकर  असहायता और कातरता सबसे बड़ी विडंबना है। 

आइए देखें कानून क्या कहता है, जब आप ऐसी परिस्थिति में फंस जाते हैं। एक बहुत बड़ा फैसला किया सर्वोच्च न्यायालय ने- सबको चौंका दिया, हिल गए सब। बड़ा आक्रोश व्यक्त हुआ मीडिया के माध्यम से। यह क्या कर दिया सबसे बड़ी अदालत ने! निर्णय यह था कि सहजीवन में कटुता आने पर एक साथी और बच्चों को भरण-पोषण पाने का अधिकार दे दिया। महिलाएं दुखी हो गर्इं कि ऐसी स्त्री को पत्नी जैसा अधिकार क्यों। पुरुष परेशान हो गए कि जब शादी ही नहीं की और उसे पत्नी का अधिकार ही नहीं दिया, तो खर्चा क्यों दिया जाए! 

इस मामले में तथ्य यह था कि पहली पत्नी से तलाक के कई साल बाद दूसरी स्त्री के साथ इक्कीस वर्षों तक सहजीवन में रहने के बाद एक व्यक्ति का उससे मनमुटाव हो गया और परिणाम स्वरूप दोनों अलग हो गए। इस संबंध से दो बच्चे भी पैदा हुए। परित्यक्ता महिला ने घरेलू हिंसा विरोधी कानून के तहत भरण-पोषण मांगा। 

मद्रास उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय से इस रिश्ते की व्याख्या करने की मांग की। सर्वोच्च न्यायालय ने घरेलू हिंसा विरोधी कानून की उस धारा की व्याख्या की, जिसमें ‘समाज में पति-पत्नी की तरह रह रहे दंपति के अधिकार’ की चर्चा थी। इस प्रकार के संबंध के लिए इस कानून में भरण-पोषण का प्रावधान है- ऐसा सर्वोच्च न्यायालय ने माना और मद्रास उच्च न्यायालय को इसी के अनुरूप फैसला करने का निर्देश दिया। 

अदालतें कानून नहीं बनातीं, केवल उनकी व्याख्या करती हैं। महिलाओं के प्रगतिशील सोच के अनुरूप ही घरेलू हिंसा विरोधी कानून बना। महिलाओं ने ही विवाह न करके सहजीवन में रहना स्वीकार किया। पुरुष स्वयंभू होने की गलतफहमी पालता रहा। पर कभी तो इसे स्वीकृति मिलनी ही थी। कभी तो चर्चा होनी थी कि स्त्री-पुरुष का यह रिश्ता है क्या। ऐसे रिश्ते में पत्नी का दर्जा अदालत ने नहीं दिया, इसे पति-पत्नी की तरह का रिश्ता माना। 

जो हकीकत है, उसे स्वीकार करने से गुरेज क्यों होना चाहिए। संबंधों में यह स्थिति आप ही की बनाई हुई है। न तो अदालत ने बनाई है, न उसे वास्तविक स्थिति से ज्यादा दर्जा दिया है। फिर आक्रोश कैसा! पुरुष अपने जीवन को अपनी तरह जीना भी चाहते हैं और कोई कष्ट भी नहीं उठाना चाहते, ऐसा क्यों। समाज को आप जैसा बनाएंगे वैसा ही बनेगा। 

प्रगतिशीलता के नाम पर सारी सीमाएं तोड़ कर बाहर निकल आर्इं महिलाएं अपने संबंधों को लेकर कितनी कमजोर हैं, यह एक नजर अपने कानूनों पर डालने से ही पता चल जाएगा। विवाह की शर्तों को अस्वीकार करके जब स्वच्छदंता की


पैरवी शुरू हुई तो कुछ बुरा नहीं लगा, पर जब-जब दिल पर चोट लगी, अदालत-कचहरी का दरवाजा खटखटाया जाने लगा, टटोला जाने लगा कि इस मामले में हमारे अधिकार क्या हैं। पर यहां हाथ कुछ नहीं लगता। दूसरी स्त्री के प्रति आकर्षित होकर जब कोई पति अपनी पत्नी का परित्याग कर देता है, तो पत्नी उस दूसरी स्त्री के खिलाफ कोई शिकायत नहीं कर सकती, क्योंकि हमारे कानून के अनुसार इस मामले में स्त्री पीड़िता मानी जाती है, दोषी नहीं। 

पत्नी की बेवफाई की शिकायत भी पति नहीं कर सकता, क्योंकि यहां भी स्त्री पीड़िता मानी जाती है, वह परपुरुषगामिनी होती है, पर शोषिता भी वही मानी जाती है, वही पुरुष के विरुद्ध शिकायत कर सकती है। पर जो संबंध उसने अपनी खुशी से बनाया है, उसकी शिकायत क्यों करेगी! प्रकारांतर से स्थिति यह हुई कि संबंधों से जुड़े वफाई या बेवफाई जैसे मामलों में कानून आपकी कोई मदद नहीं करता। इस पर भी यहां यह बात ध्यान देने की है कि हम खुद अपने संबंधों के प्रति संवेदनशून्य हो रहे हैं, तो फिर प्यार न करने की सजा किसे देना चाहते हैं! और अगर जिसे प्यार करते हैं उसे सजा देने की बात मन में आ जाए तो प्यार किस बात का, वह तो रहा ही नहीं। वह तो केवल बदले की भावना हो सकती है, जो प्यार में होती नहीं है। प्यार के साथ त्याग तो हो सकता है, बदले की भावना नहीं। 

पर आज तो हम आए दिन सुनते हैं कि प्रस्ताव स्वीकार न करने पर लड़की के ऊपर तेजाब फेंका गया। क्या हमने प्रेम का स्वरूप बदल नहीं दिया! आप सहजीवन को स्वीकार करते हैं, तो पति की बेवफाई के लिए भी तैयार रहें। आप बिना विवाह के साथ रह सकते हैं, तो यह भी मान कर चलें कि विवाह से इनकार किया जा सकता है। 

इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के दो बड़े पुराने निर्णयों के उदाहरण देना आवश्यक होगा, जिन्हें आज भी अदालतें नजीर मान कर चलती हैं। वी. रेवती के मामले में 25 फरवरी, 1988 को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रश्न प्रस्तुत हुआ कि क्या पत्नी की गुहार पर न्यायालय पति को उसकी बेवफाई की सजा दे सकता है। 1985 में सौमित्री विष्णु ने अपनी स्वेच्छाचारिणी पत्नी को सजा दिलाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। 

दोनों ही मामलों में अदालत ने कानूनी व्याख्या की कि ‘कोई भी पत्नी अपने पति को विवाहेतर संबंधों के लिए दंड नहीं दिला सकती, क्योंकि इस अपराध के होने से दूसरी स्त्री प्रभावित होती है, जिसके सहयोग से वह अपराध करता है और वही शोषिता मानी जाती है।’ 

चूंकि शिकायत प्रभावित व्यक्ति ही कर सकता है, इसलिए अपनी स्वेच्छाचारिणी पत्नी की शिकायत पुरुष नहीं कर सकता, क्योंकि यहां भी स्त्री ही प्रभावित होती है, उस कृत्य से वही शोषित मानी जाती है, वंचित पुरुष नहीं। हालांकि कानून ने अपने तरीके से व्याख्या कर दी, पर सच तो यह है कि जहां संबंध कुछ रह ही न गया हो, वहां किसको किस बात की सजा दी जाए। 

न्यायमूर्ति के ठक्कर और न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के दोनों फैसलों का आधार मनोविज्ञान था। दांपत्य संबंध कोई रासायनिक प्रयोगशाला नहीं है, जिसके एक मिश्रण को दूसरे के साथ मिलाया जाए तो कोई भिन्न प्रतिक्रिया होगी। यहां प्रश्न यह नहीं कि हम कौन-सा युद्ध जीतना चाहते हैं। प्रश्न यह है कि दूसरे को कैसे हराया जाए। जब हार-जीत के परिणामों वाला यह युद्ध लड़ा जाता है, तो संबंध युद्ध का अखाड़ा हो जाता है। अदालतों ने किसी भी निर्णय में इस युद्ध के लिए तलवारें नहीं सौंपीं। 

हम जो संसार अपने लिए रचते हैं उसे सजाने, संभालने और कभी-कभी झेलने की जिम्मेदारी भी हमारी ही होती है। जब हम कोई सीमा लांघते हैं तो अपनी सीमा के भीतर रहने की सुरक्षा उसी समय खो देते हैं। अब नई स्थिति में अपने लिए पुराने हथियार साथ नहीं ला सकते। यही हाल अब सहजीवन के साथ हो रहा है। आप केवल भरण-पोषण या भत्ते मांग सकते हैं संबंध नहीं, विवाह करने के निर्देश नहीं। 

अस्सी के दशक में हुआ फैसला आज भी सच है, बरकरार है, क्योंकि संबंध खरीदे नहीं जा सकते, जबर्दस्ती बनाए नहीं जा सकते, कानून से मनवाए भी नहीं जा सकते। वे तो केवल जिए जाते हैं, निभाए जाते हैं। सहेजे जाते हैं या उनकी कद्र की जाती है। जब भी हम ऐसा नहीं करते, हमारे पास कुछ नहीं बचता। संबंधों के सहारे जीने वाला हमारा समाज विपन्न हो रहा है। 


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